
लखनऊ की अदालत से आया फैसला केवल एक चर्चित हत्या के मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था के सबसे लंबे और चर्चित आपराधिक मुकदमों में से एक की निर्णायक परिणति भी है। करीब 24 साल तक चली सुनवाई, सैकड़ों तारीखें, बदलते हालात, गवाहों की मौत और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद विशेष सीबीआई अदालत ने अधिवक्ता और लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष इंद्रदेव सिंह की हत्या के मामले में शूटर विक्रम यादव उर्फ कालिया, पन्ना सिंह और बृजेश कुमार यादव उर्फ मुन्ना को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने विक्रम यादव और बृजेश यादव पर 60-60 हजार रुपये तथा पन्ना सिंह पर 30 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। साथ ही निर्देश दिया कि जुर्माने की 80 प्रतिशत राशि मृतक की पत्नी नयनतारा को दी जाएगी।
8 अगस्त 2002 की सुबह लखनऊ के जिलाधिकारी कार्यालय के पीछे हुई यह हत्या उस समय पूरे प्रदेश में सुर्खियों में आ गई थी। इंद्रदेव सिंह रोज की तरह अपने घर से कचहरी के लिए निकले थे। जैसे ही वह जिलाधिकारी कार्यालय के पीछे पहुंचे, पहले से घात लगाए स्कूटर सवार बदमाशों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। दिनदहाड़े हुई इस हत्या ने वकालत जगत में भारी आक्रोश पैदा कर दिया। पूरे प्रदेश के अधिवक्ताओं ने आंदोलन शुरू कर दिया और सरकार पर मामले की निष्पक्ष जांच का दबाव बढ़ गया। इसी दबाव के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 11 अगस्त 2002 को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की और 4 सितंबर 2002 को केंद्र सरकार ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी।
हत्या के तुरंत बाद इंद्रदेव सिंह की पत्नी नयनतारा ने कैसरबाग कोतवाली में तत्कालीन मंत्री रामकुमार वर्मा, सुरजन लाल वर्मा, डॉ. सुषमा वर्मा और सुरेश वर्मा के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था। हालांकि सीबीआई की विस्तृत जांच में इन चारों के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला और उन्हें क्लीन चिट दे दी गई। इसके बाद जांच की दिशा पूरी तरह बदल गई। सीबीआई ने तकनीकी साक्ष्यों, गवाहों के बयान और आर्थिक लेन-देन की पड़ताल के आधार पर छह नए आरोपियों को चिन्हित किया। इनमें विक्रम यादव उर्फ कालिया, पन्ना सिंह, बृजेश कुमार यादव, मुन्नालाल गुप्ता, वेद प्रकाश उर्फ नेता और छोटेलाल उर्फ छोटू यादव शामिल थे। मुकदमे के दौरान मुन्नालाल, वेद प्रकाश और छोटेलाल की मृत्यु हो गई, जबकि बाकी तीन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलता रहा।
सीबीआई की चार्जशीट ने इस हत्याकांड की पूरी साजिश का खुलासा किया। जांच में सामने आया कि हत्या किसी अचानक हुए विवाद का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसकी योजना जुलाई 2002 में बनाई गई थी। बृजेश यादव ने इंद्रदेव सिंह की हत्या की पूरी रूपरेखा तैयार की। छोटेलाल उर्फ छोटू को हत्या कराने के लिए 50 हजार रुपये की सुपारी दी गई, जिसमें 10 हजार रुपये एडवांस दिए गए। वारदात के लिए जिस स्कूटर का इस्तेमाल होना था, उसका रंग बदलवाया गया ताकि पुलिस पहचान न कर सके। इतना ही नहीं, दिल्ली का रजिस्ट्रेशन नंबर भी घटना से पहले हटा दिया गया। अदालत ने माना कि वारदात के समय स्कूटर बृजेश यादव चला रहा था, जबकि पीछे बैठे विक्रम यादव उर्फ कालिया ने इंद्रदेव सिंह को बेहद नजदीक से गोली मारकर हत्या की। पन्ना सिंह पूरी साजिश का सक्रिय सदस्य था और उसने योजना को अंजाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि हत्या के बाद सुपारी की रकम आरोपियों के बीच बांटी गई। चार्जशीट के मुताबिक, अलग-अलग आरोपियों ने रकम का हिस्सा लिया और कुछ रकम शराब पीने समेत अन्य खर्चों में इस्तेमाल की गई। सीबीआई ने आर्थिक लेन-देन और आरोपियों के बीच संपर्कों को भी अदालत के सामने रखा, जिसने अभियोजन की कहानी को मजबूत बनाया।पूरे मुकदमे की सबसे बड़ी चुनौती समय था। सीबीआई ने विवेचना के दौरान कुल 80 गवाह बनाए थे। इनमें से केवल 50 गवाह ही अदालत में बयान दर्ज करा सके। छह गवाहों की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई, पांच गवाहों का कोई पता नहीं चला और पांच गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से पलट गए। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, दस्तावेजों, फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहियों की श्रृंखला के आधार पर अदालत को यह विश्वास दिलाने में सफलता हासिल की कि हत्या पूर्व नियोजित साजिश के तहत की गई थी। इस हत्याकांड की जड़ में जमीन का विवाद था। सीबीआई के अनुसार इंद्रदेव सिंह केवल अधिवक्ता ही नहीं, बल्कि संपत्ति के कारोबार से भी जुड़े थे।
उन्होंने वर्ष 1985 में मड़ियांव क्षेत्र के सिमरा गौड़ी में कृषि भूमि खरीदी थी। बाद में उसकी प्लॉटिंग की जिम्मेदारी मन्नालाल गुप्ता को सौंपी गई। आरोप था कि वर्ष 2002 तक मन्नालाल ने बिना जानकारी दिए कई प्लॉट बेच दिए और रकम अपने पास रख ली। इसी आर्थिक विवाद ने दोनों पक्षों के बीच टकराव बढ़ाया। इंद्रदेव सिंह ने वर्ष 1998 से 2001 के बीच इस पूरे विवाद को लेकर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री, मानवाधिकार आयोग और लखनऊ पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को कई शिकायतें भी भेजीं, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो सका। जांच एजेंसी का निष्कर्ष था कि इसी विवाद ने हत्या की साजिश को जन्म दिया।
करीब ढाई दशक तक चले इस मुकदमे में कई बार ऐसा लगा कि न्याय की राह कमजोर पड़ जाएगी। कई आरोपी मर गए, गवाह खत्म होते गए, कुछ गवाह मुकर गए और समय लगातार बीतता रहा। लेकिन सीबीआई ने साक्ष्यों की कड़ी को अदालत में बनाए रखा। यही वजह रही कि 30 जून को अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी करार दिया और उसके बाद उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।इस फैसले का सबसे भावनात्मक क्षण वह था जब सजा सुनाए जाने के समय इंद्रदेव सिंह की पत्नी नयनतारा और उनकी बेटी, नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह अदालत में मौजूद थीं।
करीब 24 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद परिवार ने उन लोगों को सजा पाते देखा जिन पर हत्या का आरोप सिद्ध हुआ। यह केवल एक परिवार की न्याय यात्रा का अंत नहीं, बल्कि उन हजारों लंबित आपराधिक मामलों के लिए भी संदेश है कि यदि जांच साक्ष्यों पर आधारित हो और अभियोजन लगातार अपनी बात अदालत के सामने रखता रहे, तो वर्षों बाद भी अपराधी कानून के शिकंजे से बच नहीं सकते। लखनऊ का इंद्रदेव सिंह हत्याकांड इसी विश्वास को फिर मजबूत करता है कि न्याय भले देर से मिले, लेकिन जब साक्ष्य बोलते हैं तो अदालत का फैसला इतिहास बन जाता है।



