
लापता बेटी की तलाश में सिर्फ पुलिस नहीं, पूरा समाज चाहिए।बेटियाँ कहाँ हैं? असली गुमशुदगी तो हमारी व्यवस्था की है। लापता बच्चों की सूची लंबी होती जा रही है, हमारी संवेदना छोटी।

किसी बच्चे के लापता होने की खबर को हम अक्सर एक छोटे-से पुलिस केस की तरह पढ़ते हैं—नाम, उम्र, पता और थाना। लेकिन बच्चा घर से ओझल होता है, तो केवल एक जीवन नहीं, पूरा भविष्य अंधेरे में चला जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इन इंडिया 2024 रिपोर्ट में दर्ज 98,375 लापता बच्चों का आँकड़ा इसी त्रासदी का आईना है। इनमें 75,603 लड़कियाँ, 22,768 लड़के और चार ट्रांसजेंडर बच्चे हैं। यानी 76.8 प्रतिशत लापता बच्चे लड़कियाँ हैं। 2023 के 91,296 के मुकाबले यह संख्या 7.8 प्रतिशत बढ़ी है। पिछले वर्षों के अनट्रेस्ड बच्चों को जोड़ें तो आँकड़ा 1,47,175 तक पहुँच जाता है। पश्चिम बंगाल 22,742 मामलों के साथ सबसे ऊपर है। ये महज संख्याएँ नहीं, उतने ही घरों की बुझती उम्मीदें हैं।
सवाल यह नहीं कि लड़कियाँ इतनी अधिक लापता क्यों होती हैं; असली सवाल है कि समाज ने ऐसी स्थितियाँ क्यों बना रखी हैं, जिनमें किसी लड़की का गायब होना आसान है। घरेलू काम के नाम पर गाँव से शहर, रोजगार के बहाने दूसरे प्रदेश, विवाह के झाँसे में अनजान घर और बेहतर भविष्य के लालच में तस्करी—रास्ते अलग हैं, मंजिल एक ही। पश्चिम बंगाल में 2024 के 15,849 लापता बच्चों में लड़कियों की हिस्सेदारी बहुत अधिक रही। गरीबी जब परिवार की मुट्ठी कसती है, तो दलाल का झूठ भी रोजगार का भरोसा लगता है। बेटी को सुरक्षित भविष्य देने की चाह कई बार उसे असुरक्षित दुनिया के हवाले कर देती है।
आँकड़ों से बड़ा सवाल उनकी विश्वसनीयता का है। 2024 में 98,826 बच्चों को ट्रेस या रिकवर किए जाने की सूचना है, फिर भी पिछले वर्षों के करीब 48,350 बच्चे अनट्रेस्ड हैं। तलाश खत्म नहीं हुई, सिर्फ रजिस्टर का पन्ना पलटा है। कुछ राज्यों में लापता बच्चों की संख्या शून्य या बेहद कम होना सवाल खड़े करता है। क्या हर परिवार थाने पहुँचता है? क्या हर शिकायत को बराबर गंभीरता मिलती है? क्या गरीब, ग्रामीण और हाशिए के परिवारों की आवाज उतनी जल्दी सुनी जाती है? पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और ओडिशा के लगातार ऊँचे आँकड़े बताते हैं कि यह एक प्रदेश नहीं, पूरे तंत्र की समस्या है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो बच्चे के गायब होने पर जागती है, पहले नहीं।
लड़की के लापता होने की कहानी को केवल अपराध मानना अधूरा होगा; इसके पीछे अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र भी है। जिस घर में दो वक्त की रोटी का हिसाब रोज बदलता हो, वहाँ शहर में नौकरी का वादा चमत्कार से कम नहीं लगता। शिक्षा से बाहर हुई लड़की आसान लक्ष्य बन जाती है, क्योंकि उसके पास अवसर कम और निर्भरता अधिक होती है। पितृसत्तात्मक सोच—जिसमें बेटी को आज भी कई घरों में ‘पराया धन’ समझा जाता है—उसकी सुरक्षा को भी दोयम दर्जा देती है। पलायन, बेरोजगारी, अशिक्षा और अवसरों की कमी वह अंधेरा रचते हैं, जिसमें तस्करी फलती है। 16 से 18 वर्ष की किशोरियाँ विशेष रूप से इसकी चपेट में आती हैं।
कानून, पुलिस व्यवस्था, हेल्पलाइन और पुनर्वास संस्थाएँ हैं; फिर भी लड़की के गायब होने और सुरक्षित लौटने के बीच लंबी सुरंग है। घरेलू काम में लगाई गई बच्चियाँ चार दीवारों में अदृश्य हो जाती हैं। उनके पास दस्तावेज, नियमित संपर्क और बाहर की दुनिया तक पहुँच नहीं होती। तस्करी के कई मामले ‘लापता’ के खाते में दबे रहते हैं। 67 प्रतिशत रिकवरी रेट उपलब्धि दिख सकता है, लेकिन हर बरामदगी के साथ पूछना जरूरी है कि बच्ची किस हालत में मिली, उसका पुनर्वास कैसे हुआ और क्या वह फिर उसी खतरे में लौटी। आँकड़ा मिलने से जीवन वापस नहीं मिलता; जीवन तब लौटता है, जब सुरक्षा, सम्मान और भविष्य भी लौटे।
सबसे खतरनाक स्थिति तब होगी, जब समाज इन संख्याओं का आदी हो जाए। 98,375 लापता बच्चों में 75,603 लड़कियाँ—यानी हर चार लापता बच्चों में तीन लड़कियाँ। इतनी बड़ी असमानता संयोग नहीं, हमारे सामाजिक ढाँचे की भाषा है। गाँव में लड़की गायब होती है तो खबर ठंडी पड़ जाती है। अखबार का कॉलम बदलता है, पुलिस की फाइल मोटी होती जाती है और परिवार की प्रतीक्षा लंबी। उस घर में कैलेंडर की तारीखें नहीं बदलतीं, सिर्फ उम्मीद की उम्र बढ़ती जाती है। जब तक लड़की की सुरक्षा परिवार की जिम्मेदारी और उसकी गुमशुदगी निजी दुख मानी जाएगी, तब तक राष्ट्रीय आँकड़ों में छिपा संकट हमारी सामूहिक चेतना से बाहर रहेगा।
तस्करी रोकने का रास्ता केवल पुलिस या प्राथमिकी से नहीं निकलता। सुरक्षा की पहली चौकी स्कूल है, दूसरी पंचायत, तीसरी परिवार और फिर पुलिस। हर लापता बच्चे के मामले को प्राथमिकता मिले, डेटा राज्यों और जिलों तक पारदर्शी हो, कम रिपोर्टिंग की स्वतंत्र जाँच हो और स्कूल छोड़ चुकी किशोरियों की निगरानी बने। घरेलू काम के लिए बच्चों को ले जाने वाले नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई के साथ सुरक्षित रोजगार, कौशल और शिक्षा के रास्ते खोलने होंगे। जिस समाज में बेटी के सामने विकल्प कम होंगे, वहाँ दलाल के झूठ की गुंजाइश अधिक होगी। तस्करी का बाजार पुलिस की लाठी से नहीं, अवसरों की रोशनी से भी सिकुड़ता है।
76 प्रतिशत का आँकड़ा लड़कियों से ज्यादा हमारे समाज के बारे में बताता है। कैसा समाज है, जहाँ लड़कियों के गायब होने का जोखिम सबसे बड़ा है? क्या उनकी सुरक्षा के लिए घर लौटने का इंतजार करेंगे, या ऐसा समाज बनाएँगे जहाँ उन्हें बाहर निकलने में डर न लगे? आज हजारों परिवार दरवाजे की आहट पर चौंकते हैं; किसी माँ को लगता है, वह उसकी बेटी हो सकती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट को केवल अपराध-सांख्यिकी मानना गलत होगा। यह चेतावनी है—बेटियाँ लापता नहीं हो रहीं, सामाजिक सुरक्षा की दरारें उजागर हो रही हैं। सवाल यह नहीं कि वे कहाँ हैं; सवाल है कि उन्हें गायब होने की नौबत क्यों आई।



