कैसा फिर संन्यास…

तन पर चोला साधु का, मन में भरा विकार। कैसे होगा मुक्त वह, मन में हो संसार॥

लिप्त रहे निर्लिप्त बन, ओढ़े धर्म लिबास।मन से मोह न मिट सके, कैसा फिर संन्यास॥

वस्त्र बदलने से भला, बदल सके क्या चित्त।मन में लोभ-विकार हों, कैसे हो वह निर्लिप्त॥

माला लेकर हाथ में, मन में भरा विकार।कैसे भव से पार हो, अगर हो छल अपार॥

त्याग दिखावा कर रहे, मन में भरा ममत्व।कैसे संभव हो भला, निर्मल आत्मतत्त्व॥

काया पर वैराग्य है, मन में भोग-विलास।ऐसे झूठे त्याग से, कैसे मिटे पिपास॥

धर्म ध्वजा लेकर चलें, मन में भेद हजार।कैसे मानवता बचे, जब मन ही बीमार॥

बाहर से निर्मल दिखें, भीतर मैला भाव।ऐसे पाखंडों तले, दम तोड़े सद्भाव॥

वाणी में उपदेश हैं, आचरण में दोष।कैसे जग को राह दें, जिनमें भरा हो रोष॥

त्याग किया पर नाम का, चाह रहे सम्मान। मोह-मुक्त कैसे कहें, जो माँगें यशगान॥

देह सजाकर क्या मिला, मन का मैल न जाय। अंतर निर्मल हो तभी, सच्चा योग कमाय॥

नग्न विचारों से बढ़े, समाजों में विकार।संयम की मर्याद से, होता शुद्ध विचार॥

आडंबर की ओट में, पलता रहे अहंकार।कैसे सच्चा त्याग हो, मन में हो व्यापार॥

साधन बदले, वेश भी, बदला नहीं स्वभाव।कैसे नव निर्माण हो, जब मन में दुर्भाव॥

संयम केवल वेश ना, संयम मन का सार।जिसने मन को जीत लिया, उसका बेड़ा पार॥

भोग-विलास हृदय बसा, मुख पर त्याग-विचार। दोहरी जीव-रीति से, बढ़ता अत्याचार॥

मन की नग्न विकारिता, होती तन पर भार। भीतर शुचिता हो तभी, जीवन में उजियार॥

मोह मिटे, ममता घटे, निर्मल हो अहसास। तभी सार्थक साधना, तभी सच्चा संन्यास॥

——डॉ. प्रियंका सौरभ

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