बाबरी के भक्त बजरंगबली के भक्त होने का दावा नहीं कर सकते!

  • मुख्यमंत्री ने पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज की 23वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
  • पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज के जीवन का एक मात्र ध्येय श्रीराम जन्मभूमि पर उनके आराध्य प्रभु श्रीराम के भव्य मन्दिर का निर्माण था
  • वर्ष 1949 से लेकर अंतिम समय तक श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन से उनका सीधा जुड़ाव रहा।
  • इतिहास केवल पढ़ने और परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देने का विषय नहीं, इतिहास प्रेरणा और सबक भी यदि हम अतीत की गलतियों की अनदेखी करते हैं, तो हम उन्हें दोहराने की दिशा में बढ़ते आज की पीढ़ी को अतीत से सीख लेते हुए समाज को जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर बांटने के प्रयासों से सावधान रहना होगा।
  • भारत में छोटी-छोटी घटनाओं पर राजनीतिक प्रतिक्रिया देने वाले लोग पड़ोसी देशों में हिन्दुओं के साथ होने वाली हिंसा पर मौन रहते
  • संभल में जिला मुख्यालय के निर्माण की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही। कभी संभल में लगातार दंगों की स्थिति रहती थी, लेकिन आज शांति और सौहार्द का वातावरण है।
  • अयोध्या का कायाकल्प हो चुका, अयोध्या अब त्रेता युग की स्मृतियों को साकार करती दिखाई देती।
  • आज अयोध्या का संत देश-दुनिया में कहीं जाता, तो उसे सम्मान मिलता, यह संतों के तप, साधना और श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान किए गए संघर्ष का परिणाम।
  • जो बाबरी के भक्त रहे, वे बजरंगबली के भक्त होने का दावा नहीं कर सकते, बजरंगबली ऐसे कालनेमियों को पहचानने में सक्षम और रामभक्तों  को भी ऐसी पहचान की सामर्थ्य विकसित करनी होगी।
  • बड़ा संत होने के बावजूद परमहंस जी महाराज का जीवन अत्यन्त सादा और फक्कड़ था।
  • गाय सनातन धर्म की माता और भारत की धरोहर, गौमाता को केवल पशु के रूप में देखने का तात्पर्य भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा की भावना को नहीं समझना।

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी ने पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पूज्य परमहंस जी महाराज का संपूर्ण जीवन श्रीराम जन्मभूमि पर प्रभु श्रीराम के भव्य मन्दिर निर्माण के संकल्प के लिए समर्पित रहा। वर्ष 1949 से लेकर अपने जीवन के अंतिम क्षण तक उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण में सक्रिय भूमिका निभाई। उनका तप, त्याग, संघर्ष और अडिग संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। मुख्यमंत्री जी आज जनपद अयोध्या में पूज्य महन्त परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज की 23वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने महन्त श्री रामचन्द्र दास जी को श्रद्धा सुमन अर्पित किये। इसके पूर्व, मुख्यमंत्री जी ने हनुमान गढ़ी तथा श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में दर्शन-पूजन किया। उन्होंने ब्रह्मलीन महंत श्री संत रामदास जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के उपरान्त मुख्यमंत्री जी संत रविदास मन्दिर, बड़े भक्तमाल, महन्त नृत्यगोपालदास जी आश्रम तथा परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज जी की समाधि पर गये।


मुख्यमंत्री ने कहा कि पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज के जीवन का एक मात्र ध्येय श्रीराम जन्मभूमि पर उनके आराध्य प्रभु श्रीराम के भव्य मन्दिर का निर्माण था। गोरक्षपीठ से उनका सम्बन्ध पारिवारिक आत्मीयता जैसा रहा। वर्ष 1949 से लेकर अंतिम समय तक श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन से उनका सीधा जुड़ाव रहा। उनका पूरा जीवन श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के लिए समर्पित था। सरकारें बदलती रहीं, राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहीं, लेकिन उनके संकल्प में कोई परिवर्तन नहीं आया। उन्हें न कोई सरकार डरा सकी, न खरीद सकी और न ही उन्हें उनके संकल्प से विचलित कर सकी।


इतिहास केवल पढ़ने और परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देने का विषय नहीं है। इतिहास प्रेरणा भी है और सबक भी। अतीत के गौरवशाली क्षण हमें गर्व और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, जबकि अतीत की गलतियां हमें अपनी कमियों को सुधारने का अवसर प्रदान करती हैं। यदि हम अतीत की गलतियों की अनदेखी करते हैं, तो हम उन्हें दोहराने की दिशा में बढ़ते हैं। भारत के गुलाम होने के कारणों पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे पास बल, बुद्धि और वैभव की कमी नहीं थी, लेकिन एकता का अभाव था। हम बंटे थे और इसीलिए कटे थे। आज की पीढ़ी को अतीत से सीख लेते हुए समाज को जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर बांटने के प्रयासों से सावधान रहना होगा।


वर्ष 1526 में संभल में श्री हरिहर मन्दिर को तोड़कर वहां गुलामी का ढांचा खड़ा किया गया। यदि उस समय ही समाज एकजुट होकर उसका प्रतिकार करता, तो संभव है कि दो वर्ष बाद वर्ष 1528 में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर को क्षतिग्रस्त करने का दुस्साहस कोई नहीं करता। सनातन समाज कभी निष्क्रिय नहीं रहा, लेकिन उसके बिखराव ने उसे कमजोर किया। आज हमें उस ऐतिहासिक कमजोरी को समझने और भविष्य में उसे दूर रखने की आवश्यकता है।


14 अगस्त, 1947 को आजादी से एक दिन पहले केवल हिन्दू और सिख ही नहीं कटे, बल्कि भारत भी विभाजित हुआ। उन्होंने कहा कि उस समय सत्ता प्राप्ति को देशहित से ऊपर रखा गया और विभाजन की त्रासदी सामने आई। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारत में छोटी-छोटी घटनाओं पर राजनीतिक प्रतिक्रिया देने वाले लोग पड़ोसी देशों में हिन्दुओं के साथ होने वाली हिंसा पर मौन रहते हैं। इस पर समाज को विचार करना चाहिए।


मुख्यमंत्री ने संभल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2024 में सर्वे टीम पर हमले और पुलिस को निशाना बनाए जाने के बाद प्रशासन को प्रभावी कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके बाद संभल के ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व की जानकारी जुटाई गई। वहां केवल हरिहर मन्दिर ही नहीं, बल्कि 67 तीर्थ और 19 कूप भी थे। इन धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण की स्थिति सामने आई। सरकार ने इन स्थलों से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की। लगभग 10 हजार एकड़ भूमि को कब्जामुक्त कराया गया है। इन जमीनों का उपयोग गरीबों, दलितों और कमजोर वर्गों के हित में करने के साथ सरकार के लैंड बैंक के लिए भी किया जा रहा है। संभल में जिला मुख्यालय के निर्माण की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है। कभी संभल में लगातार दंगों की स्थिति रहती थी, लेकिन आज वहां शांति और सौहार्द का वातावरण है।


एक समय अयोध्या बिजली, सड़क, स्वच्छता और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती थी। राम की पैड़ी और सरयू के घाटों की स्थिति भी खराब थी। श्रद्धालुओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। आज अयोध्या का कायाकल्प हो चुका है। अयोध्या अब त्रेता युग की स्मृतियों को साकार करती हुई दिखाई देती है। सप्तपुरियों में प्रथम पुरी अयोध्या आज आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और भौतिक रूप से अपने गौरव के अनुरूप विकसित हो रही है। आज अयोध्या का संत देश-दुनिया में कहीं जाता है तो उसे सम्मान मिलता है। यह संतों के तप, साधना और श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान किए गए संघर्ष का परिणाम है।


मुख्यमंत्री ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान पूज्य संतों ने अत्यंत विषम परिस्थितियों में संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि यह हिन्दू समाज की त्रासदी थी कि जिस समय अयोध्या में प्रभु श्रीराम का राजतिलक होना चाहिए था, उस समय उन्हें वनवास दे दिया गया। आज भी अयोध्या और श्रीराम जन्मभूमि को लेकर षड्यंत्र और विरोध के प्रयास हो रहे हैं। इन प्रयासों के पीछे सनातन धर्म को निशाना बनाने की मानसिकता दिखाई देती है।


जो लोग वर्ष 1947 में मौन रहे, जो पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं के कत्लेआम पर मौन रहते हैं, वही लोग आज श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान रामभक्तों के विरोध में खड़े होने के बावजूद स्वयं को रामभक्त बताने का प्रयास कर रहे हैं। यह वही लोग हैं, जिन्होंने राम जन्मभूमि आन्दोलन के दौरान रामभक्तों पर लाठी और गोली चलाने का समर्थन किया तथा श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े मुकदमों में मन्दिर निर्माण के विरुद्ध पैरवी की।ऐसे राजनीतिक प्रयासों को कालनेमि की संज्ञा देते हुए कहा कि समाज को ऐसे लोगों को पहचानना होगा। जो बाबरी के भक्त रहे हैं, वे बजरंगबली के भक्त होने का दावा नहीं कर सकते। बजरंगबली ऐसे कालनेमियों को पहचानने में सक्षम हैं और रामभक्तों को भी ऐसी पहचान की सामर्थ्य विकसित करनी होगी।


श्रीराम जन्मभूमि से सम्बन्धित चढ़ावे का मामला सामने आया था। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास की सिफारिश पर एस0आई0टी0 गठित हुई और उसके आधार पर कार्रवाई की गई। कार्रवाई अभी भी चल रही है। किसी भी अपराधी के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। सरकार और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट इस विषय में पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। इस मामले को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग देकर श्रीराम जन्मभूमि और रामभक्तों को बदनाम करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन में संतों का योगदान किसी स्वार्थ के लिए नहीं था। उनका एकमात्र उद्देश्य मन्दिर निर्माण था। आज जब वह संकल्प पूरा हो चुका है, तब राम जन्मभूमि आन्दोलन का विरोध करने वाले लोगों का स्वयं को रामभक्त बताना समाज को भ्रमित करने का प्रयास है।


वर्ष 1947 में यदि कांग्रेस ने दृढ़ता से विभाजन का विरोध किया होता, तो देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन नहीं होता। उन्होंने कहा कि यदि उस समय सरदार वल्लभभाई पटेल जैसा दृढ़ नेतृत्व या श्री नरेन्द्र मोदी जैसा मजबूत नेतृत्व होता तो लाखों हिंदुओं का कत्लेआम नहीं होता। आज कुछ लोगों की पीड़ा यह है कि कश्मीर में शांति क्यों स्थापित हो रही है, धारा 370 क्यों समाप्त हुई, देश से माओवाद और नक्सलवाद क्यों समाप्त हो रहा है तथा पूवोत्तर राज्यों में उपद्रव क्यों समाप्त हुआ। देश को जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बांटना कुछ राजनीतिक शक्तियों की पुरानी कार्यपद्धति रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे तत्व कभी जाति, कभी भाषा और कभी क्षेत्र के नाम पर समाज में विभाजन पैदा करने का प्रयास करते हैं।


आज अयोध्या, उत्तर प्रदेश और भारत को देश-दुनिया में सम्मान मिल रहा है। उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस और यू0पी0ए0 सरकारों के समय यह सम्मान क्यों नहीं था। उन्होंने कहा कि उस समय सनातन धर्म की चर्चा क्यों नहीं होती थी। भारत की चर्चा क्यों नहीं होती थी। उत्तर प्रदेश की चर्चा क्यों नहीं होती थी। अयोध्या का वैभव क्यों नहीं दिखाई देता था। श्री काशी विश्वनाथ धाम का निर्माण क्यों नहीं हुआ मथुरा-वृंदावन का विकास उस रूप में क्यों नहीं दिखाई दिया।


वर्ष 2017 में अयोध्या दीपोत्सव से जुड़े अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि उसी समय मथुरा-वृंदावन और ब्रज क्षेत्र के विकास की बात कही गई थी। उन्होंने समाजवादी पार्टी के एक नेता के उस कथित बयान का उल्लेख किया, जिसमें सपा सरकार आने पर कंस की मूर्ति लगाए जाने की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री ने टिप्पणी की कि जिनकी सोच ही कंस जैसी हो, उनसे इससे अधिक उम्मीद क्या की जा सकती है।
मुख्यमंत्री जी ने पूज्य परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज और गोरक्षपीठ के बीच आत्मीय संबंधों को याद करते हुए कहा कि जब भी वे लखनऊ या दिल्ली से गोरखपुर जाते थे, उनके पूज्य गुरुदेव उन्हें अयोध्या होते हुए जाने और परमहंस जी महाराज से मिलकर आशीर्वाद लेने का निर्देश देते थे। दोनों संतों के बीच भाइयों जैसा सम्बन्ध था। कई बार परमहंस जी महाराज गोरखपुर पहुंचकर कमरे में बैठ जाते थे, रामायण देखते थे और महन्त जी के आने की प्रतीक्षा करते थे। इतना बड़ा संत होने के बावजूद परमहंस जी महाराज का जीवन अत्यन्त सादा और फक्कड़ था। वे दिगम्बर अखाड़े के बाहर धूनी रमाकर सहज भाव से बैठे रहते थे। अन्तिम दिनों में भी जब वे परमहंस जी महाराज से मिलने जाते थे तो महाराज जी अपने स्वास्थ्य के बारे में बात नहीं करते थे। वे केवल एक प्रश्न करते थे कि श्रीराम मन्दिर का निर्माण कब होगा। उनके लिए जीवन का अंतिम क्षण भी राम मन्दिर के संकल्प को समर्पित था।


वर्ष 1990 में जब रामभक्तों पर गोली चलाई गई तो पूज्य परमहंस जी महाराज ने रामभक्तों की स्मृति में स्मारक बनाने का संकल्प लिया और दिगम्बर अखाड़े के बाहर स्मारक निर्माण कराया। सरकारें भी उनके संकल्प को रोक नहीं सकीं। यह रामभक्ति का ऐसा स्वरूप था, जिसमें न सत्ता का भय था, न किसी राजनीतिक दबाव की चिंता। अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि के नाम पर एयरपोर्ट बना तो उसका भी विरोध किया गया। राम की पैड़ी के विकास का विरोध हुआ। अच्छी सड़कें, बेहतर रेलवे कनेक्टिविटी, वायु सेवा, घाटों का नवनिर्माण और अयोध्या की सुविधाओं के विस्तार का भी विरोध किया गया। उन्होंने कहा कि सामान्य रामभक्त और संत इन विकास कार्यों के विरोध में नहीं हैं। विरोध वही लोग कर रहे हैं, जो श्रीरामलला के भव्य मन्दिर के विरोधी रहे हैं।


मुख्यमंत्री ने कहा कि गाय सनातन धर्म की माता और भारत की धरोहर है। गौमाता को केवल पशु के रूप में देखना भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा की भावना को नहीं समझना है। प्रदेश सरकार लगभग 16 लाख गोवंश के संरक्षण और देखभाल के लिए गौशालाओं के माध्यम से कार्य कर रही है। हिंदू समाज को गौमाता की पूजा और सेवा के बारे में किसी से सीखने की आवश्यकता नहीं है। सनातन परंपरा में प्रत्येक संस्कार में गौमाता का विशेष स्थान है। भारत की गुलामी के पीछे अन्तर्विरोध और छल जैसे कारणों से हमें सीख लेनी चाहिए। आज भी जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश हो रही है। सोशल मीडिया पर फर्जी अकाउण्ट बनाकर एक जाति को दूसरी जाति के खिलाफ भड़काने, गाली-गलौज कराने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है। जातीय सम्मेलनों के माध्यम से समाज को विभाजित करने और दंगाइयों को संरक्षण देने वाली राजनीति से भी सतर्क रहने की जरूरत है। हमें अतीत की गलतियों को दोहराने की अनुमति नहीं देनी है।


श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन और उसके बाद आए परिणाम की सुखद अनुभूति आज अयोध्या, उत्तर प्रदेश, देश और पूरी दुनिया कर रही है। यह पूज्य संतों के तप, त्याग और संघर्ष का परिणाम है। वर्तमान चुनौतियां केवल चुनौतियां नहीं, बल्कि चेतावनियां भी हैं। इनका मुकाबला करने के लिए समाज को एकजुट होकर मजबूती से खड़ा होना होगा। यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। अयोध्या धाम, श्रीराम जन्मभूमि और सनातन धर्म के सम्मान की रक्षा के लिए समाज को सदैव सजग रहना होगा। जो भी सनातन धर्म, अयोध्या धाम और हमारे तीर्थों को अपमानित करेगा, उसका लोकतांत्रिक और वैधानिक तरीके से मजबूती से मुकाबला किया जाएगा। इस अवसर पर सन्तगण सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे

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