‘हैलो फ्रेंड’ से IIT तक: युवा मन पर पकड़ बनाने की पूरी रणनीति

हैलो फ्रेंड से आईआईटी तक युवाओं में अपनी पैठ बचाने में कामयाब रही सरकार और संघ।

संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर अपनी पार्टी के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाते हुए युवाओं की बीजेपी और उनकी सरकार के प्रति नाराजगी के संकट को अपनी वाकपटुता से काफी हद तक टाल दिया है। विपक्ष युवाओं की पीठ पर चढ़कर मोदी सरकार को घेरने का जो सपना पाले हुए था, वह लगभग टूट चुका है। हाल ही में नीट पेपर लीक के बाद देश की राजनीति में युवाओं की भूमिका, उनकी मोदी सरकार से नाराजगी और उससे निपटने के लिए सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच चली आ रही रणनीतिक खींचतान ने एक नया मोड़ ले लिया है। नीट पेपर लीक जैसी गंभीर घटनाओं के बाद उपजे असंतोष को जिस प्रकार से राजनीतिक गलियारों में भुनाने और थामने के प्रयास किए गए, वे भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को गहराई से समझने का अवसर देते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई, जब काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने देश के युवाओं को साथ लेकर जंतर-मंतर पर एक विशाल धरना प्रदर्शन किया। हालांकि, यह प्रदर्शन कुछ विवादों के घेरे में भी रहा, लेकिन इसके बावजूद इसे काफी सफल माना गया। इसकी मुख्य वजह यह थी कि सीजेपी ने मोदी सरकार के सामने जो मांगें रखी थीं, उन्हें अंततः देर से ही सही, लेकिन सरकार को पूरा करना ही पड़ा। इस सफलता ने अचानक से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में युवाओं को ला खड़ा किया, और यहीं से राजनीतिक विश्लेषकों तथा पंडितों के बीच एक नए नैरेटिव की शुरुआत हुई।

राजनीतिक पंडितों और जानकारों ने यह नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया कि आज की जेन जी यानी देश का युवा वर्ग मोदी सरकार से बुरी तरह नाराज चल रहा है। इस वर्ग का मोहभंग होना किसी भी सत्ताधारी दल के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता था। इस बात का अहसास होते ही विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित तमाम विपक्षी दलों के नेता तुरंत मैदान में उतर आए और युवाओं को सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाने के लिए प्रेरित करने लगे। विपक्षी नेताओं ने इस दौरान पैलेट गन और एके-47 जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दों का हवाला देते हुए युवाओं की भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया, ताकि सरकार के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा किया जा सके। विपक्ष को यह लगने लगा था कि युवाओं की यह नाराजगी आगामी चुनावों में उनके लिए संजीवनी का काम करेगी और बीजेपी के किले को भेदने में मददगार साबित होगी।

लेकिन, भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम की नब्ज को तुरंत पहचान लिया और डैमेज कंट्रोल में एक पल की भी देरी नहीं की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद मोर्चा संभाला और सबसे पहले एक अनूठे अंदाज में वीडियो जारी कर देश के युवाओं को ‘हैलो फ्रेंड’ कहकर संबोधित किया। इस आधुनिक और युवा-अनुकूल संवाद शैली ने तुरंत ही सोशल मीडिया और युवाओं के बीच एक सकारात्मक संदेश भेजा। इसके बाद प्रधानमंत्री के चार और वीडियो सिलसिलेवार तरीके से सामने आए, जिनमें उनकी संवेदनशीलता और युवाओं के प्रति चिंता साफ झलकी।

पेपर लीक जैसी समस्याओं का हमेशा के लिए समाधान निकालने और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन सहित उन्होंने कई कड़े और निर्णायक फैसले लिए। सिर्फ वर्चुअल माध्यमों तक ही सीमित न रहते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने खुद आईआईटी दिल्ली का दौरा किया और सीधे तौर पर वहां के युवाओं से संवाद स्थापित किया। उन्होंने युवाओं की समस्याओं को सुना और उन्हें आश्वस्त किया कि सरकार उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी तत्व को बख्शेगी नहीं।

कुल मिलाकर, सरकार की इस त्वरित और बहुआयामी रणनीति ने यह साबित कर दिया कि बीजेपी ने युवाओं की नाराजगी से होने वाले संभावित राजनीतिक नुकसान को समय रहते सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लिया है। इस डैमेज कंट्रोल अभियान में केवल सरकार ही सक्रिय नहीं रही, बल्कि प्रधानमंत्री और बीजेपी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और उसके प्रमुख मोहन भागवत भी पूरी ताकत के साथ मैदान में कूद पड़े।

आरएसएस प्रमुख की सक्रियता और वैचारिक स्तर पर युवाओं से जुड़ने के प्रयासों ने इस अभियान को एक मजबूत वैचारिक संबल प्रदान किया। संघ के अनुषांगिक संगठनों ने भी परिसरों और युवाओं के बीच जाकर संवाद स्थापित किया, जिससे विपक्ष द्वारा गढ़ा गया वह नैरेटिव धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा, जिसमें युवाओं को सरकार के खिलाफ पूरी तरह खड़ा हुआ दिखाया जा रहा था।

दूसरी ओर, इस पूरी कवायद के बाद विपक्ष पूरी तरह से खाली हाथ खड़ा नजर आने लगा है। जिन मुद्दों को लेकर विपक्ष सरकार को घेरने की योजना बना रहा था, सरकार ने उन पर त्वरित कार्रवाई करके विपक्ष के हाथ से एजेंडा ही छीन लिया। नीट पेपर लीक के मामले में उठाए गए सख्त कदमों और नीतिगत सुधारों ने यह दिखा दिया कि सरकार केवल आश्वासन देने में नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देने में विश्वास रखती है। नतीजतन, विपक्ष के पास अब सरकार की आलोचना करने के लिए वह धारदार हथियार नहीं बचा, जो शुरुआती दिनों में नजर आ रहा था।

कुल मिलाकर, इस राजनीतिक घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक राजनीति में जनता की नब्ज पहचानना और समय पर उचित कदम उठाना कितना जरूरी है। जहां एक तरफ सत्ता पक्ष ने अपनी संवाद कुशलता और निर्णायक क्षमता का परिचय देकर स्थिति को संभाल लिया, वहीं विपक्ष एक बार फिर रणनीतिक रूप से पिछड़ता हुआ दिखाई दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केवल विरोध की राजनीति करने से बड़े राजनीतिक बदलाव हासिल नहीं किए जा सकते।

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