Friday, May 22, 2026
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पारा हुआ पचास…

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पारा हुआ पचास...
पारा हुआ पचास...

जेठ दुपहरी आग सी, झुलसे खेत-खलिहान।

पारा चढ़कर बोलता, व्याकुल हुआ जहान॥

सूरज बरसे आग जब, तपे धरा आकाश।

पारा हुआ पचास तो, टूटे जन-विश्वास॥

लू के तीखे तीर से, घायल हर इंसान।

पारा हुआ पचास जब, सूखे तन-मन-प्राण॥

पंछी बैठे छाँव में, खोए अपनी तान।

पारा हुआ पचास तो, मौन हुआ विहान॥

सूख गए सब ताल जब, प्यासी हुई बहार।

पारा हुआ पचास तो, जीना भी दुश्वार॥

बिजली भी बेदम हुई, पंखे हुए उदास।

पारा हुआ पचास जब, छिना गया उल्लास॥

नदियाँ माँगें मेघ से, थोड़ी शीतल छाँव।

पारा हुआ पचास तो, जलते सारे गाँव॥

धरती तपती ज्यों तवा, जलते पग-पग पाँव।

पारा हुआ पचास तो, कठिन लगे हर ठाँव॥

बच्चे-बूढ़े सब कहें, कब बरसेगी धार।

पारा हुआ पचास तो, संकट अपरम्पार॥

जल संरक्षण कीजिए, प्रकृति करे पुकार।

पारा हुआ पचास तो, संकट बारंबार॥

काटे हमने वृक्ष सब, भोग रहे परिणाम।

पारा हुआ पचास तो, कैसे मिले आराम॥

धरती माँ की पीर को, समझो हे इंसान।

पारा हुआ पचास तो, संकट में है जान॥

जलती सड़कें पूछतीं, कहाँ गई बरसात।

पारा हुआ पचास तो, कठिन हुए हालात॥

प्रकृति से जो खेलते, सुन लें यह संदेश।

पारा हुआ पचास तो, संकट में परिवेश॥

————————डॉ. सत्यवान सौरभ