Sunday, March 15, 2026
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आईसीसी में ‘नो हैंडशेक’,आईपीएल में पाकिस्तानी?

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आईसीसी में ‘नो हैंडशेक’,आईपीएल में पाकिस्तानी?
आईसीसी में ‘नो हैंडशेक’,आईपीएल में पाकिस्तानी?
प्रियंका सौरभ
डॉ.प्रियंका सौरभ

सोशल मीडिया पर कुछ उपयोगकर्ताओं ने अबरार अहमद के पुराने पोस्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि उन्होंने भारत से जुड़े सैन्य घटनाक्रमों पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। इसके बाद कुछ समूहों ने सनराइजर्स ब्रांड के खिलाफ बहिष्कार की मांग शुरू कर दी और कई हैशटैग चलने लगे। अनेक पोस्टों में टीम प्रबंधन और विशेष रूप से काव्या मारन की आलोचना की गई। इस प्रकार एक खिलाड़ी की खरीद का मामला केवल खेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय भावना और राजनीतिक संदर्भों से भी जुड़ गया।

क्रिकेट लंबे समय से भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद संवाद और संपर्क का एक माध्यम माना जाता रहा है। कई अवसरों पर यह खेल कूटनीतिक पुल की तरह भी काम करता रहा है, जिसने राजनीतिक मतभेदों के बीच भी दोनों देशों के लोगों को जोड़ने में भूमिका निभाई। किंतु हाल के वर्षों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, डिजिटल मीडिया की तीखी प्रतिक्रियाएँ और राष्ट्रवादी भावनाओं की तीव्रता ने इस परंपरा को चुनौती देना शुरू कर दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में इंग्लैंड की फ्रेंचाइज़ी लीग द हंड्रेड की 2026 की नीलामी में पाकिस्तानी स्पिनर अबरार अहमद को सनराइजर्स लीड्स द्वारा खरीदे जाने के बाद एक नया विवाद सामने आया। यह टीम भारतीय आईपीएल फ्रेंचाइज़ी सनराइजर्स हैदराबाद से जुड़ी मानी जाती है और इसके साथ काव्या मारन का नाम भी जोड़ा जाता है। खेल की एक सामान्य नीलामी का यह निर्णय देखते ही देखते सोशल मीडिया की बहस, राष्ट्रीय भावना और वैश्विक क्रिकेट की स्वायत्तता से जुड़ी बड़ी चर्चा में बदल गया।

मार्च 2026 में आयोजित इस नीलामी में सनराइजर्स लीड्स ने अबरार अहमद को लगभग 1.9 लाख पाउंड में अपनी टीम में शामिल किया। टीम प्रबंधन के अनुसार यह निर्णय पूरी तरह क्रिकेटीय आवश्यकताओं के आधार पर लिया गया था। टीम को मध्य ओवरों में विकेट लेने वाले एक विदेशी स्पिनर की आवश्यकता थी, क्योंकि उनके प्रमुख स्पिनर आदिल रशीद किसी अन्य फ्रेंचाइज़ी से जुड़ चुके थे। टीम के कोच डेनियल विट्टोरी ने भी स्पष्ट किया कि चयन कई विकल्पों पर विचार करने के बाद किया गया और अबरार टीम की रणनीति के अनुसार सबसे उपयुक्त खिलाड़ी थे। इंग्लैंड के क्रिकेट प्रशासनिक निकाय इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने भी यह रुख दोहराया कि लीग में खिलाड़ियों का चयन उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर नहीं, बल्कि उनके प्रदर्शन और टीम की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है।

हालांकि यह निर्णय जल्द ही विवाद का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर कुछ उपयोगकर्ताओं ने अबरार अहमद के पुराने पोस्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि उन्होंने भारत से जुड़े सैन्य घटनाक्रमों पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। इसके बाद कुछ समूहों ने सनराइजर्स ब्रांड के खिलाफ बहिष्कार की मांग शुरू कर दी और कई हैशटैग चलने लगे। अनेक पोस्टों में टीम प्रबंधन और विशेष रूप से काव्या मारन की आलोचना की गई। इस प्रकार एक खिलाड़ी की खरीद का मामला केवल खेल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय भावना और राजनीतिक संदर्भों से भी जुड़ गया।

भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट संबंधों को समझे बिना इस विवाद को पूरी तरह समझना कठिन है। दोनों देशों के बीच क्रिकेट लंबे समय से राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित रहा है। 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद से पाकिस्तान के खिलाड़ियों को इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में शामिल नहीं किया गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय क्रिकेट श्रृंखलाएँ भी लगभग समाप्त हो गईं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दोनों टीमें आमने-सामने खेलती रही हैं और इन मुकाबलों में खेल के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना भी तीव्र रूप में दिखाई देती है।

हाल के वर्षों में कुछ मैचों के बाद खिलाड़ियों के बीच पारंपरिक हाथ मिलाने की रस्म को लेकर भी चर्चा हुई। उदाहरण के तौर पर एक मुकाबले के बाद भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव और पाकिस्तानी कप्तान सलमान अली आगा के बीच हाथ न मिलाने की घटना मीडिया में चर्चा का विषय बनी। इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि खेल और राजनीति को पूरी तरह अलग रखना हमेशा संभव नहीं होता, विशेषकर तब जब दोनों देशों के संबंध पहले से ही संवेदनशील हों।

इस विवाद को आधुनिक फ्रेंचाइज़ी क्रिकेट के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। पिछले एक दशक में क्रिकेट का स्वरूप काफी बदल गया है। आईपीएल, द हंड्रेड और अन्य टी-20 लीगों ने क्रिकेट को एक वैश्विक व्यावसायिक उद्योग का रूप दे दिया है। इन लीगों में खिलाड़ी विभिन्न देशों की टीमों के लिए खेलते हैं और टीम मालिक भी अलग-अलग देशों से आते हैं। ऐसे में खिलाड़ियों का चयन अक्सर पूरी तरह पेशेवर मानकों के आधार पर किया जाता है। टीमों का प्राथमिक उद्देश्य प्रतिस्पर्धी संयोजन तैयार करना होता है, न कि राष्ट्रीय राजनीति के आधार पर निर्णय लेना। सनराइजर्स लीड्स का निर्णय भी इसी दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।

क्रिकेट के तकनीकी दृष्टिकोण से देखें तो अबरार अहमद का चयन पूरी तरह तार्किक भी माना जा सकता है। आधुनिक सीमित ओवरों के क्रिकेट में लेग स्पिनरों की मांग तेजी से बढ़ी है, क्योंकि वे बल्लेबाजों को चौंकाने और मध्य ओवरों में विकेट लेने की क्षमता रखते हैं। अबरार की गेंदबाजी की खासियत उनकी तथाकथित “मिस्ट्री स्पिन” है, जिसमें पारंपरिक लेग ब्रेक, गुगली और अन्य विविधताओं का मिश्रण होता है। इस प्रकार की गेंदबाजी बल्लेबाजों के लिए अनुमान लगाना कठिन बना देती है। विशेष रूप से टी-20 और 100 गेंदों के प्रारूप में ऐसे गेंदबाज मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं।

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सोशल मीडिया की भूमिका भी है। डिजिटल मंचों ने खेल प्रशंसकों को अपनी राय व्यक्त करने का शक्तिशाली माध्यम दिया है। अब प्रशंसक केवल दर्शक नहीं रहे, बल्कि वे सीधे तौर पर टीमों और खिलाड़ियों पर दबाव भी बना सकते हैं। सनराइजर्स लीड्स के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध—दोनों प्रकार की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। कुछ लोगों का मानना था कि खेल को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए और खिलाड़ियों को उनके कौशल के आधार पर आंका जाना चाहिए, जबकि कुछ लोगों ने यह तर्क दिया कि राष्ट्रीय भावना और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) और राष्ट्रीय क्रिकेट बोर्डों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय क्रिकेट प्रशासनिक संस्था भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) ने इस मामले पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, किंतु यह स्पष्ट है कि भारतीय बाजार का वैश्विक क्रिकेट पर गहरा प्रभाव है और किसी भी विवाद का असर फ्रेंचाइज़ी ब्रांडों पर पड़ सकता है।

अंततः क्रिकेट की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैश्विकता और खेल भावना है। यदि इस खेल को सचमुच सीमाओं से ऊपर उठना है, तो खिलाड़ियों का मूल्यांकन उनके कौशल, मेहनत और प्रदर्शन के आधार पर होना चाहिए—न कि केवल उनके देश या राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर।