गुर्जरों को रेल पटरियों पर फिर से बैठाने का जिम्मेदार कौन?

आखिर

राजस्थान में गुर्जरों को सरकारी भर्तियों में अलग से पांच प्रतिशत आरक्षण तो मिल ही रहा है।

तो क्या कांग्रेस सरकार गुर्जर आंदोलन को गंभीरता से नहीं ले रही है? चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा हैं सरकार के वार्ताकार। मंत्री चांदना को बैरंग लौटाया।

राजस्थान के गुर्जर समुदाय ने भरतपुर जिले से गुजरने वाले दिल्ली-मुम्बई रेल ट्रेक पर 02 नवम्बर को भी लगातार दूसरे दिन कब्जा जमाए रखा। इसी प्रकार भरतपुर संभाग में कई स्थानों पर नेशनल हाइवे भी जाम कर रखे हैं। रेलवे ने 20 रेल गाडिय़ों को डायवर्ड कर दिया है। रेल और सड़क मार्ग जाम होने से लाखों लोगों को परेशानी हो रही है। इस बार गुर्जर समुदाय ने पांच प्रतिशत आरक्षण देने की मांग को लेकर आंदोलन नहीं किया जा रहा है। गुर्जरों को पांच प्रतिशत आरक्षण तो पिछले दो वर्षों से मिल ही रहा है।

सरकार अब जब भी भर्तियों का विज्ञापन जारी करती है तो गुर्जर समुदाय के युवाओं को अलग से पांच प्रतिशत आरक्षण दिया ही जाता है। ऐसे में सवाल उठता है तो फिर गुर्जर आंदोलन क्यों कर रहे हैं? असल में दिसम्बर 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वायदा किया था कि गुर्जरों को पांच प्रतिशत आरक्षण को कानूनी दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए इस विशेष आरक्षण को केन्द्र की 9वीं अनुसूची में शामिल करवाया जाएगा। यह भी वायदा किया कि बैकलॉग की भर्तियां भी निकाली जाएगी। हर नई भर्तियों में गुर्जरों को पूरा पांच प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। आंदोलन में शहीद हुए लोगों के परिजन को सरकारी नौकरी दी जाएगी। देव नारायण योजना में बजट का आवंटन होगा।

कांग्रेस ने जब यह वायदा किया था, तब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट थे। पायलट भी गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। पायलट और कांग्रेस के इस वायदे का असर यह हुआ कि प्रदेश में कांग्रेस को बहुमत मिल गया। इतना ही नहीं भाजपा का एक भी गुर्जर उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। लेकिन अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद घोषणा पत्र की अनेक मांगों को पूरा नहीं किया। इन मांगों को लेकर गत वर्ष फरवरी में गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने आंदोलन की घोषणा की तो गहलोत सरकार ने लिखित में समझौता कर लिया।

गुर्जरों को उम्मीद थी कि अब मांगों का समाधान हो जाएगा। लेकिन डेढ़ वर्ष गुजर जाने के बाद भी मांगे नहीं मानी गई। गत 15 अक्टूबर को कर्नल बैंसला ने बयाना में महापंचायत बुलाई और सरकार को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया। यानि सरकार को पता था कि एक नम्बवर से कर्नल बैंसला के नेतृत्व में आंदोलन होगा। लेकिन सरकार ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई। एक नवम्बर को जब आंदोलन की पूरी तैयारी हो गई तब 31 अक्टूबर को गुर्जरों के एक जुट से सरकार के दो मंत्री रघु शर्मा और अशोक चांदना ने समझौता कर लिया। इसके साथ ही सरकार ने गुर्जरों को डराने के लिए गुर्जर बहुल्य 8 जिलों में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू कर दिया। अनेक जिलों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी।

सरकार को उम्मीद थी कि एक गुट से समझौता और सख्ती करने के कारण कर्नल बैंसला का आंदोलन बेदम हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब हजारों गुर्जर रेल पटरियों और सड़कों पर हैं। इस बार सरकार की ओर से मुख्य वार्ता कार की भूमिका में चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा निभा रहे हैं। सरकार ने अभी तक जो भी चाले चली हैं, वह विफल रही है। गुर्जरों का आंदोलन अब भरतपुर, जयपुर आदि से बाहर निकल कर अजमेर तक पहुंच गया है। सचिन पायलट के निर्वाचन क्षेत्र टोंक में भी आंदोलन शुरू हो गया है।

पायलट पहले ही गुर्जरों की मांगों का समर्थन कर चुके हैं। मांगों को लेकर पायलट ने सीएम गहलोत को पत्र भी लिखा था। इधर कर्नल बैंसला के पुत्र और आंदोलन की बागडोर संभाल रहे विजय बैंसला ने साफ कहा है कि यदि सरकार ने सख्ती दिखाई तो परिणाम गंभीर होंगे। बैंसला ने गहलोत सरकार पर वायदा खिलाफी का आरोप लगाया। बैंसला ने इस बात पर अफसोस जताया कि गहलोत सरकार अपने वायदे से मुकर रही है।

बैरंग लौटाया मंत्री चांदना को…

एक नवम्बर की रात को मंत्री अशोक चांदना गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला से मिलने के लिए बयाना पहुंचे। लेकिन बैंसला ने स्वयं का स्वास्थ्य खराब होने का हवाल देते हुए कहा कि मेरे पुत्र विजय बैंसला से मुलाकात कर लें। इस पर चांदना बयाना से पीलूपुरा के लिए रवाना हुए ताकि विजय बैंसला से मुलाकात की जा सके। लेकिन पीलूपुरा के मुख्य मार्ग पर गुर्जरों का जाम होने से चांदना निर्धारित स्थल तक नहीं पहुंच सके। इस पर विजय बैंसला ने चांदना से कहा कि उनकी मुलाकात किस स्थान पर होगी, यह फोन पर बता दिया जाएगा।

चांदना ने कोई दो घंटे तक फोन का इंतजार किया, लेकिन विजय बैंसला की ओर से कोई सूचना नहीं आई। इस पर चांदना को बयाना से बैरंग ही लौटना पड़ा। चांदना ने कहा कि राजनीति में ऐसा चलता रहता है। मुझे कोई नाराजगी नहीं है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में जब जब भी गुर्जर आंदोलन हुआ है, तब तब विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाया गया है।

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