मुस्लिम वोट बैंक पर सियासी संग्राम,कांग्रेस और सपा के सामने बड़ी चुनौती

स्वदेश कुमार
स्वदेश कुमार

उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम वोटर को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी—दोनों की नजर इस महत्वपूर्ण मतदाता समूह पर है, लेकिन सवाल सिर्फ वोट का नहीं, बल्कि बदलते सियासी समीकरणों का है। क्या मुस्लिम वोटरों के बीच कांग्रेस अपनी खोई जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है? क्या समाजवादी पार्टी के सामने अपने पारंपरिक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है? और अगर वोटों का समीकरण बदला, तो यूपी की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ेगा? मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बढ़ती सियासी हलचल ने कांग्रेस और सपा, दोनों की रणनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रिश्ते ऐसे मोड़ पर हैं, जहां न पूरी तरह दोस्ती दिखती है, न खुली दुश्मनी। शीर्ष नेतृत्व एक-दूसरे के प्रति नरम भाषा बोल रहा है, जबकि दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेता तीखे बयानों से माहौल गरम किए हुए हैं। यह विरोधाभास संयोग से ज्यादा रणनीति जैसा लगता है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और सीटों की सौदेबाजी का असली खेल अब शुरू हुआ है।आलाकमान की नरमी की वजह समझना मुश्किल नहीं है। अखिलेश यादव और राहुल गांधी दोनों जानते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ आने का फायदा दोनों को मिला था। भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका लगा और विपक्ष को यह भरोसा मिला कि सामाजिक समीकरण और साझा रणनीति मिलकर सत्ता पक्ष को चुनौती दे सकते हैं। ऐसे में कोई भी शीर्ष नेता यह जोखिम नहीं लेना चाहता कि उसके किसी बयान से गठबंधन टूटने का ठीकरा उसके सिर फूटे। इसलिए सार्वजनिक मंचों पर दोनों तरफ से संयम दिखता है और टकराव की जगह तालमेल की बातें होती हैं।लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है।

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कांग्रेस के प्रदेश स्तर के कई नेता सपा पर सीधे या परोक्ष हमले कर रहे हैं, और जवाब में सपा के प्रवक्ता व स्थानीय नेता भी पीछे नहीं हैं। इसे सिर्फ अनुशासनहीनता कहकर खारिज करना सरलीकरण होगा। राजनीति में अक्सर यही होता है कि शीर्ष नेतृत्व अपनी छवि बचाए रखता है और दबाव बनाने का काम छोटे नेताओं से करवाता है। इससे फायदा यह है कि जरूरत पड़ने पर बयान को व्यक्तिगत राय बताकर किनारा किया जा सकता है। चर्चा यही है कि सीटों के बंटवारे से पहले दोनों दल अपनी-अपनी बोली ऊंची रखने के लिए यही तरीका अपना रहे हैं। इस खींचतान की जड़ में सबसे बड़ा मुद्दा मुस्लिम वोट बैंक है। एक समय उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का आधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम गठजोड़ पर टिका था।

मुस्लिम वोट बैंक पर सियासी संग्राम,कांग्रेस और सपा के सामने बड़ी चुनौती
मुस्लिम वोट बैंक पर सियासी संग्राम,कांग्रेस और सपा के सामने बड़ी चुनौती

मंडल-कमंडल की राजनीति के बाद यह गठजोड़ बिखरा। दलित बसपा की ओर गए, सवर्ण भाजपा की ओर और मुस्लिम मतदाता बड़े पैमाने पर सपा के साथ चले गए। कांग्रेस उसी खोई जमीन को वापस पाना चाहती है और राहुल गांधी अपने बयानों, यात्राओं और मुद्दों के चयन से लगातार इसी दिशा में बढ़ते दिखते हैं। संविधान, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात इसी कोशिश का हिस्सा मानी जा सकती है। दरअसल, सपा इस बात को भली-भांति समझती है, इसीलिए वह फूंक-फूंककर कदम रख रही है। उसे पता है कि यादव और मुस्लिम समीकरण उसकी राजनीति की रीढ़ है। अगर मुस्लिम मतदाता का झुकाव कांग्रेस की ओर बढ़ा तो सपा के पास कोई वैकल्पिक बड़ा आधार नहीं बचेगा। गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलितों में उसने पैठ बनाने की कोशिश जरूर की है, पर वह अभी इतनी मजबूत नहीं कि मुस्लिम वोट के नुकसान की भरपाई कर सके। यानी कांग्रेस के लिए यह वापसी की लड़ाई है, तो सपा के लिए अस्तित्व की। यही कारण है कि सीटों की बातचीत में दोनों तरफ का रुख कड़ा है।

इसी पृष्ठभूमि में वोट चोरी के मुद्दे पर इंडिया गठबंधन की बैठक से अखिलेश यादव की दूरी को देखा जा रहा है। यह दूरी सिर्फ एक बैठक में गैरहाजिरी नहीं, एक राजनीतिक संदेश है। अखिलेश यह जताना चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश में वह जूनियर पार्टनर की भूमिका स्वीकार नहीं करेंगे और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस जो एजेंडा तय करे, उसके पीछे आंख मूंदकर नहीं चलेंगे। साथ ही वह कांग्रेस को याद दिला रहे हैं कि प्रदेश में सबसे बड़ी विपक्षी ताकत सपा है, और गठबंधन की शर्तें भी उसी हिसाब से तय होंगी। हालांकि यह कदम जोखिम भरा भी है, क्योंकि इससे विपक्षी एकता पर सवाल उठते हैं और भाजपा को हमले का मौका मिलता है।उधर, गठबंधन का इतिहास भी इस समीकरण को जटिल बनाता है। 2017 में यूपी के लड़के का नारा देकर दोनों दल साथ उतरे थे, पर नतीजे निराशाजनक रहे और दोनों नेताओं के बीच कड़वाहट भी बढ़ी। 2019 में सपा ने बसपा के साथ प्रयोग किया, वह भी टिका नहीं। इन अनुभवों ने सिखाया कि सिर्फ नेताओं की जोड़ी काफी नहीं होती, वोटों का ट्रांसफर और जमीनी कार्यकर्ताओं का तालमेल असली कसौटी है।

2024 में यह तालमेल कुछ हद तक बना और उसका असर नतीजों में दिखा। यह अनुभव दोनों दलों को अलग होने से रोकने वाला सबसे बड़ा तर्क है। सियासी गणित के लिहाज से भी अलग-अलग लड़ना दोनों के लिए घाटे का सौदा होगा। अगर मुस्लिम और अन्य भाजपा-विरोधी वोट सपा और कांग्रेस में बंटे, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा, और कई सीटों पर मामूली अंतर से नतीजे पलट सकते हैं। मतदाता भी इस खतरे को समझता है और अक्सर उसी विपक्षी उम्मीदवार के पीछे एकजुट होता है, जो भाजपा को हराता दिखे। ऐसे में दोनों दलों पर बिखराव से बचने का दबाव अंदरखाने बहुत ज्यादा है।बहरहाल, अभी मौजूदा तल्खी को गठबंधन के टूटने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। यह सौदेबाजी का स्वाभाविक चरण है, जिसमें कांग्रेस ज्यादा सीटें और सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है, जबकि सपा अपनी बढ़त और संगठन की ताकत के बल पर बड़ा हिस्सा अपने पास रखना चाहती है।

आखिरी फैसला अंततः अखिलेश और राहुल के बीच सीधी बातचीत में ही होगा, और तब तक छोटे नेताओं के बयान दबाव के औजार बने रहेंगे।फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों दलों के नेताओं के बीच अगर बयानबाजी हद से आगे बढ़ी और कार्यकर्ताओं में कड़वाहट गहरी हो गई, तो शीर्ष नेतृत्व की समझदारी भी काम नहीं आएगी। गठबंधन की सफलता सीटों के आंकड़ों से ज्यादा इस पर निर्भर करेगी कि दोनों दल अपने-अपने अहं और मुस्लिम वोट की होड़ को कितना संभाल पाते हैं। संभावना यही है कि तमाम गरमी के बावजूद दोनों साथ ही चुनाव लड़ेंगे, पर उसकी कीमत क्या होगी, यह आने वाले कुछ महीने बताएंगे।

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