योग क्या है….?

कुमार कृष्णन

मेरी दृष्टि में योग के चार मुख्य सोपान हैं जिसमें पहला है योग का अभ्यास।आपकी कोई अपेक्षा कामना या महत्वाकांक्षा रहती है जिसकी पूर्ति के लिए आप योग सीखते हैं। यह कामना तनाव से मुक्ति पाने,शरीर को लचीला बनाने,एकाग्रता बढ़ाने या पीठ दर्द से छुटकारा पाने की हो सकती है। जब आप अपनी किसी कामना या आवश्यकता को पूरा करने के लिए योग की शरण में जाते हैं तो यह योगाभ्यास कहलाता है। विश्व स्तर भर में योग का यही आयाम प्रचलित है। दूसरा सोपान है साधना का है, जहां आप योग के लक्ष्यों का अनुशरण करते हैं। हठ योग का क्या लक्ष्य है….?

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इडा और पिंगला नाड़ियों का संतुलन। अगर हठ योग के अभ्यास से इडा-पिंगला की सामंजस्य पूर्ण स्थिति की ओर अग्रसर हो रहे हैं तो आप हठ योग का लक्ष्य सिद्ध कर रहे हैं। राजयोग का लक्ष्य क्या है? चितवृतिनिरोध:मन की चंचल वृतियों पर नियंत्रण। आपका राजयोग का अभ्यास इसी दिशा में ले जाए तो यह राजयोग की साधना है। क्रिया योग का लक्ष्य क्या है?

प्राणों, चक्रों और कुंडलिनी शक्ति की क्रमवद्ध ढंग से जागृति। जिस क्षण आप योग के लक्ष्यों को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं,आपका प्रयास योग साधना बन जाता है, लेकिन जैसे ही आप अपनी मर्जी या पसंद को प्राथमिकता देते हैं तो वह मात्र योगाभ्यास रह जाता है।साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते हैं जहां योग एक जीवन शैली,एक अभिव्यक्ति एक व्यवहार बन जाता है, और जीवनशैली के तीसरे सोपान से अंतत: चौथे सोपान में आते हैं तो जहां योग संस्कृति बन जाता है।

योग एक व्यवहारिक पद्धति है जिसके द्वारा हम शरीर,मन भावना और आत्मा,इन चारों को संतुलित कर पाते हैं। इनमें से एक भी बिगड़ गया तो पूरा जीवन बिगड़ जाता है।शरीर के भीतर ढ़ेरों अंग होते हैं,अगर इनमें कोई अंग खराब या गड़बड़ हो जाए तो शरीर साथ नहीं देता है। हमारे व्यक्तित्व के एक आयामों में से एक खराब हो जाए तो सोचो क्या होगा….?

योग का पहला हिस्सा है शारीरिक, दूसरा है मानसिक और भावनात्मक तथा तीसरा है आध्यात्मिक। योग के शारीरिक पक्ष का संबध है हठयोग से, मानसिक पक्ष का संबध है राजयोग से और आध्यात्मिक पक्ष का संबध है क्रियायोग से। गुरूदेव स्वामी सत्यानंद सरस्वती इन तीनों को लेकर चले।यौगिक जीवन शैली ही व्यक्ति के चरित्र में आशावादिता और रचनात्मकता का विकास करता है।योग जीवन का विज्ञान है शरीर का विज्ञान नहीं।

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