Wednesday, May 27, 2026
Advertisement
Home साहित्य जगत https://shorturl.at/QKcp8

https://shorturl.at/QKcp8

22
जेलों से भी लौटकर,मिलता वैभव-लाभ
जेलों से भी लौटकर,मिलता वैभव-लाभ

भक्ति की आँधी चली, डोला फिर इंसाफ

जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।

कल जिन पर आरोप थे, गूँजा था दरबार,

आज वही फिर घूमते, लेकर भक्त-अपार।

सत्ता, श्रद्धा, भीड़ ने, बदले सभी हिसाब—

जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।

अंध-भक्ति के शोर में, दबता जाता सत्य,

प्रश्न उठाना हो गया, जैसे कोई कृत्य।

कानूनों के सामने, झुकता नहीं रुआब—

जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।

भक्तों की आँखों तले, बाबा बने महान,

लगती हर आलोचना, उन पर अब अपमान।

विवेकों की भूमि पर, उग आया सैलाब—

जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।

राजनीति भी देखती, भीड़ों का आकार,

मतदानों के गणित में, खोता न्याय-विचार।

सत्ता के गलियारों में, चलता अलग आदाब—

जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।

सच्ची भक्ति वह नहीं, जो दे अंध-विचार,

धर्म वही जो सत्य से, जोड़े हर व्यवहार।

‘सौरभ’ जागो देश अब, समझो यह किताब—

जेलों से भी लौटकर, मिलता वैभव-लाभ।।

—– डॉ.सत्यवान सौरभ