हमारी बेटियां हमारा वरदान है

मा0 न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने किया दो दिवसीय सेन्सिटाइजेशन आफ ड्रिास्ट्रिक्ट कोर्ट जजेज आन जेण्डर जस्टिस एण्ड डिफरेंटली एबल्ड विक्टिम्स/सरवाइवर्स आफ सेक्सुअल एब्यूज कार्यक्रम का उद्घाटन।

लखनऊ। न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान गोमतीनगर लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय सेन्सिटाइजेशन ऑफ ड्रिास्ट्रिक्ट कोर्ट जजेज ऑन जेण्डर जस्टिस एण्ड डिफरेंटली एबल्ड विक्टिम्स/सरवाइवर्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज कार्यक्रम का उद्घाटन मा0 न्यायमूर्ति उच्चतम न्यायलाय दिनेश माहेश्वरी ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उन्होंने कहा कि मानव के पॉच वाह्य ज्ञानेन्द्रियां होती है, परन्तु इनसे अधिक महत्वपूर्ण मानव की आंतरिक इन्दियां होती हैं। वाह्य ज्ञानेन्द्रियों से मानव सूँघता, सुनता है, परन्तु अन्तरिक इन्द्रियों से उसे दूरदर्शिता, पूर्वाभाष, विश्वास इत्यादि का ज्ञान होता है। न्यायिक अधिकारियों से अपील करते हुए माहेश्वरी ने कहा कि हमें अपने बाह्य इन्द्रियों की जगह आन्तरिक इन्द्रियों पर अधिक विश्वास करना चाहिए।


मा0 न्ययामूर्ति माहेश्वरी ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को अपने दृष्टिकोण में संतुलन बनाना चाहिए अर्थात हमें न तो पक्षकारों पर अत्यधिक करूणा दर्शाना चाहिए और न ही बहुत कम करूणा दर्शाना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्याय हमेशा पक्षकार केन्द्रित नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘कारण केन्द्रित’ होना चाहिए अर्थात हम न्याय किसी कारण के लिए कर रहे हैं न कि किसी पक्षकार के लिए। उन्होंने कहा कि हमें न्यायिक कार्यवाहियों के दौरान असंगत तत्वों, प्रश्नों तथा ऐसे किसी भी अवयव को, जो सुसंगत नहीं है, को न्यायिक कार्यवाही में बिल्कुल भी प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि पीड़ित दिव्यांगों के प्रति विशेष दृष्टिकोंण से व्यवहार करना चाहिए तथा उनके प्रति सहानुभूति के स्थान पर संवेदनात्मक तरीके से व्यवहार करने की आवश्यकता है। हमें पीड़ितों को ऐसे वातावरण देने की आवश्यकता है, जिसमें उनके साथ-साथ हमारी भी सहभागिता हो ताकि ऐसे पीड़ित दिव्यांग अपनी व्यथा को प्रभावी रूप से संसूचित कर सकें।


इस अवसर पर मा0 मुख्य न्यायमूर्ति इलाहाबाद उच्च न्यायालय राजेश बिन्दल ने कहा कि हाल ही में आये कक्षा-10 एवं 12 के नतीजों में हमारी बेटियां आज बेटों से ज्यादा अंक हासिल की हैं एवं उनका उत्तीर्ण प्रतिशत भी बेटों से अधिक है। उन्होंने कहा कि हम ऐसे प्रदेश में रहते हैं जहाँ रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी गोंद में एक बेटे के साथ स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया था, परन्तु हमारी बेटियां या महिलाएं तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उन्हें परिवार तथा समाज का सकारात्मक सहयोग न प्राप्त हो। बेटियों को परिवार का सहयोग तो प्राप्त हो रहा है, परन्तु समाज का नहीं। अतः यह हमारी जिम्मेदारी है कि समाज के तौर पर हम प्रत्येक महिला को सहयोग प्रदान करें।


मा0 मुख्य न्यायाधीश श्री बिन्दल ने इस अवसर पर अपर्णा भट्ट, पतन जमालवाली केस इत्यादि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सबरीमाला केस, महिलाओं की आर्मी में नियुक्ति इत्यादि में दिये गये सभी विधि व्यवस्थाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए ताकि इस विषय पर न्यायिक अधिकारी और अधिक संवेदनशील हो सकें। उन्होंने उत्तर प्रदेश में लम्बित वादों का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि वादों का लम्बित रहना भी यह दर्शित करता है कि उन्हें न्याय नहीं प्राप्त हो रहा है। यदि न्यायालय के किसी आदेश द्वारा भरण-पोषण से संबंधित आदेश का पालन नहीं हो रहा है, तो इसे भी न्याय न मिलने के बराबर ही समझना चाहिए।


मा0 मुख्य न्यायाधीश श्री बिन्दल ने कहा कि पीड़ित दिव्यांगों से संबंधित वादों का कोई निश्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, परन्तु हमें ऐसे मामलों को अधिक संवेदना से देखने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसे मामलों में कभी-कभी दिव्यांग को पता ही नहीं होता है कि जो उसके साथ हो रहा है वह अपराध की श्रेणी में आता है अथवा नहीं। उन्होंने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को संवेदनशील होकर पुराने मुकदमों का निस्तारण करना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है नये वादों का निस्तारण करना। उन्होंने कहा कि यह कांफ्रेंस प्रतिभागियों के मध्य इण्टर-एक्टिव होना चाहिए, न कि लेक्चर जैसा।


इस अवसर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने मा0 उच्चतम न्यायालय के मा0 न्यायमूर्ति यू0यू0 ललित के एक वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘ऐसी संगोष्ठियां जनमानस से ज्यादा स्वयं को शिक्षित करने के लिए आयोजित होती हैं’। उन्होंने कहा कि हम सबको भी इस दो दिवसीय कांफ्रेंस लाभान्वित होना चाहिए ताकि जब हम अपने कार्य स्थल पर वापस लौटें तो मा0 उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किये गये लक्ष्यों का अनुपालन कर सकें।इस अवसर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की मा0 न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं को पूजा नहीं ऐहसास चाहिए, उनके वजूद का महत्व होना चाहिए, वे अपनी जगह स्वयं ही बना लेंगी, उन्हें किसी पूजा की जरूरत नहीं है।


इस अवसर पर मा0 न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय ने अतिथिगणों का स्वागत किया और संस्कृत की एक उक्ति का जिक्र करते हुए कहा कि ‘यत्र नारयस्तु पुज्यन्ते, रमंते तत्र देवता’’ अर्थात स्त्रियों का सम्मान उनका आदर करने की प्रथा शुरू होनी चाहिए तथा उन्हें बराबरी का दर्जा देने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपना माइन्ड सेट बदलने की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि ‘लेट्स ब्रेक जेन्डर, स्टियरोटाइप’।संस्थान के निदेशक विनोद सिंह रावत ने अतिथिगणों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

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