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अग्रिम जमानत खारिज किया जाना FIR निरस्त करने संबंधी याचिका की सुनवाई न करने का आधार नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

⚫इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की एक डिवीजन बेंच ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में अग्रिम जमानत की मांग संबंधी याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज किया जाना कोर्ट के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र के तहत सुनवाई न करने का आधार नहीं हो सकता।

? कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 का दायरा आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 के दायरे से ज्यादा बड़ा होता है।

यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 323, 504, 506 और 306 के तहत दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है।

?मृतक की पत्नी की बहन (साली) ने उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों के मद्देनजर गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की दलील थी कि महज उत्पीड़न के आरोपों के अलावा मृतक को आत्म हत्या के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उकसाने का उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं है।

? याचिकाकर्ता ने ‘प्रेम चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य’ के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के 17 सितम्बर 2020 के पूर्व के एक आदेश पर भरोसा जताया, जिसमें समान परिस्थितियों में अंतरिम राहत मंजूर की गयी थी।

?बेंच ने हालांकि, याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्रों के तहत अग्रिम जमानत के दायरे के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया और आईपीसी की धारा 306 की जरूरतों की पूर्ति से संबंधित आवश्यक तत्वों की भी समीक्षा की। कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत अपराध के मामले में मृतक के उत्पीड़न को लेकर केवल आरोप लगा देना या दावा करना ही पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए जरूरी है कि आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रमाण होना चाहिए।

?कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ मृतक को आत्म हत्या के लिए उकसावे का प्रथम दृष्टया प्रत्यक्ष या परोक्ष आरोप नहीं है। यह टिप्पणी ‘अर्नब मनोरंजन गोस्वामी बनाम महाराष्ट्र सरकार एवं अन्य (2020)’ मामले में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणी के अनुरूप है, जिसमें शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के आवश्यक पहलुओं पर विचार किया था।

?हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अग्रिम जमानत के दायरे के विभिन्न पहलुओं पर बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र का दायरा आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के दायरे से ज्यादा बड़ा है।

?कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए निर्देश दिया कि इस एफआईआर के सिलसिले में अगली सुनवाई की तारीख तक याचिकाकर्ता को गिरफ्तार नहीं किया जायेगा।

केस का नाम : नसीम बानो बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य

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