दीयों से मनाएँ दीपावली, मिट्टी के दीये जलाएँ

दीयों से मनाएँ दीपावली, मिट्टी के दीये जलाएँ। परंपरा, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश।दीपावली केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, संस्कृति और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। आइए, इस दीपावली मिट्टी के दीये जलाकर स्वदेशी कारीगरों को प्रोत्साहित करें, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लें और खुशियों के साथ रोशनी का यह पर्व मनाएँ।

डॉ.प्रियंका सौरभ
डॉ.प्रियंका सौरभ

आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। दीपावली जैसे पावन पर्व पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा भी अब सिमटती जा रही है। उनकी जगह इलेक्ट्रॉनिक लाइटों, झालरों और अन्य कृत्रिम रोशनी ने ले ली है। यह बदलाव केवल हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी इसके दूरगामी परिणाम दिखाई दे रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण और अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि हम दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने तथा पटाखों से परहेज करने का संकल्प लें।

दीपावली का पर्व मिट्टी के दीयों से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह हमारी संस्कृति और आस्था में रचा-बसा त्योहार है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटने की खुशी में अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। तभी से कार्तिक मास की अमावस्या को दीपोत्सव मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। मिट्टी के दीये जलाना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति से जुड़ाव का भी प्रतीक है।

पिछले दो दशकों में कृत्रिम रोशनी का आकर्षण तेजी से बढ़ा है। आधुनिकता की चकाचौंध में हम अपनी पारंपरिक जीवनशैली से दूर होते जा रहे हैं। दीपावली पर बिजली की रंग-बिरंगी लाइटों और झालरों का प्रयोग बढ़ा है, वहीं तेज आवाज वाले पटाखों ने वायु और ध्वनि प्रदूषण की समस्या को गंभीर बना दिया है। इसका सबसे अधिक प्रभाव पर्यावरण, पशु-पक्षियों, बुजुर्गों, बच्चों और सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर पड़ता है।

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी है। मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों का परंपरागत व्यवसाय धीरे-धीरे प्रभावित हो रहा है। एक समय था जब दीपावली आने से कई सप्ताह पहले लोग कुम्हारों को दीयों के ऑर्डर दे दिया करते थे। उनके परिवार के सभी सदस्य दिन-रात मेहनत करके दीये तैयार करते थे। भले ही उनकी आमदनी बहुत अधिक नहीं होती थी, लेकिन अपनी कला और परंपरा को जीवित रखने का उत्साह उनमें अवश्य रहता था।

आज स्थिति बदल गई है। मिट्टी के दीयों की मांग घटने से कुम्हारों का उत्साह भी कम हुआ है। अनेक परिवार अपने पुश्तैनी व्यवसाय से दूर होकर दूसरे रोजगार अपनाने को मजबूर हैं। दीपावली पर अब कई घरों में केवल प्रतीकात्मक रूप से दो-चार मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं, जबकि अधिकांश सजावट इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और झालरों से की जाती है। हमें यह समझना होगा कि हमारी छोटी-सी पहल किसी कारीगर के परिवार के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। मिट्टी के दीये खरीदकर हम न केवल अपनी संस्कृति को बचाते हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की आजीविका को भी सहारा देते हैं।

मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा का अपना अलग सौंदर्य और महत्व है। सरसों के तेल से जलते दीये की लौ मन को एक विशेष शांति और आत्मीयता का अनुभव कराती है। दीये की सादगी और उसकी प्राकृतिक सुंदरता का मुकाबला कृत्रिम रोशनी नहीं कर सकती। मिट्टी के दीये स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक शिल्प से जुड़े होते हैं। हालांकि पर्यावरण संरक्षण के लिए उनका उपयोग करते समय तेल, बाती और अन्य संसाधनों का भी विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना चाहिए।

READ ALSO : धनतेरस की पूजा कैसे करें?

हमारी संस्कृति केवल दीये जलाने तक सीमित नहीं है। इसमें घरों की स्वच्छता, अच्छे पकवान बनाना, मिठाइयाँ बाँटना, पड़ोसियों और जरूरतमंदों को उपहार देना तथा आपसी प्रेम और सद्भाव बनाए रखना भी शामिल है। दीपावली का वास्तविक आनंद तभी है, जब हमारे घर के साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी खुशियों का उजाला पहुँचे।

आज की युवा पीढ़ी को विशेष रूप से इस दिशा में जागरूक होने की आवश्यकता है। संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की जिम्मेदारी युवाओं के कंधों पर है। उन्हें चाहिए कि वे इलेक्ट्रॉनिक सजावट के साथ-साथ मिट्टी के दीयों को भी प्राथमिकता दें। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय संगठनों के माध्यम से मिट्टी के दीयों के महत्व तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।

दीपावली प्रकाश, प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता का पर्व है। इसे प्रदूषण और दिखावे का उत्सव बनाने के बजाय सादगी और संवेदनशीलता के साथ मनाया जाना चाहिए। पटाखों से होने वाला धुआँ और शोर वातावरण को दूषित करने के साथ अनेक जीव-जंतुओं के लिए भी परेशानी का कारण बनता है। इसलिए हमें पटाखों से दूरी बनाकर स्वच्छ और सुरक्षित दीपावली मनाने का प्रयास करना चाहिए।

आइए, इस दीपावली हम सभी संकल्प लें कि अपने घरों में मिट्टी के दीये जलाएँगे, स्थानीय कुम्हारों से दीये खरीदेंगे, पटाखों से परहेज करेंगे और जरूरतमंदों के जीवन में खुशियों का प्रकाश फैलाएँगे। मिट्टी के दीये हमारी संस्कृति, परंपरा, श्रम और आत्मनिर्भरता के प्रतीक हैं। इन्हें अपनाकर हम अपनी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचा सकते हैं।

याद रखिए, दीपावली की असली रोशनी बिजली की झालरों में नहीं, बल्कि मिट्टी के दीयों की लौ, आपसी प्रेम और मानवता के उजाले में है।

Related Articles

Back to top button