डॉ.विजय गर्ग
जब भारत अपना 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब यह केवल आजादी का उत्सव नहीं, बल्कि प्रगति, संघर्ष और परिवर्तन की एक असाधारण यात्रा का स्मरण भी है। वर्ष 1947 में संक्रामक रोगों, सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं और उच्च मृत्यु दर से जूझने वाला भारत आज विश्व के सबसे बड़े स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं में से एक बन चुका है। देश न केवल कुशल डॉक्टर, नर्स, वैज्ञानिक और शोधकर्ता तैयार कर रहा है, बल्कि दुनिया भर के करोड़ों लोगों के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाइयाँ भी उपलब्ध करा रहा है। फिर भी यह महत्वपूर्ण उपलब्धि हमें यह याद दिलाती है कि एक स्वस्थ भारत की यात्रा अभी अधूरी है।
स्वतंत्रता के समय देश का स्वास्थ्य ढाँचा अत्यंत सीमित था। अनेक गाँवों में अस्पताल नहीं थे और न ही प्रशिक्षित चिकित्सक उपलब्ध थे। मलेरिया, तपेदिक (टीबी), हैजा और चेचक जैसी बीमारियाँ हर वर्ष असंख्य लोगों की जान ले लेती थीं। उस समय औसत जीवन प्रत्याशा 30 वर्ष से कुछ अधिक थी और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अधिकांश लोगों के लिए एक अधिकार नहीं, बल्कि एक विशेष सुविधा थी। पिछले आठ दशकों में भारत ने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, जिला अस्पतालों, चिकित्सा महाविद्यालयों, टीकाकरण कार्यक्रमों और जनस्वास्थ्य अभियानों के माध्यम से अपने स्वास्थ्य तंत्र का उल्लेखनीय विस्तार किया है।
भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक टीकाकरण के क्षेत्र में मिली सफलता है। चेचक का उन्मूलन, पोलियो पर विजय तथा सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के विस्तार ने करोड़ों लोगों का जीवन बचाया है। संस्थागत प्रसव, बेहतर पोषण योजनाओं और बढ़ती जागरूकता के कारण मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। आज स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों की तुलना में देश की औसत जीवन प्रत्याशा दोगुने से भी अधिक हो चुकी है, जो बेहतर चिकित्सा सेवाओं, स्वच्छता और पोषण का परिणाम है।
आज भारत को “दुनिया की फार्मेसी” के रूप में भी जाना जाता है। देश किफायती जेनेरिक दवाइयाँ और टीके बनाता है, जिनकी आपूर्ति 200 से अधिक देशों और क्षेत्रों में की जाती है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय वैज्ञानिकों, स्वास्थ्यकर्मियों और दवा उद्योग ने टीकों का विकास, बड़े पैमाने पर टीकाकरण और अनेक देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराकर अपनी उत्कृष्ट क्षमता का परिचय दिया। इस उपलब्धि ने वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान एक विश्वसनीय स्वास्थ्य साझेदार के रूप में और मजबूत की।
हाल के वर्षों में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और किफायती बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहलें की हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, टेलीमेडिसिन, इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों ने विशेष रूप से दूर-दराज़ के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाई है। डिजिटल तकनीक डॉक्टरों और मरीजों के बीच की दूरी कम कर रही है तथा गाँवों तक विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
भारत का वैज्ञानिक समुदाय चिकित्सा अनुसंधान में भी निरंतर महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), जीनोमिक्स, जैव प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स और प्रिसिजन मेडिसिन में हो रही प्रगति रोगों की पहचान और उपचार की दिशा बदल रही है। स्वदेशी नवाचार, कम लागत वाले चिकित्सा उपकरण, किफायती जाँच तकनीकें और डिजिटल स्वास्थ्य समाधान गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और सस्ता बना रहे हैं।
फिर भी अनेक गंभीर चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध, अस्वास्थ्यकर जीवनशैली और बढ़ती बुजुर्ग आबादी नई जनस्वास्थ्य चुनौतियाँ बनकर उभर रही हैं। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं की असमानता तथा विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच में बाधा बनी हुई है।
एक स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक निवेश की आवश्यकता है। स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, संतुलित पोषण, नियमित शारीरिक गतिविधि, मानसिक स्वास्थ्य, तंबाकू नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को उपचारात्मक सेवाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा को और मजबूत करना होगा ताकि बचपन से ही स्वस्थ जीवनशैली की आदतें विकसित हों। सामुदायिक भागीदारी, जन-जागरूकता और प्रत्येक नागरिक का जिम्मेदार व्यवहार भी देश के स्वास्थ्य स्तर को बेहतर बनाने में समान रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत की स्वास्थ्य यात्रा का अगला चरण प्रत्येक नागरिक के लिए सार्वभौमिक, किफायती और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित होना चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना, जनस्वास्थ्य पर सरकारी निवेश बढ़ाना, चिकित्सा अनुसंधान को प्रोत्साहित करना, स्वदेशी नवाचारों को बढ़ावा देना, डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार करना तथा भौगोलिक और आर्थिक स्थिति से परे सभी नागरिकों को समान स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना भविष्य के स्वस्थ भारत की दिशा तय करेगा।
जैसे-जैसे भारत स्वतंत्रता के नौवें दशक में प्रवेश कर रहा है, वास्तविक आजादी का अर्थ केवल आर्थिक विकास नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक नागरिक का स्वास्थ्य, सम्मान और कल्याण भी होगा। एक स्वस्थ जनसंख्या ही एक समृद्ध और विकसित राष्ट्र की मजबूत नींव होती है। वैज्ञानिक नवाचार, संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाएँ, निवारक चिकित्सा और समावेशी नीतियों के समन्वय से भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि प्रत्येक बच्चा, प्रत्येक परिवार और प्रत्येक समुदाय अच्छे स्वास्थ्य का लाभ प्राप्त करे।
इस प्रकार 80वाँ स्वतंत्रता दिवस केवल अतीत की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि एक अधिक स्वस्थ, सशक्त और समानतापूर्ण भारत के निर्माण का आह्वान भी है। आइए, हम सब मिलकर “हर भारतीय के लिए स्वस्थ भविष्य” के संकल्प को साकार करें—एक ऐसा भविष्य जहाँ गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ सभी के लिए सुलभ हों, रोकथाम को उपचार जितना ही महत्व दिया जाए और प्रत्येक नागरिक को लंबा, स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने का अवसर मिले।



