आँगन की मुस्कान…

नन्हे-नन्हे पाँव हैं, सपनों की उड़ान।

बचपन की किलकारियाँ, घर की हैं पहचान॥

साइकिल, गुड़िया, खिलौने, मन में भरे उमंग।

हँसते-गाते बालपन, जीवन के सत्संग॥

भाई-बहना संग मिले, प्रेम भरा व्यवहार।

छोटे-छोटे झगड़ों में, छिपा हुआ है प्यार॥

आँगन में मस्ती करें, जैसे चिड़िया झुंड।

इनकी भोली मुस्कान से, खिल उठते हैं कुंज॥

निष्छल मन, निर्मल हृदय, छल-कपट से दूर।

इनसे ही संसार में, रहता प्रेम भरपूर॥

माटी जैसे कोमल हैं, फूलों जैसे गाल।

ईश्वर का उपहार हैं, घर-आँगन के बाल॥

खेल-खेल में सीखते, जीवन के व्यवहार।

कल के उज्ज्वल सूर्य हैं, भारत का आधार॥

बचपन की हर याद को, रखिए सदा सँभाल।

क्षण ये फिर लौटें नहीं, अनमोल हैं ये बाल॥

….. डॉ. सत्यवान सौरभ

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