संजय सक्सेना
लखनऊ। छात्र आंदोलनों और प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर संसद में जारी गतिरोध के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार का रुख साफ किया है। उन्होंने कहा है कि सरकार संसद में छात्रों के विरोध प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई सहित हर पहलू पर विस्तृत चर्चा कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने यह भी बताया कि गृह मंत्री अमित शाह खुद इस मुद्दे पर जवाब देंगे, जैसा कि विपक्ष मांग कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने राहुल गांधी और विपक्ष से यह भी कहा है कि वह गृह मंत्री के संसद में बयान के दौरान सदन से भाग नहीं जायें। यह और बात है कि इसके बाद भी विपक्ष सदन में हंगामा करता रहा, जो बताता है कि विपक्ष के मुंह में कुछ और, मन में कुछ और चल रहा है। क्योंकि विपक्ष बात तो छात्रों पर पैलेट गन और लाठीचार्ज की कर रहा है, लेकिन उसके दिल में चंदा चोरी पर हिन्दुओं को बांटने की साजिश पनप रही है। वहीं लोकसभा में सीटें बढ़ाकर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने के मोदी सरकार के प्रयास से भी विपक्ष को अपनी सियासी जमीन खिसकती नजर आ रही है।
इस लिये वह लगातार कोशिश कर रहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह बिल नहीं पास हो, इसलिये वह 2026 की जनगणना के अनुसार परिसीमन के नाम हंगामा खड़ा कर रहा है। दरअसल, छात्र आंदोलनों, प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई और उसके बाद संसद में पैदा हुआ गतिरोध इन दिनों भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों के विरोध प्रदर्शन और उन पर हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर संसद का माहौल लगातार गर्म बना हुआ है। एक तरफ विपक्ष इसे सरकार की दमनकारी नीति बताते हुए आक्रामक रुख अपनाए हुए है, तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने भी दो टूक कह दिया है कि वह इस मुद्दे पर हरसंभव और विस्तृत चर्चा कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस पूरे घटनाक्रम ने संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक सरगर्मी को चरम पर पहुंचा दिया है, जहां हर दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने की जुगत में लगा हुआ है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पूरे मामले पर सरकार का पक्ष बेहद स्पष्ट रूप से देश के सामने रखा है। उन्होंने दो टूक कहा है कि सरकार सदन में छात्रों के विरोध प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई से जुड़े हर एक पहलू पर खुली चर्चा करने से पीछे नहीं हट रही है। सरकार का यह रुख साफ करता है कि वह किसी भी मुद्दे से भागने के बजाय उस पर आमने-सामने की बहस चाहती है। रिजिजू ने यह भी भरोसा दिलाया कि विपक्ष की मुख्य मांग के अनुरूप देश के गृह मंत्री अमित शाह खुद इस संवेदनशील मुद्दे पर संसद में आकर सरकार का आधिकारिक जवाब देंगे और स्थिति स्पष्ट करेंगे। इसके बावजूद संसद की कार्यवाही का सुचारू रूप से चलना तो दूर, विपक्षी दलों का हंगामा लगातार जारी रहना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।सत्ता पक्ष की ओर से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि जब सरकार खुद गृह मंत्री के स्तर पर विस्तृत बयान और चर्चा के लिए तैयार है, तो फिर विपक्ष सदन में चर्चा की बजाय सिर्फ व्यवधान क्यों पैदा कर रहा है।
किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी और पूरे विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा है कि उन्हें गृह मंत्री के बयान के दौरान सदन से भागना नहीं चाहिए, बल्कि पूरी गंभीरता के साथ बहस में हिस्सा लेना चाहिए। सरकार का यह मानना है कि विपक्ष के मुंह पर कुछ और है और मन में कुछ और चल रहा है। बयानों की सतह के नीचे छिपी असली राजनीतिक रणनीतियों को टटोला जाए तो यह साफ नजर आता है कि छात्र आंदोलन सिर्फ एक तात्कालिक मुद्दा है, जिसके आड़ में कई बड़े राजनीतिक एजेंडे साधे जा रहे हैं।विपक्ष लगातार यह मांग कर रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह सदन में आएं और छात्रों पर हुए कथित लाठीचार्ज तथा पैलेट गन के इस्तेमाल पर देश को जवाब दें। लेकिन इसके बावजूद अभी तक गृह मंत्री की ओर से इस विशिष्ट विषय पर सदन के भीतर कोई औपचारिक बयान सामने क्यों नहीं आया है, इसके पीछे कई व्यावहारिक और रणनीतिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि संसद की एक तयशुदा कार्यप्रणाली और गरिमा होती है, जिसके तहत किसी भी गंभीर विषय पर बयान देने से पहले गृह मंत्रालय संबंधित राज्य सरकारों, स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभागों से पूरी तथ्यात्मक रिपोर्ट मंगाता है। जब तक घटना से जुड़े सभी पुख्ता और आधिकारिक आंकड़े हाथ में न हों, तब तक देश के गृह मंत्री द्वारा सदन में अधूरा या जल्दबाजी में बयान देना उचित नहीं माना जाता है।
इसके अलावा, पिछले कुछ दिनों से संसद में जिस प्रकार का अलोकतांत्रिक और असहयोगात्मक माहौल देखने को मिल रहा है, वह भी एक बड़ा कारण है। जब भी सदन की कार्यवाही शुरू होती है, विपक्षी सांसद बिना किसी पूर्व चर्चा या नियम के सीधे वेल में आकर नारेबाजी और हंगामा शुरू कर देते हैं। ऐसे अराजक और शोरगुल वाले माहौल में किसी भी मंत्री के लिए गंभीर नीतिगत या संवेदनशील सुरक्षा मुद्दों पर विस्तृत और सारगर्भित बयान देना तकनीकी रूप से लगभग असंभव हो जाता है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि यदि विपक्ष सचमुच छात्रों के मुद्दों पर गंभीर है और किसी सार्थक निष्कर्ष पर पहुंचना चाहता है, तो उसे पहले सदन के नियमों के तहत शांतिपूर्ण माहौल में चर्चा की शुरुआत करनी होगी, न कि केवल राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए व्यवधान को हथियार बनाना होगा। संसद के भीतर छात्रों के आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को तूल देने के पीछे विपक्ष की जो असली मंशा छिपी है, उस पर गौर करें तो मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष का यह आरोप पूरी तरह तार्किक प्रतीत होता है कि विपक्ष के दिल में छात्रों के प्रति संवेदना से ज्यादा आगामी चुनावों और राजनीतिक लाभ की चिंताएं तैर रही हैं।
विपक्ष जनता के बीच जाकर यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहा है कि सरकार युवाओं और छात्रों के खिलाफ है। लेकिन इस मुखौटे के पीछे कहीं न कहीं समाज को विभिन्न मुद्दों पर उलझाने और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की कुंठा साफ झलकती है। जब भी देश में कोई सामाजिक या छात्र आंदोलन उठता है, विपक्षी दल उसे भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते, भले ही इससे देश की आंतरिक स्थिरता या संसदीय मर्यादाओं को नुकसान क्यों न पहुंचे। इस पूरे गतिरोध का एक और बहुत बड़ा और गहरा आयाम महिला आरक्षण और आगामी परिसीमन से जुड़ा हुआ है। मोदी सरकार ने लोकसभा में पर्याप्त संख्याबल के साथ महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का जो ऐतिहासिक कदम उठाया है, उससे पारंपरिक राजनीतिक समीकरण पूरी तरह हिल गए हैं। इस दूरगामी फैसले से विपक्ष को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई साफ नजर आ रही है। उन्हें इस बात का गहरा डर सता रहा है कि यदि यह बिल और इसके प्रावधान पूरी तरह लागू हो गए, तो महिलाओं का एकछत्र समर्थन वर्तमान सत्ता पक्ष की झोली में चला जाएगा। इसी असुरक्षा की भावना के कारण विपक्ष किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहता है कि वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह आरक्षण कानून पूरी ताकत के साथ धरातल पर उतरे और जनता के बीच इसका सकारात्मक संदेश जाए।
महिला आरक्षण और राजनीतिक प्रभुत्व की इसी जंग का एक और नया सिरा परिसीमन के मुद्दे से जुड़ गया है। विपक्ष अब वर्ष 2026 की जनगणना और उसके आधार पर होने वाले नए परिसीमन के नाम पर संसद और सड़क दोनों जगह अनावश्यक हंगामा खड़ा करने में जुट गया है। विपक्षी दलों द्वारा यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया के जरिए कुछ क्षेत्रों या राज्यों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि परिसीमन एक संवैधानिक और निरंतर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया है। जिसका उद्देश्य देश के बदलते जनसांख्यिकीय स्वरूप के अनुसार जनप्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। इस तकनीकी प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देना और इसे 2029 के चुनावों से जोड़कर डर का माहौल बनाना विपक्ष की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
कुल मिलाकर, संसद में चल रहा मौजूदा गतिरोध केवल छात्रों की समस्याओं या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले बड़े राजनीतिक भविष्य की एक अनकही लड़ाई है। एक तरफ सरकार जहां देश को आगे बढ़ाने वाले विधेयकों और नीतिगत सुधारों को समय पर लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए हर मुमकिन हथकंडा अपना रहा है। छात्र आंदोलन और परिसीमन जैसे संवेदनशील विषयों को मोहरा बनाकर संसद की कार्यवाही को बाधित करना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है। देश की जनता अब इन राजनीतिक पैंतरों को भली-भांति समझने लगी है और वह जानती है कि संसद में गतिरोध पैदा करने वालों के असली इरादे जनहित के बिल्कुल विपरीत हैं।



