कुएँ बावड़ी रो रहे, सूखे सब जलस्रोत…

बूँद-बूँद से सिंधु है, बूँदों से संसार।

जल बिन सूना ये जगत, जल से ही उद्धार॥

सूखे नद-नाले सभी, प्यासा हुआ जहान।

जल संरक्षण कीजिए, सुन लो हे इंसान॥

धरती माँ की गोद में, जल अमृत की खान।

व्यर्थ न इसको बहाइए, रखिए इसका मान॥

मेघ बरसते प्रेम से, भरते नदिया-ताल।

जल से हरियाली रहे, जल से सब खुशहाल॥

कुएँ बावड़ी रो रहे, सूखे सब जलस्रोत।

जल बच जाए आज तो, कल रहे ओतप्रोत॥

प्यासे पंछी पूछते, कहाँ गया वह नीर।

जल के बिन सूना लगे, जीवन होकर पीर॥

ताल-तलैया सूखते, सूखे खेत-खलिहान।

जल बिन कैसे जीवित रहे, पशु-पक्षी इंसान॥

जल है तो कल भी रहे, जल से जीवन-राग।

जल की रक्षा कीजिए, यही समय की माँग॥

वर्षा जल को रोककर, भर लो अपने कूप।

जल संकट से बच सके, गाँव नगर और रूप॥

नदियाँ माँ की गोद हैं, मत करना अपमान।

जल को निर्मल रखिए, यही सच्चा सम्मान॥

पेड़ लगाओ प्रेम से, आएँगे फिर मेघ।

जल-संकट मिट जाएगा, हरे होंगे सब खेत॥

जल की कीमत तब समझ, जब सूखें सब स्रोत।

बूँद-बूँद को जोड़कर, जीवन हो ओतप्रोत॥

प्रकृति देती चेतना, सुनिए उसका गान।

जल बचाना धर्म है, यही सच्चा अभियान॥ —–डॉ. प्रियंका सौरभ

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