उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या योगी सरकार पंचायत चुनाव समय पर कराने में नाकाम रही? जब ग्राम प्रधानों और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल पहले से तय था, तो फिर चुनाव समय पर क्यों नहीं कराए गए? अब इस पूरे मामले पर लखनऊ हाईकोर्ट ने भी सरकार से कई बड़े सवाल पूछ दिए हैं। अदालत जानना चाहती है कि निवर्तमान प्रधानों और जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक बनाने का कानूनी आधार क्या है? क्या यह संविधान के अनुरूप है, या फिर यह उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने का तरीका है? क्या सरकार चुनाव कराने में विफल रही? क्या राज्य निर्वाचन आयोग अपनी जिम्मेदारी निभाने में पीछे रह गया? और इस पूरे विवाद का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ेगा?
लखनऊ। प्रधानों के बाद प्रदेश सरकार ने जिला पंचायत अध्यक्षों को भी प्रशासक नियुक्त कर दिया है। सभी 75 जिला पंचायत अध्यक्षों का पांच वर्षीय कार्यकाल शनिवार को समाप्त हो रहा है। इससे पहले शुक्रवार रात शासन ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है। नई व्यवस्था बनने तक’ निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष ही कामकाज संभालेंगे।
वर्ष 2021 के ‘त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्षों की ‘पहली बैठक 12 जुलाई 2021 को हुई थी। इसी आधार पर उनका कार्यकाल 11 जुलाई को पूरा हो रहा है। इन्हें प्रशासक बनाने संबंधी प्रस्ताव पंचायती राज विभाग ने पहले ही शासन को भेज दिया था। शुक्रवार को सरकार ने इस पर मुहर लगा दी।
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इससे पहले 26 मई को ग्राम पंचायत प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने पर भी प्रदेश सरकार ने पहली बार निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किया था। इससे पूर्व यह जिम्मेदारी अधिकारियों को सौंपी जाती थी। अब उसी व्यवस्था को जिला पंचायतों में भी लागू किया गया है। गौरतलब है कि इससे पहले 2020 कोरानाकाल में जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक बनाने का आदेश जारी हुआ था।
ब्लॉक प्रमुखों का रास्ता साफ
- जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक बनाए जाने के बाद अब ब्लॉक प्रमुखों का रास्ता भी साफ हो गया है।
- ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल 19 जुलाई को समाप्त हो रहा है। उसमें भी यही व्यवस्था लागू की जाएगी। ब्लॉक प्रमुख ही प्रशासक बनाए जाएंगे।
- 18 जुलाई को शासन इसका आदेश जारी कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, ब्लॉक प्रमुखों का पांच वर्षीय कार्यकाल 19 जुलाई को समाप्त हो रहा है। इसके बाद पंचायत समितियों के नियमित संचालन में कोई व्यवधान न आए, इसके लिए शासन जल्द ही आदेश जारी कर सकता है। माना जा रहा है कि 18 जुलाई को इस संबंध में शासनादेश जारी होने की संभावना है।हालांकि, ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कानूनी आधार और संवैधानिक वैधता को लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। ऐसे में ब्लॉक प्रमुखों को प्रशासक बनाए जाने का फैसला भी भविष्य में न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।
प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाईकोर्ट सख्त सरकार से पूछा-इसका कानूनी आधार क्या है
निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था न्यायिक जांच के दायरे में आ गई है। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में राज्य सरकार विस्तार से बताए कि निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था किस कानूनी प्रावधान के तहत की गई है? यह संविधान के अनुरूप कैसे है?
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष मामले में दाखिल याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने राज्य सरकार को समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने का ब्योरा समेत आयोग की कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12 (3-ए) की वैधता पर विचार करने की आवश्यकता है।
न्यायालय ने कहा कि वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट ने इसी प्रकार के प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के विपरीत मानते हुए असांविधानिक ठहराया था। हालांकि, बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में कानून के प्रश्नों को खुला छोड़ते हुए अपील का निस्तारण कर दिया था। ऐसे में कोर्ट इस मामले की सुनवाई करेगा।
संजय कुमार शर्मा व अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा, यह विचारणीय है कि ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करने से क्या पंचायत का कार्यकाल अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ता है? क्या इससे राज्य निर्वाचन आयोग के सांविधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं। इन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार के लिए अदालत संबंधित अन्य जनहित याचिकाओं के साथ सुनवाई कर रही है।
कोर्ट के सवाल क्या राज्य सरकार पंचायत चुनाव कराने में नाकाम रही?
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त तय करते हुए तब तक राज्य सरकार को कई बिंदुओं पर जवाब देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा, क्या प्रशासक नियुक्त करने का आदेश सरकार जारी कर सकती थी? क्या राज्य सरकार पंचायत चुनाव कराने में नाकाम रही?
क्या यह व्यवस्था कार्यकाल बढ़ाने का तरीका है?
अदालत ने कहा कि यदि किसी प्रधान का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और उसी व्यक्ति को प्रशासक बनाकर पंचायत की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो क्या इसे उसके कार्यकाल का अप्रत्यक्ष विस्तार नहीं माना जाएगा? इस प्रश्न का जवाब संविधान और पंचायत चुनाव से जुड़े प्रावधानों के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है।
राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी उठे सवाल
निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने पर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पूछा कि क्या ऐसी व्यवस्था राज्य निर्वाचन आयोग के सांविधानिक अधिकारों को प्रभावित करती है। अदालत ने कहा कि पंचायत चुनाव समय पर कराना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बनाए रखना राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। ऐसे में प्रशासक नियुक्त करने की प्रक्रिया का चुनावी व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने पंचायतीराज विभाग के अपर मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होकर अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया था, जो पेश हुए। राज्य सरकार की ओर से मामले में नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर और मुख्य स्थाई अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह पेश हुए। उधर, याचियों के वकील पेश हुए।
अन्य जनहित याचिकाओं के साथ होगी सुनवाई
यह मामला संजय कुमार शर्मा द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत ने इस मुद्दे को पंचायत व्यवस्था से संबंधित अन्य लंबित जनहित याचिकाओं के साथ जोड़ने का निर्देश दिया है, ताकि सभी सांविधानिक पहलुओं पर एक साथ व्यापक सुनवाई हो सके।



