PDA पर सपा की रणनीति बरकरार,क्या बूथ स्तर पर तैयार है संगठन?

विनोद यादव
विनोद यादव

उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी का PDA फोकस लगातार चर्चा में है। पार्टी की रणनीति में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों तक संगठन की पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। अब सवाल यही है कि क्या सपा का संगठन बूथ स्तर पर अपनी तैयारियों को उतनी ही मजबूती से जमीन पर उतार पाया है?PDA पर सपा का फोकस बरकरार, बूथ स्तर के कार्यकर्ता क्या हैं तैयार। चुनाव नजदीक आते ही विधानसभा के दावेदार अपने अपने चहेतों को देते हैं जिम्मेदारी। पांच सालों में दर्जनों बूथों पर कभी नहीं हुई बूथ स्तर की कोई बैठक।

लखनऊ। पीडीए की सियासी जमीन जहां मजबूत करने की पूरी कोशिश की जा रहीं हैं वहीं 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बूथ रहेगा कितना मजबूत पर भी विमर्श करने की जरूरत हैं। एक तरफ जहां यूपी में प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी हैं वहीं सत्ता में बैठी बीजेपी और उसके सरकारी तंत्र हैं। सवाल इस लिए भी महत्वपूर्ण हैं क्यूंकि उपचुनाव मिल्कीपुर और कुंदरकी का सब ने देखा था किस तरह से पुलिसियातंत्र का प्रयोग किया गया था। खैर बीते पिछलें विधानसभा चुनाव में सुल्तानपुर जिले की पांच विधानसभा सीटों के 2022 के चुनाव परिणाम समाजवादी पार्टी के सामने बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की चुनौती की ओर इशारा करते हैं।

2022 में जिले की पांच विधानसभा सीटों में समाजवादी पार्टी को केवल इसौली में जीत मिली। यहां सपा प्रत्याशी मोहम्मद ताहिर खान ने भाजपा प्रत्याशी को महज 269 वोटों से हराया था। वहीं सुल्तानपुर विधानसभा में सपा प्रत्याशी अनूप संडा केवल 1,009 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए।अब सवाल बूथ पर जब सुल्तानपुर सीट पर हार का अंतर सिर्फ 1,009 वोट रहा, तो बूथ स्तर पर कुछ अतिरिक्त वोटों का प्रबंधन भी चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर कादीपुर में 25,723 वोट का अंतर बताता है कि वहां चुनौती कहीं बड़ी थी।


ऐसे में सपा संगठन के सामने कई सवाल हैं..क्या 2022 के चुनाव के बाद बूथवार समीक्षा हुई? जिन बूथों पर सपा को अपेक्षाकृत कम समर्थन मिला, वहां संगठन ने दोबारा संपर्क अभियान चलाया?क्या प्रत्येक बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ताओं और मतदाता संपर्क की वास्तविक स्थिति की समीक्षा हो रही है? क्या हार-जीत के आंकड़ों को केवल विधानसभा स्तर पर देखा जा रहा है या बूथ स्तर तक विश्लेषण किया जा रहा है?पूराने आंकड़ों की बात करें तो सुल्तानपुर विधानसभा में 2022 में कुल 441 मतदान केंद्र/स्टेशन थे और करीब 57.6 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ था।

उपलब्ध Form-20 डेटाबेस में प्रत्येक मतदान केंद्र का मतदाता और मतदान प्रतिशत भी दर्ज है।इसलिए अगला महत्वपूर्ण कदम केवल यह देखना नहीं है कि किस विधानसभा में कितने वोट मिले, बल्कि यह पता लगाना भी है कि किस बूथ पर सपा मजबूत रही और किन बूथों पर उसका प्रदर्शन कमजोर रहा। बड़ा सवाल यह हैं कि अगर चुनाव विधानसभा नहीं बल्कि बूथ पर जीता जाता है, तो सुल्तानपुर में सपा का बूथ संगठन कितना तैयार है? 2022 के आंकड़े पार्टी के लिए एक स्पष्ट तथ्य जरूर सामने रखते हैं,इसौली में मामूली अंतर से जीत और सुल्तानपुर में मामूली अंतर से हार के बीच बूथवार आंकड़ों की गहराई से समीक्षा महत्वपूर्ण है। हालांकि केवल चुनाव परिणामों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि हार का कारण बूथ संगठन ही था।

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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एंव पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सरकार लगातार अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीडीए को साथ लेकर चलने की वकालत करते नजर आते हैं। मगर पीडीए में जो पीडित हैं दुखी हैं अतिपिछड़ा हैं क्या वह अपना बूथ बचा पाएगा..यह सबसे बड़ा सवाल हैं। सवाल इसलिए हैं क्योंकि पूर्व के विधानसभा चुनाव लड़ चुके समाजवादी पार्टी के किसी एक प्रत्याशी ने कभी अपने सबसे मजबूत कड़ी कहें या पार्टी की नीव का हिस्सा जो बूथों पर डट कर खड़ा रहता हैं..विपक्षी पार्टियों के ताने सुनता हैं उनकी बोली सुन कर सहते हुए पार्टी के एक एक वोट को डलवाने का कार्य करता हैं..उसका फिक्र और जिक्र कभी इन प्रत्याशियों ने नहीं किया न कभी उनसे चुनाव हारने या जीतने के बाद कोई भी इनसे संवाद स्थापित नहीं किया। यह कड़वी सच्चाई हैं। जब चुनाव नजदीक आता हैं तो विधायक अपने चहेतों को जिम्मेदारी सौपने लगते हैं कि गांडीव खूटी पर जो अभी तक टंगा था उसे उठा लीजिए और मुकाबले की तैयारी में लग जाइए।

ऐसे में वह कैसे मजबूती के साथ खड़े होकर सत्ता धारी दल के सामने मुकाबला करेगा। शायद पार्टी के जिलाध्यक्ष कभी इनके साथ बैठकर संवाद स्थापित किए हो पांच वर्षों में..मगर राष्ट्रीय नेतृत्व को बरगलाने का हमेशा प्रयास किया गया सच्चाई ऊपर तक किसी ने पहुचाने की जिम्मेदारी नहीं ली। पीडीए की बैठक और पीडीए चौपाल के संवाद स्थापित करने मात्र से गांवों तक आवाज नहीं पहुच पाती..बैठकी चुनिंदा जगहों पर ही क्यूं हो रही हैं जहा पीडीए की बाहुल्यता हैं उस गांव कस्बे में क्यूं नहीं..क्या मात्र राष्ट्रीय नेतृत्व की नजरों में फोटोशूट और पार्टी कार्यालय की परिक्रमा मात्र से जनता आपका काम जिम्मेदारी से करेगी या अपने सबसे मजबूत कड़ी से आपकों संवाद स्थापित करना होगा।मगर ऐसा नहीं हुआ बीते पांच वर्षों में..अगर बात तथ्यात्मक नहीं तो राष्ट्रीय नेतृत्व बिना दावेदारों को बताए किसी विधानसभा के बूथ पर कार्य करने वालों लोगों से संपर्क स्थापित कर ले कि आपके विधानसभा क्षेत्र से जो उक्त प्रत्याशी चुनाव लड़ा था पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया था उसने कब आप से मुलाकात की या फोन पर वार्ता की । सब साफ हो जाएगा..जिन बूथों पर विधानसभा चुनाव लड़े प्रत्याशियों ने बहुत कम वोटों से हार का सामना किए क्या उनके पास डेटा नहीं था आखिर क्या कारण रहा हम यहा से कम वोट पाए..क्या हम यहां तक पहुंचे थें चुनाव के समय।

बीते विधानसभा चुनाव की बात करें तो सुल्तानपुर की पांच विधानसभा सीटों में से पाचों प्रत्याशियों ने दर्जनों ऐसी ग्रामपंचायत में नहीं पहुचें चुनाव के समय जहां जनता के अंदर इस बात को भी लेकर नाराजगी थी..कि प्रत्याशी नहीं आ रहें हैं वोट मागंने मगर हमें राष्ट्रीय नेतृत्व को देखना हैं इस लिए हम सपा के साथ हैं शायद पहुचे होते तो हार जीते के अंतर कुछ और ही होते। जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता भी यह सोचता हैं उसके नेता या पार्टी ने जिसको टिकट दिया हैं वह उसकी ग्रामपंचायत में आए..तब वह ईमानदारी से पार्टी के लिए लगता हैं। पार्टी का अदना सा कार्यकर्ता भी सामंतवादी ताकतों से अपने बल बूते लड़ता हैं और पांच वर्ष वह हर रोज लड़ता हैं। मगर चुनाव लड़ने वाले चाहे जीते या हारे अपने जमीन स्तर के कार्यकर्ता की सुध नहीं लेते हैं। चुनाव जीतने के बाद हमेशा माला पहनाने वाले ही याद किए जाते हैं। इस लिए जमीन स्तर के कार्यकर्ताओं की कोई सुध नहीं रहती।

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अहम सवाल यह हैं बूथ पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता आखिर क्यों रहते हैं उपेक्षित?जिलाध्यक्ष, विधायक और सांसद नहीं दे पाते हैं अपने बूथ लेबल के कार्यकर्ताओं का ध्यान। भाजपा के मकडज़ाल में जहां पन्ना प्रमुख एंव संगठन से जुड़े लोग बूथ स्तर पर सक्रिय रहते हैं।वही विपक्षी पार्टियां कमतर दिखाई पड़ती हैं अपने बूथ पर।चुनावी राजनीति में बूथ को किसी भी राजनीतिक संगठन की सबसे मजबूत कड़ी माना जाता है। बूथ स्तर पर मतदाताओं से संपर्क करने, संगठन का संदेश घर-घर पहुंचाने और मतदान के दिन कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की जिम्मेदारी इन्हीं कार्यकर्ताओं पर होती है। लेकिन बूथ स्तर पर काम करने वाले कई कार्यकर्ताओं के बीच यह शिकायत चर्चा में हैं कि चुनाव के बाद उनकी भूमिका और समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि चुनाव के समय बूथ कार्यकर्ताओं की तलाश शुरू हो जाती है, लेकिन सामान्य दिनों में उनकी समस्याओं और संगठन में उनकी भूमिका को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती।

जिलाध्यक्ष से लेकर जनप्रतिनिधियों तक सवाल


कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जिलाध्यक्ष नियमित रूप से बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से संवाद करते हैं? क्या विधायक और सांसद अपने क्षेत्र के बूथ कार्यकर्ताओं की बैठक लेकर उनकी समस्याएं सुनते हैं?क्या संगठन में लगातार सक्रिय रहने वाले कार्यकर्ताओं की पहचान कर उन्हें जिम्मेदारी और सम्मान दिया जाता है।कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि बूथ पर काम करने वाला कार्यकर्ता ही सबसे पहले जनता के सवालों का सामना करता है, लेकिन जब संगठनात्मक निर्णय या राजनीतिक कार्यक्रमों की बात आती है तो उसकी राय कई बार पीछे छूट जाती है।

PDA की रणनीति और बूथ स्तर का संगठन—दोनों सपा की तैयारियों के अहम हिस्से हैं। अब आगे की तस्वीर संगठन की जमीनी सक्रियता और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम से साफ होगी। अपडेट्स के लिए जुड़े रहिए निष्पक्ष दस्तक के साथ।

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