आज उजागर हो गई, मंदबुद्धि की सोच। देशद्रोह की बढ़ रही, मन में खूब खरोंच॥
मान नहीं राष्ट्रध्वज का, मन में भरा विकार। मातृभूमि के मान पर, करते खूब प्रहार॥
सर्वोपरि स्वारथ सदा, राष्ट्र रहे है नोच। देशद्रोह की बढ़ रही, मन में खूब खरोंच॥
आजादी का अर्थ क्या, समझ न पाए लोग। अधिकारों की आड़ में, देश-विरोधी रोग।।
माटी का उपकार खा, लड़े पाक से चोंच। देशद्रोह की बढ़ रही, मन में खूब खरोंच॥
भले असहमति मान है, लोकतंत्र की शान। लेकिन राष्ट्र-विरोध को, कैसे दें सम्मान।।
वाणी में संयम रहे, मर्यादा की हो सोच। देशद्रोह की बढ़ रही, मन में खूब खरोंच॥
देश प्रथम का भाव ही, भारत की पहचान। माँ भारती के मान से, ऊँचा कब सम्मान।।
भेदभाव सब छोड़कर, छोड़ो मन की मोच। देशद्रोह की बढ़ रही, मन में खूब खरोंच॥
गलती अपनी मानकर, ले लो सही सुधार। राष्ट्रहितों के मार्ग पर, बढ़ना है हर बार।।
विवेक हो मन में तभी, मिटे भीतर खरोंच। देशद्रोह की बढ़ रही, मन में खूब खरोंच॥
….. डॉ. सत्यवान सौरभ


