अखिलेश के मुस्लिम किले पर ओवैसी की सियासी चोट

स्वदेश कुमार 
स्वदेश कुमार 

अमेरिका के मिशिगन में अब्दुल अल-सयद की जीत ने हजारों किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेट पहुंचने वाले पहले मुस्लिम नेता की सफलता को एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ दिया। उनका संदेश है अब ‘अब्दुल’ दूसरों की पार्टियों के लिए दरी नहीं बिछाएगा, खुद नेता और विधायक बनेगा। नारा असरदार है, लेकिन इसकी चुनावी राह आसान नहीं। सवाल है कि क्या ओवैसी असंतोष को भरोसे, संगठन और सीटों में बदल पाएंगे? तीन नवंबर 2026 को हुए अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सयद ने रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हराया। 42 वर्षीय अल-सयद डॉक्टर और मिशिगन के पूर्व सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी हैं। उनके अभियान में स्वास्थ्य सेवाएं, महंगाई, कामकाजी परिवारों की मुश्किलें और राजनीति में कॉरपोरेट धन का प्रभाव प्रमुख मुद्दे रहे। वह अमेरिकी सीनेट के पहले मुस्लिम सदस्य होंगे। लेकिन इसे केवल धार्मिक पहचान की जीत कहना उनकी राजनीति को छोटा करना होगा। उन्होंने पहचान के साथ आर्थिक परेशानियों को भी चुनावी विमर्श के केंद्र में रखा।

ओवैसी ने इस जीत को यूपी की सियासत का आईना बनाने की कोशिश की। चार नवंबर की पोस्ट में उन्होंने कहा कि मिशिगन में एक अब्दुल जीत गया, अब उत्तर प्रदेश के अब्दुल को अपनी सियासी पहचान मजबूत करनी होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘अब्दुल’ को तंज बनाया गया और मुस्लिम समाज को चुनाव में भीड़ और वोट की तरह इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन नेतृत्व और फैसलों में बराबर जगह नहीं मिलती। यह बात प्रतिनिधित्व की पुरानी शिकायत को छूती है। यह बहस केवल दलों की प्रतिस्पर्धा नहीं, लोकतंत्र में हिस्सेदारी, जवाबदेही और राजनीतिक आत्मसम्मान की भी कसौटी बनेगी। 2011 की जनगणना के अनुसार यूपी में मुस्लिम आबादी 19.26 प्रतिशत थी। यह बड़ा सामाजिक समूह है, लेकिन इसे एकमुश्त वोट बैंक मानना गलत होगा। पश्चिमी यूपी, रुहेलखंड, तराई और पूर्वांचल में स्थानीय समीकरण अलग हैं। कहीं उम्मीदवार की छवि, कहीं गठबंधन और कहीं भाजपा को हराने की संभावना निर्णायक होती है। मुस्लिम मतदाता भी एक जैसे फैसले नहीं लेते। इसलिए 143 सीटों पर उनके निर्णायक होने जैसे दावों को क्षेत्रवार प्रमाण के बिना दोहराना ठीक नहीं। संख्या राजनीतिक महत्व बताती है, हर सीट पर जीत की गारंटी नहीं।

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सपा की चुनौती इसलिए गंभीर है कि उसका मुस्लिम-यादव यानी एमवाई आधार लंबे समय से चुनावी ताकत रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को 32.06 प्रतिशत वोट मिले और उसने 111 सीटें जीतीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटें जीतकर विस्तार दिखाया। अखिलेश यादव ने पीडीए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए सामाजिक गठबंधन व्यापक बनाने की कोशिश की। इस सफलता में मुस्लिम समर्थन अहम रहा, मगर इसे केवल मुस्लिम वोटों का परिणाम बताना सरलीकरण होगा। अखिलेश के सामने दोहरी कसौटी है। उन्हें मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा भी बनाए रखना है और पिछड़े-दलित समूहों को भी साथ रखना है। टिकट वितरण, संगठन और फैसलों में मुस्लिम नेताओं की भूमिका सीमित दिखी तो ओवैसी का सवाल धार पकड़ेगा। हर सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारना समाधान नहीं; सपा को दिखाना होगा कि उसके मुस्लिम नेता प्रचार और वोट जुटाने तक सीमित नहीं, बल्कि नीति, संगठन और सत्ता में भी भागीदार हैं। भाजपा को रोकने के नाम पर स्थायी समर्थन मांगना पर्याप्त नहीं होगा।

ओवैसी की राह में सबसे बड़ी बाधा उनका चुनावी रिकॉर्ड है। 2022 में एआईएमआईएम ने करीब 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीती। उसे लगभग 4.51 लाख वोट और 0.49 प्रतिशत मत मिले। पार्टी ने मौजूदगी दर्ज कराई, पर विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं पा सकी। 2017 में भी उसका प्रदर्शन सीमित रहा। ‘अपना नेतृत्व’ बनाने की अपील को बूथ स्तर के संगठन, स्थानीय चेहरों और भरोसेमंद उम्मीदवारों से जोड़ना होगा। केवल सभाओं से 403 सीटों वाले राज्य में जमीन नहीं बनती। मुस्लिम युवाओं के बीच प्रतिनिधित्व का सवाल अहम हो सकता है। शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, छोटे कारोबार, सुरक्षा और स्थानीय निकायों में हिस्सेदारी उनकी चिंता हैं। केवल ‘अपना विधायक चुनो’ कहना काफी नहीं; यह भी बताना होगा कि वह स्कूल, अस्पताल, रोजगार और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए क्या करेगा। अल-सयद की जीत से सबक है कि पहचान के साथ नीतिगत मुद्दे जोड़ने पड़ते हैं। यूपी में भी शिक्षा, नौकरी, महंगाई और कानून-व्यवस्था पर ठोस प्रस्ताव जरूरी हैं।

भाजपा के लिए विपक्षी मतों का बंटवारा चुनावी गणित बदल सकता है। किसी करीबी सीट पर एआईएमआईएम सपा के समर्थकों का हिस्सा लेती है तो भाजपा को लाभ संभव है। लेकिन हर जगह ऐसा होगा, यह जल्दबाजी है। असर उम्मीदवार, मतदान प्रतिशत, गठबंधन और जीत के अंतर पर निर्भर करेगा। सपा का वोट घटने से भाजपा की जीत अपने आप तय नहीं होती; उसे भी अपने समर्थन का हिसाब देना होगा। मिशिगन और यूपी की तुलना की सीमा भी समझनी होगी। अमेरिका का चुनावी ढांचा, दल और सामाजिक संदर्भ भारत से अलग हैं। अल-सयद की जीत को यूपी में मुस्लिम राजनीति का तैयार मॉडल मानना भूल होगी। वहां उन्होंने व्यापक मतदाताओं के सामने आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य का एजेंडा रखा। यहां भी राजनीतिक ताकत केवल अलग पार्टी बनाने से नहीं, व्यापक समर्थन और शासन का भरोसा हासिल करने से बनेगी।

ओवैसी ने सपा के सामने असहज सवाल रखा है, लेकिन उनके सामने भी जवाबदेही है। क्या एआईएमआईएम केवल सपा के वोट काटेगी या कुछ सीटों पर जीतने लायक संगठन खड़ा करेगी? क्या वह मुस्लिम प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर दलितों, पिछड़ों और अन्य वंचित समूहों को जोड़ेगी? क्या उसके पास स्थानीय समस्याओं का स्पष्ट कार्यक्रम है? अखिलेश को भी बताना होगा कि पीडीए केवल चुनावी नारा नहीं, साझा नेतृत्व और हिस्सेदारी का वादा है। 2027 का चुनाव इस बहस की परीक्षा होगा। मुस्लिम मतदाता विदेशी जीत की नकल करके फैसला नहीं करेंगे; वे उम्मीदवार, भाजपा को चुनौती देने की क्षमता और मुद्दों पर दलों का रिकॉर्ड देखेंगे। ओवैसी ने ‘दरी’ के बहाने सम्मान और हिस्सेदारी का सवाल उठा दिया है। सपा उसे अनसुना नहीं कर सकती और एआईएमआईएम केवल नारे से जवाब नहीं दे सकती। वोट देने वाला समाज नेतृत्व चाहता है, लेकिन नेतृत्व का दावा करने वालों को जीतने की क्षमता और काम का खाका भी दिखाना होगा। मिशिगन ने संभावना दिखाई है; यूपी में उसका अर्थ मतदाता तय करेंगे।

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