एनसीबीसी की सिफारिशानुसार ओबीसी का कास्ट सेन्सस क्यों नहीं करा रही केंद्र सरकार..?

एनसीबीसी की सिफारिशानुसार ओबीसी का कास्ट सेन्सस क्यों नहीं करा रही केंद्र सरकार….?

एससी, एसटी,माइनॉरिटी का सेन्सस होता है तो ओबीसी व सामान्य का क्यों नहीं….?

लौटनराम निषाद

लखनऊ। राष्ट्रीय पिछड़ावर्ग आयोग (एनसीबीसी) के सचिव आनन्द कुमार(आइएएस) ने आयोग के अध्यक्ष प्रो.भगवानलाल सहनी के हवाले से सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव आर.सुब्रमनियम को 1 अप्रैल,2021 को पत्र भेजकर ओबीसी की जातिगत जनगणना की सिफारिश किया था।लेकिन केन्द्र सरकार ओबीसी की जनगणना कराने से अपने ही वादे से मुकर रही है।सामाजिक न्याय की मजबूती के लिए ओबीसी की जातिगत जनगणना आवश्यक ही नहीं संविधान के अनुच्छेद-15(4),16(4),16(4-1) की मंशा के अनुरुप है।भारतीय ओबीसी महासभा के प्रवक्ता चौ.लौटनराम निषाद ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व केन्द्र सरकार ने एनसीबीसी को संवैधानिक दर्जा देने का खूब प्रचार किया।

भूपेन्द्र यादव,लक्ष्मीनारायण यादव,हुकुमदेव नारायण यादव,धर्मेन्द्र प्रधान,डॉ. रीता यादव,नित्यानन्द राय,रामकृपाल यादव आदि के माध्यम से ऐसा प्रचार कराया जैसे ओबीसी को बहुत बड़ा गिफ्ट दे दिया गया।लेकिन ओबीसी कमीशन को संवैधानिक दर्जा देना सफेद हाथी साबित हो रहा है।

उन्होंने कहा कि जब एससी,एसटी,माइनॉरिटी(मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई,बौद्ध,जैन,पारसी,रेसलर),ट्रांसजेंडर, दिव्यांग आदि की जनगणना कराई जाती है तो ओबीसी व सामान्य वर्ग की वर्गीय व जातिगत जनगणना क्यों नहीं?जून 2018 में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आरजीआई व सेन्सस कमिश्नर व जनगणना विभाग के अधिकारियों की बैठक में सेन्सस-2021 में ओबीसी की जनगणना की बात किये थे,लेकिन जनगणना के प्रारूप में ओबीसी का कॉलम ही नहीं रखा गया।

पिछड़ी जातियों की सूचीओबीसी जाति लिस्ट, ओबीसी में कौन-कौन सी जाति आती है, जाति की सूची उत्तर प्रदेश PDF, राजस्थान, बिहार, MP में पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों की सूची। अन्य पिछड़ा वर्ग भारत सरकार द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित जातियों को वर्गीकृत करने के लिए एक सामूहिक शब्द का उपयोग किया जाता है।राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा प्रदान की गई OBC की केंद्रीय सूची में कास्ट और सामुदायिक नाम खोजें। उपयोगकर्ता उपयुक्त खोज बॉक्स में समुदाय का नाम प्रदान करके सूची खोज सकते हैं।


निषाद ने बताया कि अन्तिम बार 1931 मे ब्रिटिश सरकार ने जातिगत जनगणना कराया था,जिसके अनुसार ओबीसी की जनसंख्या 52 प्रतिशत से अधिक थी।यूपीए-2 की सरकार ने सेन्सस-2011 में सोसिओ-इको कास्ट सेन्सस कराया,लेकिन जब 15 जून 2016 को केन्द्र सरकार ने जनगणना रिपोर्ट घोषित किया तो ओबीसी की जनसंख्या को छुपा लिया।ओबीसी बनने प्रधानमंत्री के काल में आखिर ओबीसी के साथ दोयमदर्जे का बर्ताव व इनके संवैधानिक अधिकारों का हनन क्यों किया जा रहा है?एनएफएस व ईडब्ल्यूएस की आड़ में उपयुक्त व पात्र ओबीसी की अनुपलब्धता दिखाकर इनका कोटा सामान्य वर्ग को दे दिया जा रहा है।उन्होंने कहा कि एससी, एसटी को कार्यपालिका, विधायिका में समानुपातिक कोटा 1935 व 1937 से ही मिल रहा है,लेकिन 60 प्रतिशत से अधिक ओबीसी को मात्र 27 प्रतिशत कोटा मण्डल कमीशन के तहत दिया गया है,वह भी पूरा नहीं मिल रहा है।

निषाद ने बताया कि लोकतांत्रिक तानाशाही द्वारा ओबीसी का संवैधानिक अधिकार छीना जा रहा है।खुलेआम इनके कोटा की हकमारी की जा रही है।ईवीएम के माध्यम से विधायिका पर ,लेटरल इंट्री के माध्यम से कार्यपालिका पर,कॉलेजियम के माध्यम से न्यायपालिका पर,मेरिट के महिमा – मंडन के माध्यम से प्रचार – माध्यम पर ,आउटसोर्सिंग के माध्यम से पब्लिक सेक्टर में अवसर की समानता छीनकर निर्णय नियामक पद पर,संविदा के माध्यम से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को दुबारा मौका देकर रोजगार पर, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के माध्यम से सरकारी संस्थाओं पर,पाठ्यक्रम निर्धारण समिति के माध्यम से शिक्षण संस्थाओं पर ,क्लिनिक एस्टाब्लीशमेंट के माध्यम से हेल्थ केअर सिस्टम पर कब्जा किया जा रहा है।”कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना” के माध्यम से देश की आधी आबादी के सारे अधिकारों पर कब्जा किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि “निजीकरण द्वारा सरकारी सम्पतियों,स्कूल,कॉलेज,अस्पताल,बैंकों,यातायात के साधनों,सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों व संस्थानों को छीना जा रहा है।छद्म-राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के नाम पर ओबीसी,एससी, एसटी की हकमारी की जा रही है।

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