कविता के बाजार में, बिकती झूठी शान।
सच्चे शब्दों की यहाँ, कौन करे पहचान॥
तुकों की चकाचौंध में, खोया गहरा भाव।
शब्द सजाकर बेचते, सूना अपना गाँव॥
मंचों पर जयकार है, भीतर सूना ज्ञान।
ताली के व्यापार में, खो बैठा सम्मान॥
शब्दों का श्रृंगार है, मन में नहीं विचार।
कागज़ भरते जा रहे, कैसे सृजनहार॥
भाव बिना कविता लगे, जैसे सूना खेत।
बरसे चाहे शब्द तब, रहे रेत सब रेत॥
कलम उठी जब स्वार्थ से, मर जाते सब भाव।
शब्द बचे बस खोल से, डूब गई सब नाव॥
कवि वही जो सत्य की, रखे सदा पहचान।
शब्द नहीं, व्यवहार से, मिलता है सम्मान॥
——डॉ. प्रियंका सौरभ



