धन आया घर-द्वार पर, बदले सब व्यवहार।
नए अमीरी रंग में, छूट गए संस्कार॥
अपनापन जब से गया, भूले अपने लोग।
अहंकार की धूप में, जलते अब संयोग॥
माटी की खुशबू गई, छूटे अपने गाँव।
ऊँचे महलों में मिला, रिश्तों का bअभाव॥
वैभव ने ले ली हँसी, छीन लिया सत्कार।
रिश्ते भी बाजार में, होते अब व्यापार—
धन आया घर-द्वार पर, बदले सब व्यवहार॥
थाली, चूल्हा, प्रेम था, था अपनापन साथ।
दौलत ने फिर बाँट दी, आँगन वाली बात॥
बात-बात में आ गया, अहंकार का शोर।
अपने ही लगने लगे, जैसे कोई और॥
दौलत की चौखट बनी, मन का नया द्वार।
ऊँचे होते घर गए, छोटे हुए विचार—
धन आया घर-द्वार पर, बदले सब व्यवहार॥
धन से केवल देह का, मिलता है श्रृंगार।
मन की निर्धनता मगर, करती जीवन भार॥
धन से बढ़कर मान है, प्रेम भरा परिवार।
संस्कारों की छाँव में, खिलता है संसार॥
धन टिकता कुछ काल ही, सद्गुण रहें आधार।
जिसने विनय बचा लिया, वही रहा धनवान—
धन आया घर-द्वार पर, बदले सब व्यवहार॥
सोना-चाँदी क्या करे, यदि खो जाए मेह।
संस्कारों से ही सजे, जीवन, घर और नेह॥
जिसने धन को साध लिया, वह सच्चा धनवान।
धन का दास जो बना, खो बैठा सम्मान॥
नेह बचा हो साथ तो, जीवन है त्योहार।
मानवता के सामने, फीका हर श्रृंगार—
धन आया घर-द्वार पर, बदले सब व्यवहार॥
—- डॉ. सत्यवान सौरभ



