जिस देश की धरती करे, नमन स्वयं संसार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
भारत माँ की गोद में, जन्म मिला अनमोल। माटी इसकी पूज्य है, कण-कण अमृत-घोल॥
वीरों के बलिदान से, गूँजे जय-जयकार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
सीमा पर जो खड़ा है, लेकर सीना तान। उसके साहस से सदा, सुरक्षित हिंदुस्तान॥
है बर्फीली चौकियों, जलता दृढ़ अंगार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
तिरंगा नभ में जब उड़े, खिल उठे अरमान। केसरिया बलिदान है, श्वेत सत्य की शान॥
हरित धरा की साँस में, गूँजे प्रेम-पुकार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
गंगा जैसी पावनी, यमुना जैसी धार। हिमगिरि जिसका मुकुट है, सागर जिसके द्वार॥
ऋषियों की तप-भूमि यह, संस्कृति का आधार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
माटी में इतिहास है, कण-कण में बलिदान। झाँसी, भगत, सुभाष की, अमर रहे पहचान॥
जिनके रक्त से लिख गया, आजादी का सार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
किसान पसीना खेत में, सैनिक सीमा-धाम। श्रमिक गढ़े विकास को, युवा करे नव काम॥
इन सबके श्रम से बने, भारत का संसार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
धर्म अलग हों, वेश अलग, फिर भी एक विधान। विविध रंग में खिल रहा, भारत का अभिमान॥
प्रेम, शांति, सद्भाव से, महके देश अपार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
‘सौरभ’ इतना संकल्प हो, ऊँचा रहे तिरंग। देश-धरा के मान में, जीवन हो अभिरंग॥
जननी जन्मभूमि से, बढ़कर क्या संसार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
भारत माँ की गोद में, जन्म मिला अनमोल। माटी इसकी पूज्य है, कण-कण अमृत-घोल॥
तिरंगा रहे आसमाँ, गूँजे जय-जयकार। उस भारत को झुका सके, किसमें इतनी धार।।
—– डॉ. प्रियंका सौरभ



