जब अपनों की आड़ में

जब अपनों की आड़ में, मिले सदा संताप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप।
बेहतर है चुपचाप, जहाँ सम्मान न मिलता, मीठे बोलों के पीछे, मन हर रोज़ है छलता।
रिश्तों का क्या मोल वहाँ, जहाँ न कोई आप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप।

हँसते चेहरे देख लिए, भीतर कितने घाव, अपने बनकर दे गए, अपनों जैसे दाँव।
अपनों जैसे दाँव, हृदय को रोज़ जलाएँ, साथ खड़े दिखते मगर, पीठ पीछे मुस्काएँ।
कैसा फिर अपनापन है, कैसा उनका ताप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप।

जिस रिश्ते में प्रेम नहीं, वह रिश्ता कैसा, जिसमें केवल स्वार्थ हो, फिर अपना कैसा।
अपनापन कैसा, जहाँ विश्वास न बाकी, हर पल मन को चोट मिले, आँख रहे नम बाकी।
मन को भी अधिकार है, चुनने अपना आप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप।

अब न कोई शिकायत है, न कोई इल्जाम, जिसने जैसा साथ दिया, उसका वैसा नाम।
उसका वैसा नाम, न दिल में भार रखेंगे, टूटे हुए विश्वासों को फिर से प्यार देंगे।
खुद से किया है आज हमने, इतना-सा बस आप, जो मन को ही तोड़ दे, उससे रहना चुपचाप।

जब अपनों की आड़ में, मिले सदा संताप, ऐसे रिश्ते टूटना, बेहतर है चुपचाप।
बेहतर है चुपचाप… हाँ, बेहतर है चुपचाप॥

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