ट्रंप टैरिफ के बीच ब्रिक्स देशों से बढ़ता व्यापार

डा.जयंतीलाल भंडारी

यकीनन यह कोई छोटी बात नहीं है कि जहां इस समय अमेरिका के नए कानून से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुट्ठी में भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की शक्ति आ गई है, वहीं दूसरी ओर टैरिफ चुनौतियों के बीच ब्रिक्स देशों में भारत से निर्यात बढ़ रहे हैं। साथ ही ब्रिक्स के कई देशों में भारत के लिए कारोबार की नई संभावनाएं आकर ले रही हैं। वर्ष 2006 में जो ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) महज 5 देशों का समूह था, वह अब 11 पूर्णकालिक सदस्यों का एक अत्यधिक प्रभावशाली और शक्तिशाली आर्थिक ब्लॉक बन चुका है। इसमें पांच मूल देशों के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और इंडोनेशिया शामिल हो चुके हैं। इसके साथ ही 10 अन्य राष्ट्रों को सहयोगी देश का दर्जा दिया गया है।इस समय ब्रिक्स का जनसांख्यिकीय एवं आर्थिक प्रभाव अभूतपूर्व है। यह संगठन वैश्विक जनसंख्या के करीब 50 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आधार पर ब्रिक्स का वैश्विक जीडीपी में योगदान करीब 40 प्रतिशत हो चुका है।

हाल ही में वाणिज्य मंत्रालय के द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक ‌चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों (अप्रैल से अगस्त) में भारत और ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। इस अवधि के दौरान भारत का प्रमुख ब्रिक्स सदस्य राष्ट्रों—चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और रूस—को कुल निर्यात 34 प्रतिशत से बढ़कर 19.9 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा न केवल भारतीय उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने व्यापारिक संतुलन को मजबूत करने में सफल हो रहा है।ब्रिक्स देशों में चीन भारत का सबसे बड़ा साझेदार है।ब्रिक्स देशों में चीन को होने वाले भारतीय निर्यात में सबसे अधिक उछाल देखने को मिला। चीन को निर्यात 39 की मजबूत वृद्धि के साथ 9.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया। ब्रिक्स देशों को हुई कुल निर्यात वृद्धि में चीन का योगदान सर्वाधिक रहा है, जो दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिशीलता में सुधार का संकेत है। दक्षिण अफ्रीका में सबसे तेज वृद्धि रही है। प्रतिशत के लिहाज से दक्षिण अफ्रीका ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया है ।भारत से दक्षिण अफ्रीका को किए जाने वाले निर्यात में 58 पर प्रतिशत की भारी बढ़त दर्ज की गई, जो अफ्रीकी महाद्वीप में भारतीय सामानों की बढ़ती पैठ को रेखांकित करती है।

ब्राजील और रूस में भारत से निर्यात की स्थिर बढ़त रही दक्षिण अमरीकी साझेदार ब्राजील को होने वाले निर्यात में 13 पर प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि रूस को निर्यात में 11 पर प्रतिशत की दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गई। ब्रिक्स की इन चार प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ हुए इस बेहतर व्यापारिक प्रदर्शन का सीधा असर भारत के समग्र निर्यात बास्केट पर पड़ा है। भारत के कुल वैश्विक व्यापारिक निर्यात में इन ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी बढ़कर 9.2 प्रतिशत हो गई है, जो पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि (अप्रैल-अगस्त) में केवल 8.1 प्रतिशत थी। यह वृद्धि दर्शाती है कि भारत अपने निर्यात बाज़ार में विविधता लाने और पारंपरिक पश्चिमी बाजारों के अलावा ब्रिक्स जैसे मजबूत आर्थिक ब्लॉकों के साथ रणनीतिक व्यापार संबंधों को प्रगाढ़ करने में लगातार सफल हो रहा है।

गौरतलब है कि इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रकाशित हो रहे राष्ट्रीय और वैश्विक विश्लेषणों में कहा जा रहा है कि 12- 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता से भारत को बहुआयामी आर्थिक उपयोगिताएं मिलीं हैं। निश्चित रूप से ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्रा में आयात-निर्यात के लेन-देन से भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुस्तरीय आर्थिक लाभ प्राप्त होंगे। इससे न केवल भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर बना रहने वाला अनावश्यक दबाव काफी हद तक कम होगा, बल्कि वैश्विक बाजार में मुद्रा विनिमय (करंसी कन्वर्जन) के दौरान होने वाली अतिरिक्त वित्तीय लागत में भारी बचत होगी।

परिणामस्वरूप, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय वस्तुएं और सेवाएं अधिक मूल्य-प्रतिस्पर्धी (कॉस्ट-कंपैटिटिव) बन सकेंगी, जिससे देश के कुल निर्यात में क्रांतिकारी उछाल आने की पूरी संभावना है।आर्थिक मोर्चे पर ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों को ब्रिक्स के साझेदार देशों—ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका तथा नए शामिल हुए सदस्य देशों से आने वाले पूंजीगत निवेश और उच्च तकनीक से अभूतपूर्व संबल प्राप्त होने जा रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक नियमों, सीमा शुल्क (कस्टम्स ड्यूटीज) की प्रक्रियाओं और विनियामक अनुपालनों में सरलीकरण लाने पर बनी सहमति से भारत में मैन्युफैक्चरिंग, भारी उद्योग, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में एक क्रांति का सूत्रपात होगा।

लेकिन ब्रिक्स देशों के साथ भारत को कारोबार करते समय कुछ चुनौतियों पर ध्यान देना जरूरी है।भारत को अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक प्राथमिकताओं पर तीन तरह से पूरी तत्परता से काम करना होगा।पहला, ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंकों के साथ मिलकर स्थानीय मुद्रा व्यापार के निष्पादन के लिए एक पारदर्शी और कुशल ‘क्लियरिंग हाउस मैकेनिज्म’ की स्थापना करनी होगी, ताकि व्यापारियों को विनिमय दर के जोखिमों से बचाया जा सके।दूसरा, भविष्य की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए भारत को सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे अति-आधुनिक क्षेत्रों (डीप-टेक) में अनुसंधान और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए ब्रिक्स साझेदारों के साथ संयुक्त उद्यम (जॉइंट वेंचर्स) स्थापित करने होंगे। तीसरा, भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को आधुनिक तकनीक, सस्ता संस्थागत ऋण और वैश्विक बाजार तक पहुंच प्रदान कर उन्हें अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ना होगा, क्योंकि यही क्षेत्र देश के युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर पैदा करने में सक्षम है।

उम्मीद करें कि ट्रंप टैरिफ की चुनौतियों के बीच ब्रिक्स देशों को बढ़ता हुआ निर्यात और ब्रिक्स देशों में खुलते हुए व्यापार के नए द्वार भारत के लिए नई आर्थिक शक्ति बनेंगे। साथ ही भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने में ब्रिक्स देशों को बढ़ते निर्यात और और ब्रिक्स देशों के साथ बढ़ते और कारोबार की भी अहम भूमिका होगी।

(लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं।)

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