मिट्टी के दीपक गए, बिजली का बाजार। कुम्हारों की आँख में, ठहरा है त्योहार॥
धन के आगे झुक रहा, आज मनुज का मान। बाजारों ने बेच दी, पर्वों की पहचान॥
दीप जलें या धन जुटे, किसका है त्योहार। महँगाई ने छीन ली, निर्धन की बाजार॥
धनवानों के पर्व में, निर्धन किसका साथ। खाली जेबें पूछतीं, किस्मत की क्या बात॥
सोने-चाँदी की चमक, मन में भरा विकार। रिश्तों की कीमत गिरी, ऐसा हुआ व्यापार॥
पर्व मनाने के लिए, कर्ज लिया दिन-रात। दिखलावे की होड़ में, बिगड़ी अपनी बात॥
धनतेरस का नाम ले, बिकता हर सामान। आस्था की इस आड़ में, बढ़ता लाभ प्रधान॥
धन की पूजा हो रही, भूखा बैठा आज। कैसा यह उत्सव हुआ, कैसा इसका राज॥
धन से ही पहचान है, कैसा यह संसार। गुण और श्रम को भूलकर, धन का हो सत्कार॥
—– डॉ. प्रियंका सौरभ



