
भक्ति की आँधी चली, डोला फिर इंसाफ।
जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।
कल जिन पर आरोप थे, गूँजा था दरबार,
आज वही फिर घूमते, लेकर भक्त-अपार।
सत्ता, श्रद्धा, भीड़ ने, बदले सभी हिसाब—
जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।
अंध-भक्ति के शोर में, दबता जाता सत्य,
प्रश्न उठाना हो गया, जैसे कोई कृत्य।
कानूनों के सामने, झुकता नहीं रुआब—
जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।
भक्तों की आँखों तले, बाबा बने महान,
लगती हर आलोचना, उन पर अब अपमान।
विवेकों की भूमि पर, उग आया सैलाब—
जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।
राजनीति भी देखती, भीड़ों का आकार,
मतदानों के गणित में, खोता न्याय-विचार।
सत्ता के गलियारों में, चलता अलग आदाब—
जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।
सच्ची भक्ति वह नहीं, जो दे अंध-विचार,
धर्म वही जो सत्य से, जोड़े हर व्यवहार।
‘सौरभ’ जागो देश अब, समझो यह किताब—
जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।
—– डॉ.सत्यवान सौरभ























