शिक्षा के मंदिर में भरोसे का संकट!

स्कूल, जहां बेटियों को सुरक्षित भविष्य का भरोसा मिलना चाहिए, वहीं अगर छात्राओं से छेड़खानी के मामले सामने आएं, तो सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं, पूरे शिक्षा तंत्र पर भरोसे का है। आखिर स्कूलों में बेटियां कितनी सुरक्षित हैं? और जिम्मेदार कौन है?

डॉ. प्रियंका सौरभ

स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं होते। वे बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण, संस्कार, अनुशासन और सुरक्षित भविष्य की नींव रखते हैं। माता-पिता जब अपने बच्चों को विद्यालय भेजते हैं तो उनके मन में यह विश्वास होता है कि शिक्षक उनके बच्चे को ज्ञान देने के साथ-साथ उसकी सुरक्षा और गरिमा का भी ध्यान रखेंगे। लेकिन जब इसी भरोसे की आड़ में किसी शिक्षक द्वारा छात्रा के साथ छेड़खानी, अनुचित व्यवहार या यौन उत्पीड़न की घटना सामने आती है, तो चोट केवल एक बच्ची को नहीं लगती; पूरा शैक्षणिक तंत्र कटघरे में खड़ा हो जाता है।

विद्यालयों में छात्राओं के साथ शिक्षकों द्वारा अनुचित व्यवहार की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। हर घटना की प्रकृति और तथ्य अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन शिकायत सामने आने के बाद उसे दबा देना, बच्ची को चुप कराने की कोशिश करना या संस्थान की प्रतिष्ठा बचाने के लिए मामले को टालना उससे भी अधिक गंभीर समस्या है। किसी भी विद्यालय की प्रतिष्ठा बच्चों की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती।

शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता मूलतः विश्वास पर आधारित होता है। एक शिक्षक के पास ज्ञान के साथ-साथ अधिकार भी होता है। छात्र शिक्षक की बात को स्वाभाविक रूप से महत्व देता है और कई बार उसे अपने माता-पिता के बाद सबसे विश्वसनीय वयस्क मानता है। यही कारण है कि यदि कोई शिक्षक इस विश्वास और अधिकार का दुरुपयोग करता है तो बच्ची के लिए विरोध करना आसान नहीं होता। किशोरावस्था में बच्चे कई बार यह समझ ही नहीं पाते कि किसी वयस्क का व्यवहार सामान्य है या अनुचित। डर, शर्म, सामाजिक दबाव, परीक्षा और भविष्य को लेकर चिंता तथा यह भय कि उनकी बात पर विश्वास किया जाएगा या नहीं—उन्हें शिकायत करने से रोक सकते हैं। इसलिए केवल यह पूछना कि “बच्ची ने पहले शिकायत क्यों नहीं की?” पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या विद्यालय ने ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाया है जिसमें बच्ची बिना डर अपनी बात कह सके?

ऐसे मामलों में सबसे खतरनाक तत्व अक्सर चुप्पी होती है। कई परिवार सामाजिक बदनामी के डर से शिकायत नहीं करना चाहते। कुछ लोग यह सोचकर मामले को दबा देते हैं कि बच्ची की पढ़ाई प्रभावित होगी। विद्यालय प्रशासन भी कभी-कभी संस्थान की छवि खराब होने की चिंता में शिकायत को आंतरिक स्तर पर समाप्त करने की कोशिश कर सकता है। लेकिन ऐसी चुप्पी गलत व्यवहार को बढ़ावा दे सकती है। यदि किसी बच्ची की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया जाता तो उसे यह संदेश मिल सकता है कि उसकी सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण संस्थान की प्रतिष्ठा है। यह संदेश किसी भी सभ्य समाज के लिए बेहद चिंताजनक है।

इसलिए अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यालय प्रबंधन को यह समझना होगा कि शिकायत करना बदनामी नहीं, बल्कि सुरक्षा की दिशा में उठाया गया कदम है। आरोप की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून तथा संस्थागत नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। विद्यालय प्रशासन की भूमिका केवल घटना होने के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सुरक्षा की व्यवस्था पहले से मजबूत होनी चाहिए। शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति के दौरान उचित सत्यापन, स्पष्ट आचार-संहिता, विद्यार्थियों के साथ व्यवहार के नियम तथा शिकायत की सुरक्षित व्यवस्था आवश्यक है।

विद्यालयों में बच्चों को यह बताया जाना चाहिए कि अच्छा और अनुचित स्पर्श क्या होता है, असहज व्यवहार की पहचान कैसे करें और किसी विश्वसनीय वयस्क को इसकी जानकारी कैसे दें। यह शिक्षा केवल छात्राओं के लिए नहीं, बल्कि सभी बच्चों के लिए होनी चाहिए। उन्हें यह भी समझाया जाना चाहिए कि किसी भी अनुचित व्यवहार के लिए वे स्वयं जिम्मेदार नहीं हैं। स्कूलों में ऐसी शिकायत व्यवस्था होनी चाहिए जहां बच्चा बिना भय के अपनी बात रख सके। महिला शिक्षक, प्रशिक्षित काउंसलर या अन्य विश्वसनीय वयस्क की उपलब्धता इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।

भारत में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए POCSO Act, 2012 मौजूद है। 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ यौन अपराधों के मामलों में यह कानून महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। विद्यालयों और उनके कर्मचारियों को इस कानून की मूलभूत जानकारी होना आवश्यक है। किसी गंभीर शिकायत को केवल “विद्यालय का आंतरिक मामला” मानकर दबा देना उचित नहीं है। मामले की प्रकृति के अनुसार सक्षम अधिकारियों को सूचना और सहयोग देना आवश्यक हो सकता है। कानूनी प्रक्रिया का उद्देश्य केवल आरोपी को दंडित करना नहीं, बल्कि पीड़ित बच्चे की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों की रक्षा करना भी है।

समाज में आज भी कई बार ऐसी घटनाओं के बाद सवाल बच्ची के व्यवहार, कपड़े, समय, दोस्ती या सोशल मीडिया गतिविधियों पर उठाए जाते हैं। यह सोच गलत और नुकसानदायक है। किसी बच्ची का पहनावा, उसकी बातचीत या उसका किसी शिक्षक पर विश्वास किसी वयस्क को अनुचित व्यवहार का अधिकार नहीं देता। जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जो अपनी स्थिति, उम्र और अधिकार का दुरुपयोग करता है। बच्चियों को सुरक्षा के नाम पर डराने के बजाय उन्हें आत्मविश्वास देना होगा। उन्हें यह भरोसा मिलना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति उन्हें असहज करता है तो वे बिना शर्म और भय के अपनी बात कह सकती हैं।

अधिकांश शिक्षक पूरी ईमानदारी और समर्पण से बच्चों का भविष्य बनाते हैं। इसलिए कुछ लोगों के कथित या सिद्ध गलत आचरण का दाग पूरे शिक्षक समुदाय पर लगाना उचित नहीं है। लेकिन इसी कारण शिक्षकों के पेशेवर आचरण की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। शिक्षक के पास बच्चों के साथ लगातार संपर्क होता है। इसलिए उसे सीमाओं और पेशेवर मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए। व्यक्तिगत संदेश, अनुचित टिप्पणी, अनावश्यक शारीरिक संपर्क या एकांत में बुलाने जैसी स्थितियों को लेकर विद्यालयों में स्पष्ट नियम होने चाहिए। शिक्षक का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिसमें सम्मान, समानता और सुरक्षा की भावना दिखाई दे।

विद्यालय प्रशासन को स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि बच्चों के साथ किसी भी प्रकार का यौन या अनुचित व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। लेकिन “जीरो टॉलरेंस” का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि बिना जांच किसी पर कार्रवाई कर दी जाए। इसका सही अर्थ है—हर शिकायत को गंभीरता से लेना, निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाना, बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करना और जांच के निष्कर्ष के आधार पर उचित कार्रवाई करना। शिकायत मिलने पर विद्यालय को आरोपी शिक्षक और छात्रा के बीच ऐसी परिस्थितियों को रोकना चाहिए जिनसे बच्ची पर दबाव पड़े या उसकी सुरक्षा प्रभावित हो। जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने, गवाहों को डराने या शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाने जैसी किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

अभिभावकों को भी बच्चों के साथ संवाद का वातावरण बनाना होगा। यदि बच्चा किसी शिक्षक या अन्य व्यक्ति के व्यवहार को लेकर असहज महसूस करता है तो उसकी बात बीच में काटने के बजाय ध्यान से सुनना चाहिए। तुरंत दोषारोपण या डांट से बच्चा भविष्य में अपनी परेशानी छिपा सकता है। माता-पिता को बच्चों से नियमित रूप से यह पूछना चाहिए कि स्कूल में उनका अनुभव कैसा है, उन्हें किसी व्यक्ति से डर या असहजता तो नहीं है और क्या कोई उन्हें ऐसी बात करने के लिए मजबूर कर रहा है जो उन्हें पसंद नहीं। संवाद जितना सहज होगा, बच्चे उतनी जल्दी अपनी समस्या साझा कर पाएंगे।

आज शिक्षक और विद्यार्थी डिजिटल माध्यमों से भी जुड़े रहते हैं। ऑनलाइन कक्षाएं, मैसेजिंग ऐप और सोशल मीडिया ने संवाद आसान बनाया है, लेकिन इनके साथ नई चुनौतियां भी आई हैं। विद्यालयों को स्पष्ट डिजिटल आचार-संहिता बनानी चाहिए। शिक्षक और छात्र के बीच आधिकारिक संवाद के लिए संस्थागत माध्यमों को प्राथमिकता देना, निजी और अनुचित बातचीत पर रोक तथा डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण के बारे में स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है। बच्चों को भी बताया जाना चाहिए कि यदि किसी व्यक्ति की ओर से ऑनलाइन अनुचित संदेश या बातचीत की कोशिश होती है तो उसे छिपाने के बजाय किसी विश्वसनीय वयस्क को बताया जाए।

ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को भी संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। सनसनी, बच्ची की पहचान उजागर करना या अपुष्ट आरोपों को तथ्य की तरह प्रस्तुत करना न्याय और पीड़ित दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। मीडिया का काम केवल घटना को सुर्खियों में लाना नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठाना भी है। क्या शिकायत सुनी गई? क्या बच्ची सुरक्षित है? क्या विद्यालय ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया? क्या जांच निष्पक्ष है? क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए संस्थागत कमियां दूर की जा रही हैं? ऐसे सवाल सार्वजनिक विमर्श को अधिक सार्थक बनाते हैं।

दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है, लेकिन केवल दंड से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। हमें विद्यालयों की संस्कृति बदलनी होगी। ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें बच्चों को पता हो कि उनकी बात सुनी जाएगी और शिक्षक समझें कि उनके अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। हर विद्यालय में बाल सुरक्षा नीति, नियमित जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण, शिकायत की स्पष्ट प्रक्रिया और अभिभावकों के साथ संवाद होना चाहिए। छात्राओं और छात्रों को उनके अधिकारों की जानकारी दी जानी चाहिए। विद्यालय निरीक्षण व्यवस्था को भी कागजी औपचारिकता से आगे बढ़ाकर वास्तविक सुरक्षा मानकों की जांच करनी चाहिए।

विद्यालय में किसी छात्रा के साथ छेड़खानी या यौन उत्पीड़न की घटना केवल एक अपराध या अनुशासनहीनता का मामला नहीं है। यह उस विश्वास पर प्रहार है जिसके आधार पर माता-पिता अपने बच्चों को विद्यालय भेजते हैं। इसलिए ऐसी हर शिकायत को गंभीरता, संवेदनशीलता और निष्पक्षता से लेना जरूरी है। हमें न तो हर आरोप को बिना जांच सत्य मानना चाहिए और न ही हर शिकायत को बदनामी के डर से दबाना चाहिए। सही रास्ता है—बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करना, निष्पक्ष जांच करना, दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई करना और संस्थागत कमियों को दूर करना।

एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों को कितना सुरक्षित रखता है। शिक्षा का मंदिर तभी सचमुच शिक्षा का मंदिर कहलाएगा, जब वहां ज्ञान के साथ गरिमा, अनुशासन के साथ संवेदना और अधिकार के साथ जवाबदेही भी मौजूद हो। बच्चों की सुरक्षा किसी विद्यालय की प्रतिष्ठा से ऊपर है। किसी छात्रा की आवाज को दबाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या को और गहरा करना है।

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