बिना सुई, बिना खून: सांस से होगी डायबिटीज की जांच

डॉ.विजय गर्ग 

डायबिटीज आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जीवनशैली संबंधी बीमारियों में से एक है। भारत में करोड़ों लोग इससे प्रभावित हैं और हर वर्ष नए मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई लोगों को लंबे समय तक पता ही नहीं चलता कि वे मधुमेह से ग्रस्त हैं। समय पर जांच और नियमित निगरानी ही इसके प्रभाव को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है। अब विज्ञान ने इस दिशा में एक नई उम्मीद जगाई है। वैज्ञानिकों ने ऐसा अत्याधुनिक नैनो-सेंसर विकसित किया है जो बिना सुई चुभाए और बिना खून की जांच किए केवल सांस के विश्लेषण से डायबिटीज का संकेत दे सकता है।

मानव की सांस में अनेक प्रकार की गैसें और रासायनिक यौगिक मौजूद होते हैं। जब शरीर में किसी बीमारी के कारण जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं, तो उनका प्रभाव सांस में निकलने वाले वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों  पर भी दिखाई देता है। डायबिटीज के मरीजों में विशेष रूप से एसीटोन  की मात्रा बढ़ जाती है। यही परिवर्तन नए नैनो-सेंसर की पहचान का आधार है।

यह नैनो-सेंसर अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर एसीटोन जैसी गैसों की सांद्रता का पता लगाने में सक्षम है। व्यक्ति को केवल सेंसर में सांस छोड़नी होगी और कुछ ही क्षणों में परिणाम प्राप्त हो सकता है। यदि तकनीक व्यापक रूप से सफल होती है, तो भविष्य में डायबिटीज की प्रारंभिक जांच पहले से कहीं अधिक सरल, तेज और सुविधाजनक हो जाएगी।

वर्तमान में डायबिटीज की जांच के लिए उंगली से खून निकालकर ग्लूकोज की जांच या प्रयोगशाला में रक्त परीक्षण कराया जाता है। कई लोगों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए बार-बार सुई चुभवाना असुविधाजनक होता है। यही कारण है कि अनेक मरीज नियमित जांच से बचते हैं। सांस आधारित जांच इस समस्या का समाधान प्रस्तुत कर सकती है। यह पूरी तरह गैर-आक्रामक  तकनीक है, जिसमें न दर्द होता है और न ही संक्रमण का जोखिम रहता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर व्यावहारिक रूप से सफल सिद्ध होती है, तो अस्पतालों, क्लीनिकों, स्वास्थ्य शिविरों और यहां तक कि घरों में भी इसका उपयोग संभव हो सकेगा। इससे ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी आसानी से जांच की सुविधा मिल सकती है।

हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि यह तकनीक अभी पारंपरिक रक्त जांच का पूर्ण विकल्प नहीं बनी है। इसे पहले बड़े स्तर पर विभिन्न आयु वर्गों और स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों पर परखा जाएगा। यदि इसके परिणाम लगातार सटीक पाए जाते हैं, तभी इसे नियमित चिकित्सा पद्धति में शामिल किया जाएगा।

सांस आधारित जांच केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में वैज्ञानिक ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो सांस के माध्यम से फेफड़ों के रोग, किडनी की समस्याएं, लीवर संबंधी विकार, संक्रमण और कुछ प्रकार के कैंसर की शुरुआती पहचान भी कर सकें। इससे भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

भारत जैसे देश में, जहां डायबिटीज के मरीजों की संख्या बहुत अधिक है, ऐसी तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और किफायती बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि जांच आसान होगी, तो लोग नियमित रूप से अपनी स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी कर सकेंगे और बीमारी का समय रहते उपचार शुरू किया जा सकेगा। इससे गंभीर जटिलताओं जैसे हृदय रोग, किडनी फेल होना, आंखों की रोशनी कम होना और तंत्रिका तंत्र की समस्याओं के जोखिम को भी कम किया जा सकेगा।

विज्ञान और नैनो-प्रौद्योगिकी का यह संगम भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं की एक नई तस्वीर प्रस्तुत करता है। बिना दर्द, बिना सुई और बिना खून की जांच के यदि केवल एक सांस से बीमारी का संकेत मिल जाए, तो यह न केवल मरीजों के लिए राहत होगी बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि साबित होगी। आने वाले वर्षों में इस प्रकार की तकनीकें चिकित्सा को अधिक सरल, सुरक्षित और जनसुलभ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

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