झूठ सजा दरबार में, सच खड़ा लाचार। न्याय माँगता रह गया, पीड़ित बारंबार।।
मंजिल पाने की धुन में, भूला जग व्यवहार। जीत मिली तो खो दिया, अपनों का संसार।।
समय बदलता जा रहा, बदले सबके रंग। सुख में अपने साथ हैं, दुख में छूटे संग।।
कर्म किए निष्काम जो, उन्हें मिला सम्मान। स्वार्थों में जो खो गए, खो बैठे पहचान।।
जीवन की हर राह में, मिलते कई सवाल। हिम्मत जिसका साथ दे, उसका हो उजियाल।।
मजबूरी की बेड़ियाँ, बाँधें बारंबार। फिर भी मन में पालिए, सपनों का संसार।।
भूखे पेट नसीब में, श्रम का मिला उपहार। मेहनत फिर भी झेलती, किस्मत की मार।।
निर्धन की आवाज को, सुने नहीं सरकार। धनवानों के नाम पर, सजता हर दरबार।।
विपदा से मत हारना, रख मन में विश्वास। रात भले ही हो कठिन, होगा नया प्रकाश।।
मानवता जब रो पड़ी, मौन हुआ संसार। पत्थर दिल के सामने, रोया प्रेम अपार।।
लाचारी को तोड़कर, बढ़ता वही महान। ठोकर खाकर जो उठे, जग में उसकी शान।।
…. डॉ. प्रियंका सौरभ



