बादल है पर बूँद नहीं…

बादल है पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल।

प्यासे मन की देह पर, सूखा हर इक ताल॥

धरा तड़पती देखिए, फटते जाएँ खेत।

आशा के अंकुर सभी, माँग रहे हैं मेघ॥

आँखों में बरसात है, सूना नभ का भाल—

बादल है पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥

वादों वाले मेघ हैं, देते केवल शोर।

बरसे एक बूँद भी नहीं, सूखे गाँव-छोर॥

झूठी बातें ओढ़कर, चलते रोज़ दलाल—

बादल है पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥

रिश्तों के आकाश में, छाए काले मेघ।

प्रेम न बरसा एक भी, बढ़ते रहे विद्वेष॥

मन की बंजर भूमि पर, उगते केवल जाल—

बादल है पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥

सपनों के आकाश में, उड़ते रहे ख्याल।

मेहनत फिर भी ढूँढ़ती, खुशियों का मधुमास॥

आशा का दीपक जले, टूटे हर जंजाल—

बादल है पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥

‘सौरभ’ केवल बोल से, कब बदलें हालात।

बरसें कर्मों की घटा, तब महकें जज़्बात॥

सेवा, प्रेम, विश्वास से, भर जाए हर थाल—

बादल है पर बूँद नहीं, कैसी ऋतु की चाल॥

—–डॉ. सत्यवान सौरभ

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