नए पुलिस आयुक्त गलतियों से बचें

श्याम कुमार


लखनऊ केे पिछले पुलिस आयुक्त ध्रुवकांत ठाकुर बहुत योग्य पुलिस अधिकारी माने जाते रहे हैं। वर्षों पूर्व वह कानपुर देहात में पुलिस अधीक्षक थे, उस समय मेरा उनसे परिचय हुआ था। कानपुर में चार दशक से अधिक समय से हमारी ‘रंगभारती’ संस्था द्वारा लाजपतभवन में आयोजित हो रहे वार्षिक ‘गदहा सम्मेलन’ शीर्षक हास्य कविसम्मेलन में उस समय उनका आत्मीय सहयोग प्राप्त हुआ था। पुलिस की आम छवि के विपरीत वह विनम्र थे। उसके बाद मेरा उनसे सम्पर्क नहीं हो पाया, लेकिन उनकी अहंकारविहीन छवि स्मृतिपटल पर बनी हुई थी।


ध्रुवकांत ठाकुर जब लखनऊ के पुलिस आयुक्त बनाए गए तो बड़ी खुशी हुई और मैंने उनके पास बधाईपत्र भेजा। साथ ही मैंने उन्हें फोन किया, ताकि फोन पर भी बधाई दे दूं तथा मिलने का समय मांग लूं। मोबाइल उनके जनसम्पर्क अधिकारी ने उठाया, जिसने बताया कि पुलिस आयुक्त मीटिंग कर रहे हैं तथा वह बाद में बात करा देगा। जब उसने बात नहीं कराई तो अगले दिन मैंने फिर फोन किया, किन्तु जनसम्पर्क अधिकारी ने वही पहले वाला उत्तर दिया। तदुपरांत मैंने अलग-अलग समय पर कई बार फोन किए, किन्तु हर बार जनसम्पर्क अधिकारी ने ही फोन उठाया और उसने वही उत्तर दिया। मैंने इस अनुभव का उल्लेख करते हुए ध्रुवकांत ठाकुर के पास पत्र भेजा। पत्र लेकर जाने वाले ने लौटने पर बताया कि उनके आवास पर पत्र प्राप्त करने वाला जो व्यक्ति तैनात है, वह पहले लिफाफा खोलकर पत्र पढ़ता है, जिसके बाद उचित समझने पर उसे स्वीकार करता है।


ध्रुवकांत ठाकुर ने पलटकर मुझे फोन तो नहीं ही किया, मैंने उन्हें जो बधाईपत्र भेजा था, उसका उत्तर भी नहीं दिया। मैं समझ गया कि ध्रुवकांत ठाकुर अब पहले वाले ध्रुवकांत ठाकुर नहीं रह गए हैं तथा पुलिसवालों के मशहूर अहंकार ने उन्हें भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। डायमंडडेरी काॅलोनी, जहां मैं रहता हूं, हुसेनगंज थानाक्षेत्र के अंतर्गत है। डायमंडडेरी काॅलोनी कल्याण समिति के अध्यक्ष के नाते काॅलोनी की समस्याओं के बारे में मैंने हुसेनगंज थाने के प्रभारी निरीक्षक को कई पत्र लिखे, पर वहां पत्रों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। निरीक्षक से फोन पर भी बात नहीं हो पाती थी, जबकि मुख्यमंत्री का आदेश है कि थानों के प्रभारी अपने-अपने क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिकों से मिलते रहें तथा उनकी समस्याओं का त्वरित निस्तारण करें। उन समस्याओं के बारे में मैंने पुलिस आयुक्त ध्रुवकांत ठाकुर को भी कई पत्र लिखे, मगर किसी भी पत्र का न तो उत्तर मिला और न कोई कार्रवाई हुई।


पुलिस आयुक्त प्रणाली जब लागू हुई थी तो उससे जनता को होने वाले लाभ का बहुत ढिंढोरा पीटा गया था, लेकिन जनता का अनुभव यह है कि पुलिस आयुक्त प्रणाली बिलकुल विफल हो गई है। पहले जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं नगर पुलिस अधीक्षक के यहां जो सुनवाई संभव हो जाती थी, वह भी अब बिलकुल बंद हो गई। ध्रुवकांत ठाकुर जितने दिन लखनऊ के पुलिस आयुक्त रहे, बहुत प्रयास के बावजूद मेरी उनसे एक बार भी बात संभव नहीं हो पाई।


डायमंडडेरी काॅलोनी में रह रहे अत्यंत वरिष्ठ पत्रकार पीबी वर्मा की कार चोरी हो गई। चोर उनका नौकर ही निकला, जिसकी पूरी हरकत सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी। जब पुलिस सुन नहीं रही थी तो मैंने पुलिस आयुक्त ध्रुवकांत ठाकुर को फोन किया। उनके जनसम्पर्क अधिकारी ने फोन उठाया और वही घिसापिटा उत्तर दिया कि साहब अभी मीटिंग कर रहे हैं, जिसके बाद वह बात करा देगा। मैंने उसे डांटा कि इतने वरिष्ठ पत्रकार की कार की चोरी का मामला है, इसलिए वह तुरंत बात कराए। इस पर जनसम्पर्क अधिकारी ने फोन काट दिया।


विवश होकर मैं उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के पास गया और चोरी की घटना बताई। उन्होंने मेरे सामने फोन पर पुलिस आयुक्त से बात की। मैं बातचीत से समझ गया कि मैंने पुलिस आयुक्त के जनसम्पर्क अधिकारी को जो डांटा था, पुलिस आयुक्त ने उस बात की शिकायत ब्रजेश पाठक से की। किन्तु ब्रजेश पाठक ने उत्तर में पुलिस आयुक्त से कहा-‘श्याम कुमार जी इतने वरिष्ठ पत्रकार हैं कि वह किसी को भी डांट सकते हैं, मुझे भी डांट दिया करते हैं।’


खैर ब्रजेश पाठक के कहने के बाद पुलिस हरकत में आई और कार चोर तुरंत पकड़ लिया गया। हालांकि बाद में कार को वापस लेने में बड़े पापड़ बेलने पड़े तथा पीबी वर्मा जी का बहुत पैसा कार वापस लेने में खर्च हो गया। पुलिस ने बरामदगी के बाद कार को जहां रखा हुआ था, वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि उसके तमाम कलपुर्जे गायब हो गए हैं। चोर नकद दस हजार रुपये एवं अन्य जो चीजें ले गया था, वह सब बार-बार अनुरोध के बावजूद अभी तक नहीं मिली हैं।


नए पुलिस आयुक्त के कार्यकाल में गत 11 अगस्त को रात में तीन युवा चोर वाहनों से पेट्रोल चुरा रहे थे, उसी समय काॅलोनी के एक निवासी संदीप श्रीवास्तव अपनी पत्नी के साथ कहीं से लौटे। उन्होंने पेट्रोल चोरी करते देखा तो एक चोर को पकड़ लिया, किन्तु वह हाथ छुड़ाकर भाग गया। मैंने हुसेनगंज थाने को फोन किया तो कुछ देर बाद दो सिपाही आए और घटना का विवरण सुनकर चले गए। उसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई। मैंने नए पुलिस आयुक्त एसबी शिरड़कर को फोन किया, किन्तु ध्रुवकांत ठाकुर के समय की भांति मोबाइल जनसम्पर्क अधिकारी ने उठाया और वही पुराना उत्तर दिया। नए पुलिस आयुक्त से अभी तक बात नहीं हो पाई है और न पुलिस ने चोरों को पकड़ने की कोई सक्रियता दिखाई। तय बात है कि चोर आसपास के ही हैं और पेट्रोल निकालने में माहिर हैं। संदीप श्रीवास्तव का कहना है कि वह चोर को पहचान सकते हैं, लेकिन पुलिस आयुक्त का अमला चोरों को पकड़ने में रुचि ले, तब पहचानने की नौबत आए…!


नए पुलिस आयुक्त यदि सफल होना चाहते हैं तो उन्हें ध्रुवकांत ठाकुर वाली प्रवृत्ति से अलग होकर चलना होगा। उन्हें समझना होगा कि फील्ड के इस उच्च पद पर तैनाती उन्हें अहंकार में चूर रहने और अफसरी झाड़ने के लिए नहीं मिली है, बल्कि सेवक के रूप में जनता की सेवा करने के लिए मिली है। उन्हें जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क बनाना होगा तथा मोबाइल पर अपनी सुगम उपलब्धता रखनी होगी। उन्हें नित्य दो घंटे जनता की फरियाद सुननी चाहिए तथा उस अवधि में वह अनिवार्य रूप से वहां मौजूद रहें। हर फरियाद या शिकायत का समुचित रिकाॅर्ड रखा जाए तथा भलीभांति जांच की जाती रहे कि समस्याएं हल हुईं या नहीं। जब फरियादी की संतुष्टि हो जाय, तभी पुलिस आयुक्त को अपनी संतुष्टि माननी चाहिए। जो भी बड़ा या छोटा पुलिसकर्मी इस मामले में ढिलाई बरतने का दोषी पाया जाय, उसे कड़ा दंड दिया जाय।

‘लाइनहाजिर’ करना कोई दंड नहीं है और मात्र लीपापोती है। कुछ समय बाद सिफारिश के बल पर लाइनहाजिर हुआ पुलिसकर्मी पुनः अच्छी तैनाती पा जाता है। पुलिस आयुक्त को नगर के विभिन्न क्षेत्रों में स्वयं घूमकर लोगों से मिलते रहना चाहिए तथा जबतब लोगों को खुद फोन कर हाल लेना चाहिए।
यहां एक उदाहरण पुनः याद आ रहा है। श्यामनंदन प्रसाद सिन्हा, जो बाद में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक बने, मेरे पुराने मित्र थे। वह जब इलाहाबाद में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक होकर आए तो एक दिन वह मेरे यहां आए और उन्होंने बताया कि वह महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, डाॅ. रामकुमार वर्मा, फिराक आदि महान साहित्यकारों से मिलकर आ रहे हैं। वहां पहुंचने पर श्यामनंदन सिन्हा ने बताया कि वह उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए षिश्टाचारस्वरूप भेंट करने आए हैं तो उन साहित्यकारों ने आष्चर्य व्यक्त करते हुए कहाकि आज तक तो कोई अधिकारी नहीं आया। उस दिन श्यामनंदन प्रसाद सिन्हा ने मुझसे दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि विदेषों में साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, कलाकारों आदि का प्रशासकों से कहीं अधिक सम्मान किया जाता है, जबकि दुर्भाग्यवश हमारे यहां बिलकुल विपरीत स्थिति है।

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