डॉ. विजय गर्ग
भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब समाज के प्रत्येक वर्ग को निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान अवसर मिले। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सदियों तक सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक निर्भरता और लैंगिक भेदभाव के कारण महिलाओं की आवाज़ सीमित रही। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल रही हैं। गांव की चौपाल से लेकर संसद तक महिलाएं अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं और नेतृत्व की नई मिसाल कायम कर रही हैं।
भारत में महिलाएं परिवार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में वे खेतों में काम करती हैं, परिवार संभालती हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती हैं। इसके बावजूद लंबे समय तक राजनीतिक निर्णयों में उनकी भागीदारी सीमित रही। अब पंचायतों और स्थानीय निकायों में आरक्षण ने महिलाओं को नेतृत्व का अवसर प्रदान किया है।
73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायती राज संस्थाओं तथा शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया। कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया है। परिणामस्वरूप लाखों महिलाएं सरपंच, पंच, पार्षद और स्थानीय प्रतिनिधि बनकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुई हैं।
महिला प्रतिनिधियों की भूमिका केवल बैठकों में भाग लेने तक सीमित नहीं है। अनेक महिलाएं गांवों में पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क निर्माण और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रही हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं। इससे उनमें आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जागरूकता का विकास हुआ है।
हालांकि, इस बदलाव के सामने कई चुनौतियां भी हैं। कुछ स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य निर्णय लेते हैं। इसे अक्सर ‘सरपंच पति’ की समस्या कहा जाता है। अशिक्षा, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव और प्रशासनिक जानकारी की कमी भी महिलाओं के प्रभावी नेतृत्व में बाधा बनती है। इसलिए केवल राजनीतिक पद देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें प्रशिक्षण, अधिकारों की जानकारी और स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर देना भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना भी समय की मांग है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है। इसी उद्देश्य से 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक महत्वपूर्ण पहल है। इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसका प्रभाव संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया के बाद लागू होना है।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर का विषय है। जब महिलाएं निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होती हैं, तो परिवार, बच्चों, शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी उचित महत्व मिलता है। इसके लिए राजनीतिक दलों को महिलाओं को टिकट देने, नेतृत्व प्रशिक्षण प्रदान करने और उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपने की आवश्यकता है। परिवारों और समाज को भी महिलाओं के राजनीतिक सपनों का समर्थन करना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि गांव की चौपाल पर उठने वाली महिलाओं की आवाज़ संसद के गलियारों तक पहुंचे। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल सम्मान देना नहीं, बल्कि अधिकार, अवसर और निर्णय लेने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है। जब महिलाएं नेतृत्व करेंगी, तभी लोकतंत्र अधिक समावेशी, संवेदनशील और मजबूत बनेगा।



