मानवता का संदेश फैलाएँ, मस्जिद और शिवाले हों।
नीर प्रेम का भरा हो सबमें, ऐसे सबके प्याले हों।।
होली जैसे रंग बिखरें, दीपों की बारात सजी हो।
अंधियारे का नाम न हो, सबके पास उजाले हों।।
हो श्रद्धा और विश्वास सभी में, नैतिक मूल्यों के रखवाले हों।
संस्कृति का करें सभी पूजन, संस्कारों को अपनाने वाले हों।।
चौराहों पर अस्मत न लुटे, दुशासन फिर न बढ़ पाए।
भूख, गरीबी, आतंक मिटे, न देश में धंधे काले हों।।
सच्चाई को मिले आजादी, झूठ पर लग जाएँ ताले हों।
तन को कपड़ा, सिर को छाया, सबके हिस्से निवाले हों।।
दर्द किसी को छू न पाए, न किसी आँख से आँसू आएँ।
झोंपड़ियों के आँगन में भी, खुशियों के दीप जल जाएँ।।
‘जियो और जीने दो’ का, हर मन में संदेश निराला हो।
न चलें किसी पर बरछी-भाले, नाग न कोई पालने वाला हो।।
नगमों-सा हो जाए जीवन, फूलों से भर जाए आँगन।
सुख ही सुख हो सबके हिस्से, एक-दूजे को सब सँभालें।।
….. डॉ. प्रियंका सौरभ



