जीरो टॉलरेंस के बीच यूपी सिडको की टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल!

जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच यूपी सिडको की टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। समाज कल्याण निर्माण निगम की टेंडर प्रक्रिया को लेकर कमीशनखोरी और टेंडर सेटिंग के आरोप सामने आए हैं। एक ठेकेदार ने इन आरोपों को लेकर प्रमुख सचिव तक शिकायत पहुंचाई है। आखिर टेंडर प्रक्रिया में क्या हुआ, किन बिंदुओं पर उठ रहे हैं सवाल और शिकायत में क्या आरोप लगाए गए हैं?

त्रिनाथ शर्मा

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति के बीच समाज कल्याण विभाग की निर्माण इकाई यूपी सिडको (समाज कल्याण निर्माण निगम) की टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। निगम में टेंडर फिक्सिंग, कमीशन और पात्र फर्मों को तकनीकी स्तर पर बाहर किए जाने जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों को लेकर एक ठेकेदार ने शिकायत भी दर्ज कराई है, जिसकी प्रति समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव अनुराग यादव तक भेजे जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि निगम में टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर विभागीय स्तर पर कई बार निर्देश दिए जाने के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। आरोप तो यहां तक हैं कि कुछ निविदाओं में कथित रूप से पहले ही सेटिंग तय हो जाती है और उसके बाद टेंडर प्रक्रिया को उसी के अनुरूप आगे बढ़ाया जाता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।


नरवल थाना निर्माण टेंडर ने उठाए तकनीकी जांच पर सवाल


शिकायत में कानपुर के नरवल थाना परिसर में प्रस्तावित आवासीय एवं अनावासीय भवनों के निर्माण की निविदा का हवाला दिया गया है। आरोप है कि एक फर्म को पहली ही तकनीकी बिड में बाहर कर दिया गया, जबकि उसके सभी आवश्यक दस्तावेज सही और प्रमाणित होने का दावा किया गया है। वहीं, शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस फर्म को काम दिए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, उसके निविदा दस्तावेजों में कई खामियां होने के बावजूद उसे तकनीकी स्तर पर आगे बढ़ाया गया। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और समान अवसर के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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बांसगांव थाना टेंडर में भी योग्यता जांच पर सवाल


शिकायत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के बांसगांव थाना निर्माण कार्य का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि जिस फर्म को काम दिए जाने की प्रक्रिया हुई, उसकी तकनीकी एवं अनुभव संबंधी पात्रता की पर्याप्त जांच नहीं की गई। शिकायतकर्ता ने सीएंडडीएस से जारी अनुभव प्रमाणपत्र की सत्यता और स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाए हैं। सबसे गंभीर आरोप यह है कि कथित तौर पर टेंडर प्रक्रिया में पहले से तय फर्मों को लाभ पहुंचाने के लिए अन्य पात्र फर्मों को तकनीकी बिड में ही बाहर करने का प्रयास किया जाता है। शिकायत में कमीशन के रूप में कथित तौर पर सात से आठ प्रतिशत तक रकम की मांग किए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल किसी एक टेंडर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाएगा।


सूत्रों का कहना है कि कार्रवाई का एक ओर सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को अपनी प्राथमिकता बताती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी निर्माण निगम की टेंडर प्रक्रिया को लेकर सामने आई शिकायतें कई सवाल खड़े कर रही हैं। शिकायत प्रमुख सचिव समाज कल्याण तक पहुंच चुकी है। विभागीय सूत्रों का कहना कि शिकायत की निष्पक्ष जांच होती है या मामला भी सरकारी फाइलों में दर्ज होकर ठंडे बस्ते में चला जाता है। सवाल सीधा है, यदि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो शिकायत की जांच कराने में किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? और यदि आरोप गलत हैं तो जांच के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कब होगा?

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