ब्रांडों की इस दौड़ में, बिकता मन का चैन। तन पर लाखों खर्च हैं, भीतर खाली नैन।।
किस्तों में जीवन कटा, कर्ज हुआ सरताज। महँगी गाड़ी ले लिया, छूटा घर का साज।।
दिखने में सब खुशहाल हैं, भीतर गहरा शोक। सोशल मीडिया पर हँसें, मन में पलता रोग।।
जरूरत से ज्यादा जुटा, फिर भी मन ना तृप्त। लोभ बढ़े दिन-रात तो, जीवन जाए लिप्त।।
मोबाइल सुख खोजते, रिश्ते हुए अनजान। पास खड़े अपनों लगे, दूर हुआ इंसान।।
धन की खातिर दौड़ते, सुबह हुई से शाम। जीवन पूछा एक दिन, मेरा क्या है काम।।
बच्चों को सुविधा मिली, समय मिला न प्यार। बड़ा हुआ जब पुत्र तो, रिश्ते हुए उधार।।
हर सुविधा घर में मिली, फिर भी मन बेजार। सुख-साधन के बीच में, सुख क्यों हुआ फरार।।
फोटो में मुस्कान है, आँखों में है पीर। दिखलावे के युग भला, कौन हुआ गंभीर।।
चाहत की यह बेल अब, फैल गई हर ओर। जितना सींचो लालसा, उतना बढ़ता जोर।।
वस्तु बढ़ी तो चाह भी, चाह बढ़ी तो शोक। तृष्णा की इस आग में, जलता जाए लोक।।
माप लिया सुख को यहाँ, धन-दौलत के साथ। प्रेम, समय और संतोष को, छोड़ दिया क्यों हाथ।।
जिसको समझा सुख सदा, निकला केवल जाल। चमकीली दुनिया तले, मन है क्यों बेहाल।।
ऊँची है अट्टालिका, ऊँचे इनके दाम। पर रिश्तों की नींव में, क्यों दिखता विराम।।
जीवन भर संग्रह किया, फिर भी मन लाचार। संतोषी की झोंपड़ी, निकली सुख का द्वार।।
दौड़-दौड़कर पा लिया, दुनिया भर का माल। खुद को पाने की घड़ी, आई बीते काल।।
—–डॉ. प्रियंका सौरभ



