चुनाव आयोग की आड़ में फिर विपक्ष का मोदी सरकार पर हमला

अजय कुमार
अजय कुमार

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के आधार पर विपक्षी दलों ने एक बार फिर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को घेरकर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करके मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की सियासी कोशिश शुरू कर दी है। अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई, जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे। ये आपत्तियां विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया से जुड़ी थीं, लेकिन आयोग की तरफ से कहा गया है कि चुनाव आयोग ने सभी फैसले बहुमत से बिना किसी विवाद के लिए हैं। आपत्ति या किसी मुद्दे पर मतभेद आम बात है। इसका फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन एक पक्ष को सही मानकर अखबार के इस खुलासे के बाद कांग्रेस, सीपीआई(एम), टीएमसी, डीएमके, आप और शिवसेना (यूबीटी) जैसे दलों ने आयोग की साख पर तो सवाल उठाए ही, साथ ही कांग्रेस की ओर से अभिषेक सिंघवी ने आरोप लगाया कि सीईसी ने चुनाव आयोग की साख और निष्ठा को नष्ट कर दिया है।

कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने दावा किया कि अब तक एसआईआर प्रक्रिया के तहत करीब 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और इस मुद्दे को रोज सुप्रीम कोर्ट में उठाया जा रहा है, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही।विपक्ष ने आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर व्यापक जांच की मांग दोहराई है। बहरहाल, विपक्ष के तीर भले ही मुख्य चुनाव आयुक्त की तरफ ताने जा रहे हों, लेकिन निशाने पर मोदी सरकार की विश्वसनीयता को दागदार करना ज्यादा है। वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब मोदी सरकार विपक्ष और खासकर राहुल गांधी के निशाने पर आई हो, इसका काफी लम्बा सिलसिला है। नया दौर यह देखने में आ रहा है कि राहुल जो आरोप लगाते हैं, उसको देर-सवेर विपक्ष के अन्य नेता भी धार देने लगते हैं।

इससे पूर्व भी राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने मोदी सरकार को घेरने के लिए जिन आरोपों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाया, उनकी सूची लंबी है। 2014 के बाद ‘सूट-बूट की सरकार’, मोदी सरकार ने देश को बेच दिया वाला नेरेटिव, उद्योगपतियों के पक्ष में नीतियां बनाए जाने का आरोप, भूमि अधिग्रहण, बेरोजगारी और नोटबंदी जैसे मुद्दे कांग्रेस के प्रमुख हमलों में रहे। नोटबंदी के समय राहुल गांधी ने इसे आर्थिक तबाही और गलत नीति बताते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया। राहुल गांधी के राजनीतिक अभियान का सबसे चर्चित अध्याय राफेल सौदे से जुड़ा रहा। 2018-19 में उन्होंने आरोप लगाया कि 36 राफेल विमानों की खरीद में कीमत बढ़ाई गई, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को दरकिनार किया गया और अनिल अंबानी से जुड़ी कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। उन्होंने 526 करोड़ रुपये बनाम करीब 1600 करोड़ रुपये की कीमत का तर्क भी सार्वजनिक मंचों पर रखा। इसी अभियान से ‘चौकीदार चोर है’ नारा राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बना। लेकिन दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे में अदालत की निगरानी में जांच की मांग वाली याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि उसे खरीद प्रक्रिया, कीमत या ऑफसेट पार्टनर के चयन में हस्तक्षेप का आधार नहीं मिला। इसके बाद बेरोजगारी का मुद्दा विपक्ष के प्रमुख हथियारों में शामिल हुआ।

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2017-18 की सरकारी रिपोर्ट में 15 वर्ष और उससे ऊपर की आबादी के लिए सामान्य स्थिति में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत दर्ज हुई थी। विपक्ष ने इसे रोजगार संकट का प्रमाण बताया। बाद के सरकारी आंकड़ों में यह दर 2018-19 में 5.8 प्रतिशत और आगे और नीचे आती दिखाई दी। पेगासस विवाद में भी राहुल गांधी और विपक्ष ने सरकार पर गंभीर निगरानी के आरोप लगाए। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि किसने पेगासस के इस्तेमाल की अनुमति दी और किन लोगों को निशाना बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में जांच के लिए समिति बनाई। अगस्त 2022 में अदालत के सामने समिति की रिपोर्ट के आधार पर कहा गया कि जांच किए गए 29 फोन में पेगासस के इस्तेमाल का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिला।

2023 में राहुल गांधी के हमले का केंद्र अदाणी समूह और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कथित निकटता बन गया। लोकसभा में उन्होंने अदाणी समूह की तेजी से बढ़ती कारोबारी ताकत, सरकारी फैसलों और प्रधानमंत्री के साथ कथित संबंधों पर सवाल उठाए तथा अरबों डॉलर के लेनदेन को राजनीतिक मुद्दा बनाया। संसद में उनका भाषण इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ले आया। बाद में उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म हुई तो राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि उन्हें अदाणी पर अगला भाषण देने से रोकने के लिए निशाना बनाया गया। लेकिन सदस्यता समाप्ति का औपचारिक कारण 2019 के ‘मोदी सरनेम’ मानहानि मामले में दो साल की सजा था, न कि अदाणी पर उनके भाषण। अगस्त 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उस सजा पर रोक लगाई और उनकी सदस्यता बहाल होने का रास्ता साफ हुआ।कांग्रेस और विपक्ष की राजनीति का एक मोर्चा चुनाव आयोग के खिलाफ भी खुला रहता है।

2025 में राहुल गांधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा समेत विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में मतदाता सूची में कथित हेरफेर को ‘वोट चोरी’ कहा और एक लाख से अधिक वोटों में गड़बड़ी का दावा किया। 17 अगस्त 2025 को ज्ञानेश कुमार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि आरोपों को हलफनामे के साथ साबित किया जाए या माफी मांगी जाए। चुनाव आयोग ने इन दावों को निराधार बताया।यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि चुनावी पारदर्शिता पर बहस सिर्फ राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम और वीवीपैट की 100 प्रतिशत मिलान की मांग को खारिज करते हुए मौजूदा सुरक्षा प्रोटोकॉल को पर्याप्त माना और कहा कि उपलब्ध डेटा से धोखाधड़ी का आधार नहीं बनता। सितंबर 2026 में यही टकराव एक नए रूप में सामने आया, जब चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे गुटीय विवाद के बीच उसके मूल नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को अंतरिम तौर पर फ्रीज कर दिया और दोनों पक्षों को अलग नाम व प्रतीक दिए।

राहुल गांधी और विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरने के लिए राफेल से लेकर नोटबंदी, बेरोजगारी, पेगासस, अदाणी और चुनावी संस्थाओं तक लगातार नए राजनीतिक नैरेटिव बनाए। कुछ मुद्दों पर अदालतों या आधिकारिक संस्थाओं ने विपक्ष के आरोपों को निर्णायक समर्थन नहीं दिया, कुछ पर सरकार को राजनीतिक और नीतिगत सफाई देनी पड़ी, और कुछ मुद्दे जैसे रोजगार, राजनीतिक फंडिंग तथा चुनावी पारदर्शिता आज भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं। 2024 के चुनाव ने यह भी दिखाया कि विपक्ष की राजनीति को पूरी तरह अप्रभावी मानना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस 99 और समाजवादी पार्टी 37 सीटों तक पहुंची। इसलिए वास्तविक सवाल केवल यह नहीं है कि राहुल गांधी कितने आरोप लगा रहे हैं, बल्कि यह है कि कौन-सा आरोप प्रमाण, संस्थागत जांच, नीति बहस और अंततः मतदाता के फैसले में बदल पाता है।

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