अहंकार का समर्पण ही ईश्वर को सच्ची भेंट!

ईश्वर को धन नहीं, अपना ‘मैं’ समर्पित कीजिए। क्योंकि सबसे बड़ी भेंट वही है, जिसे छोड़ना हमारे लिए सबसे कठिन है। अहंकार का समर्पण ही ईश्वर को सच्ची भेंट, जानिए गीता में क्यों कहा गया है निरहंकार जीवन को शांति का मार्ग।

राजू यादव
राजू यादव

ईश्वर को हम अक्सर अन्न, धन, वस्त्र, फल-फूल और तरह-तरह की वस्तुएं अर्पित करते हैं। लेकिन एक गहरा आध्यात्मिक प्रश्न यह है कि जिस परम सत्ता ने संसार की हर वस्तु हमें प्रदान की है, उसे हम वास्तव में ऐसा क्या दे सकते हैं जो उसके पास पहले से मौजूद न हो? ईश्वर परम संपदावान हैं। संसार की समस्त संपत्ति, अन्न, धन और वैभव उन्हीं की देन मानी जाती है। ऐसे में मनुष्य द्वारा उन्हीं की दी हुई वस्तुओं में से थोड़ा सा भाग उन्हें अर्पित करना श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक तो हो सकता है, लेकिन वह वस्तु ईश्वर के लिए किसी कमी की पूर्ति नहीं करती। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो ईश्वर को दी जाने वाली सबसे मूल्यवान भेंट हमारा अपना अहंकार है।

ईश्वर को क्या अर्पित करें?

व्यवहार में भी हम किसी व्यक्ति को वही वस्तु देते हैं, जो उसके पास नहीं होती। यदि उसके पास कोई वस्तु पहले से ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद है तो उसी वस्तु को दोबारा देने का प्रयोजन सीमित हो जाता है। ठीक यही बात आध्यात्मिक जीवन पर भी लागू होती है। ईश्वर के पास संसार की समस्त संपदा का भंडार है। इसलिए यदि मनुष्य ईश्वर को कुछ देना चाहता है, तो उसे अपनी सबसे बड़ी आंतरिक संपत्ति—‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव—समर्पित करना चाहिए। मनुष्य के भीतर अहंकार ही वह भाव है, जो उसे ईश्वर से अलग होने का भ्रम पैदा करता है।

गीता में अहंकार और शांति का संबंध

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे व्यक्ति को वास्तविक शांतिप्राप्त बताया है, जो कामनाओं, ममता और अहंकार से मुक्त हो जाता है।मनुष्य की अशांति का एक बड़ा कारण उसका ‘मैं’ और ‘मेरा’ है। जब हर चीज अपने मन के अनुसार चाहने लगते हैं, तो अपेक्षाएं बढ़ती हैं और अपेक्षाओं के साथ दुख भी बढ़ता जाता है। अर्थात जो मनुष्य कामनाओं से मुक्त होकर ममता और अहंकार का त्याग कर देता है, वही सच्ची शांति प्राप्त करता है।

अहंकार कहता है—“सब कुछ मेरे अनुसार हो।” समर्पण कहता है—“जो होगा, ईश्वर की इच्छा से होगा।”

“विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति॥”श्रीमद्भगवद्गीता 2.71

इस श्लोक का भावार्थ है कि जो मनुष्य सभी कामनाओं का त्याग कर, इच्छाओं से मुक्त होकर, ममता और अहंकार से रहित जीवन जीता है, वही वास्तविक शांति को प्राप्त करता है। यह संदेश आज के जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है। मनुष्य की अनेक परेशानियां ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से जुड़ी होती हैं। जब अपेक्षाएं बढ़ती हैं, तो उनके पूरा न होने पर दुख उत्पन्न होता है। जब अहंकार को ठेस पहुंचती है, तो क्रोध और तनाव जन्म लेते हैं।

अहंकार से जन्म लेते हैं स्वार्थ और असंख्य कामनाएं

अहंकार केवल स्वयं को श्रेष्ठ समझने तक सीमित नहीं है। इससे ममभाव, स्वार्थ, अपेक्षा और अनेक इच्छाओं का जन्म होता है। मनुष्य जब हर उपलब्धि का श्रेय स्वयं को देने लगता है और हर परिस्थिति को अपने अनुसार देखना चाहता है, तब भीतर संघर्ष बढ़ने लगता है। इसके विपरीत जब वह अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना सीखता है, तो मन हल्का होने लगता है।

अहंकार कम होता है तो अपेक्षाएं कम होती हैं और अपेक्षाएं कम होती हैं तो जीवन में शांति के लिए स्थान बढ़ता है।

क्या संसार छोड़ना ही संन्यास है?

नहीं। सच्चा संन्यास केवल घर-परिवार या संसार छोड़ देने का नाम नहीं है। अहंकार, स्वार्थ, आसक्ति और अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करना ही संन्यास का गहरा अर्थ है। मनुष्य संसार में रहते हुए भी संन्यासी भाव से जीवन जी सकता है। अपने कर्तव्यों को निभाते हुए कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित करना, सफलता में अहंकार न करना और असफलता में निराश न होना—यही भीतर के संन्यास की दिशा है। संन्यास को अक्सर संसार और भौतिक जीवन से दूरी बनाने के अर्थ में देखा जाता है। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से संन्यास का एक गहरा अर्थ भीतर के त्याग से भी जुड़ा है।

संसार छोड़ना आसान हो सकता है, लेकिन संसार में रहकर ‘मैं’ और ‘मेरा’ छोड़ देना ही वास्तविक साधना है। भगवद्गीता का संदेश भी यही है कि कामनाओं, ममता और अहंकार से मुक्त होकर मनुष्य शांति प्राप्त करता है।

अहंकार, स्वार्थ और आसक्ति का विवेकपूर्वक त्याग करना भी संन्यास का एक महत्वपूर्ण रूप है।

मनुष्य संसार में रहते हुए भी अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर सकता है। परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए भी वह ‘मैं ही सब कुछ करता हूं’ के अहंकार से मुक्त हो सकता है।

सच्ची भक्ति में क्या है सबसे बड़ा समर्पण?

ईश्वर के चरणों में धन-संपत्ति अर्पित करना श्रद्धा का एक माध्यम हो सकता है, लेकिन उससे भी बड़ा समर्पण तब होता है जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़ देता है। जब सफलता मिले तो अभिमान न हो, असफलता आए तो स्वयं को टूटने न दें, सम्मान मिले तो स्वयं को दूसरों से बड़ा न समझें और अपमान मिले तो विवेक न खोएं—यही निरहंकार जीवन की दिशा है। ईश्वर को पाने की यात्रा बाहर की वस्तुओं के त्याग से अधिक भीतर के अहंकार के त्याग की यात्रा है।

अहंकार छोड़ने से जीवन में क्या बदलाव आता है?

अहंकार का त्याग मनुष्य के व्यवहार और सोच दोनों को प्रभावित कर सकता है।

  • दूसरों के प्रति सम्मान की भावना बढ़ती है।
  • सफलता में अभिमान कम होता है।
  • असफलता को स्वीकार करने की क्षमता बढ़ती है।
  • अपेक्षाओं और अनावश्यक इच्छाओं पर नियंत्रण आता है।
  • स्वार्थ की जगह सेवा की भावना विकसित होती है।
  • मन में शांति और संतुलन का अनुभव बढ़ सकता है।
  • जीवन के प्रति कृतज्ञता की भावना मजबूत होती है।

ईश्वर को सबसे बड़ी भेंट क्या दें?

ईश्वर को अर्पित की जाने वाली वस्तुओं की कोई कमी नहीं है। लेकिन यदि मनुष्य वास्तव में अपनी ओर से कुछ ऐसा समर्पित करना चाहता है, जो उसके आध्यात्मिक जीवन को बदल सके, तो उसे अपने अहंकार, ममता, स्वार्थ और अनावश्यक आसक्तियों को ईश्वर के चरणों में अर्पित करना चाहिए। क्योंकि धन-संपत्ति बाहर की वस्तुएं हैं, जबकि अहंकार भीतर बैठा हुआ वह भाव है, जो मनुष्य को स्वयं से और परम सत्ता से दूर कर सकता है।

ईश्वर परम संपदावान हैं। अन्न, धन, संपत्ति और संसार की हर वस्तु उन्हीं की देन है। फिर उन्हीं की दी हुई वस्तु में से थोड़ा-सा उन्हें अर्पित करने से बड़ा समर्पण क्या हो सकता है? मनुष्य के पास ‘मेरा’ कहने को बहुत कुछ है, लेकिन वास्तव में सबसे मजबूत पकड़ उसके ‘मैं’ पर होती है। यही अहंकार उसे स्वार्थ, ममता और असंख्य इच्छाओं से बांधता है।

इसलिए ईश्वर के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि हमने उन्हें कितना दिया, बल्कि यह है कि हमने अपने भीतर का कितना ‘मैं’ उनके चरणों में समर्पित किया।

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