चंदा चोरी में न्यास से जुड़े सरकारी नुमाइंदों पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

अजय कुमार
अजय कुमार

             लखनऊ। प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या में प्रभु रामलला मंदिर न्यास के भीतर जो चंदा सम्बंधी अनियमितता और चोरी का मामला सामने आया, वह न केवल धन के लेन-देन की सवालिया निशानियों को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि न्यास और सरकारी पदों के बीच किस तरह का गहन घालमेल होता है। दरअसल, राम लला के मंदिर में चंदा चोरी के पीछे विश्वासघात दो पक्ष दिखाई दे रहे हैं, एक, जो सार्वजनिक विश्वास का स्वामी है, और दूसरा, जो उसी विश्वास का रखवाला बनकर उसमें हेरफेर करता है। यह मामला उसी द्वंद्व का मानवीय और प्रशासकीय चित्र है। प्रभु राम लला के मंदिर में चंदा चोरी का मामला तब जनता के समक्ष आया जब मद्दे नज़र चंदा खाते के असामान्य रिकार्ड, निकासी और लेन-देन की रिपोर्टें आईं। सूचनाओं के आधार पर एक विशेष जांच दल ने प्रारंभिक जाँच की और कुछ लोगों के खिलाफ गिरफ़्तारी भी हुई। पर आश्चर्य यह है कि न्यास का गठन और उसमें पदेन शामिल सरकारी अनुशासन पर किसी भी प्रकार की पूछताछ की आवाज़ सुनी नहीं गयी। यही वह बिंदु है जहाँ आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हुआ और प्रश्न उभरे कि क्या किसी अमुक अधिकारी ने अपनी पदेन उपस्थिति का दायित्व पूरी तरह निभाया या नहीं।

गौरतलब है, राम लला मंदिर न्यास में धार्मिक, सामाजिक और सरकारी प्रतिनिधि साथ मिलकर कार्य करते हैं। कई बार जिलाधिकारी, पुलिस प्रमुख, कर विभाग या स्थानीय शासकीय अधिकारी न्यास के आचार-नियमों के अनुसार पदेन सदस्य होते हैं। यह व्यवस्था इसलिए होती है ताकि मंदिर-सम्बन्धी संपत्ति और सार्वजनिक व्यवस्था में सरकारी निगरानी बनी रहे। पर जब उसी व्यवस्था के माध्यम से चंदे की हेराफेरी हो, तो सवाल उठते हैं कि पदेन सदस्य किस हद तक अपनी जवाबदेही निभा रहे थे। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो समय-समय पर कई आईएएस और अन्य अधिकारी न्यास के साथ जुड़े रहे हैं। जिलाधिकारी की उपस्थिति स्वाभाविक रही है क्योंकि जिलाधिकारी का कर्तव्य स्थानीय शांति-व्यवस्था और सरकारी नियमों का संरक्षण करना है। जिलाधिकारी के अलावा पुलिस अधीक्षक, उपजिलाधिकारी, तथा कर और राजस्व सम्वंधी अधिकारी भी न्यास की बैठकों में अक्सर शामिल होते रहे हैं। कुछ नाम सार्वजनिक अभिलेखों और सूचनाओं में दिखते हैं, पर इन्हें यहाँ सीधे आरोपी नहीं दर्शाया जा सकता। यही कारण है कि अब तक आधिकारिक बयान और जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है कि किन-किन अधिकारियों का वक्तव्य रिकॉर्ड हुआ और किस स्तर की जवाबदेही तय की जायेगी।

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यह भी ध्यान देने योग्य है कि सरकारी अधिकारी जब पदेन सदस्य के रूप में किसी न्यास से जुड़े होते हैं तो उनका कर्तव्य स्पष्ट होता है, पारदर्शिता सुनिश्चित करना, लेखा-जोखा का लेखा परीक्षण करवाना और सभी कानूनी नियमों का पालन कराना। यदि इन कर्तव्यों में कोई चूक हुई हो, तो साधारण लोक मान्यताओं के अनुसार उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। पर व्यवहार में प्रशासनिक अनुशासन के नियम, विभागीय जांच और सेवा नियमों की प्रक्रियाएँ कठिन और धीमी हो सकती हैं, इसलिए जनता में असंतोष उभरता है कि तुरंत किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही। ध्यान देने वाली बात यह है कि वित्तीय अनियमितता अक्सर कुशलता से गुप्त रखी जाती है। चंदे के बहाव को पतला करने के लिए कई माध्यम अपनाये जा सकते हैं अलग-अलग खातों में विभाजन, औपचारिक दस्तावेजों में छेड़छाड़, और लेखा-जोखा में देरी यह सब भ्रष्टाचार के हथकंडे हैं। जब जांच दल ने गहन जाँच की तो कहीं-कहीं उन प्रक्रियाओं के निशान मिले जो बतलाते हैं कि लंबे समय से व्यवधान की गुंजाइश मौजूद थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पदेन सरकारी निगरानी उपस्थिति सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई थी, या क्या किसी पदाधिकारी ने जानबूझकर दृष्टि अंधी की।

नागरिकों का भरोसा धार्मिक संस्थाओं पर तभी बना रहता है जब प्रशासनिक तथा धार्मिक नेतृत्व दोनों पारदर्शी और जवाबदेह हों। आज जब चंदे की चोरी जैसे आरोप सामने आते हैं, तो सिर्फ पकड़ या गिरफ़्तारी ही समाधान नहीं है। एक ठोस लेखा-जोखा प्रणाली, नियमित बाह्य लेखा-निरीक्षण, और न्यास के कामकाज में नागरिकों की निगरानी जैसी व्यवस्थाएँ लागू होनी चाहिएं। साथ ही, पदेन जुड़े सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर स्पष्ट दिशानिर्देश और समय-समय पर उनकी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया भी आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसी घटना को रोका जा सके।इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय लोकनेता और समाज-सेवी भी सक्रिय हुए हैं। उन्होंने मांग की है कि जिन अधिकारियों ने न्यास की देखरेख में खामी की, उनकी जिम्मेदारी तय की जाए। साथ ही, जनता जानना चाहती है कि वर्तमान समय में किन-किन सरकारी अधिकारियों का नाम न्यास से जुड़ा हुआ दर्ज है। यह जानकारी आम तौर पर न्यास के दायर दस्तावेजों, सरकारी आदेशों और स्तरवार बैठकों के अभिलेखों में मिलती है। पर प्रशासनिक जवाबदेही और गोपनीयता के कारण हर विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाता। इसलिए नागरिक संगठन और कुछ पत्रकार इन अभिलेखों की माँग कर रहे हैं ताकि पारदर्शिता लाई जा सके। 

यदि हम सामर्थ्य से देखें, तो अभी जो कदम उठने चाहिए वे स्पष्ट हैं: जांच का परिधि बढ़ाना, लेखा-जोखा का सार्वजनिक करना, और पदेन जुड़े सरकारी अधिकारियों की सक्रिय जाँच। इसके साथ ही, संबंधित विभागों को निर्देश मिलने चाहिए कि भविष्य में न्यास के वित्तीय लेन-देन पर नियमित अंतराल पर निगरानी रखी जाये। स्थानीय प्रशासन को भी यह बताना होगा कि जिलाधिकारी और अन्य पदेन सदस्य किस तरह से अपनी निगरानी का लेखा-जोखा रखते हैं, क्या वे नियमित रिपोर्ट लेते हैं, क्या बाह्य लेखा-निदेशक के आदेश लागू होते हैं, और क्या समय-समय पर लेखा परीक्षण कराया जाता है। नहीं भूलना चाहिए कि चंदा चोरी के बाद अब जनता का विश्वास तब लौटेगा जब पारदर्शिता और कानून का समुचित पालन दोनों साथ हों। चंदा केवल धन नहीं, वह भरोसे का प्रमाण है। जब उसी भरोसे को ठेस पहुँचती है, तो केवल कुछ पकड़े जाने भर से काम नहीं चलता। गहन, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच की आवश्यकता है, ताकि दोषी चाहे किसी भी पद पर हों, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई हो सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए मजबूत रोकथाम तैयार की जाए।

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