शिक्षा संस्थानों में नेतृत्व जरूरी, नौकरशाही दखल नहीं

एनटीए, एनसीईआरटी और सीबीएसई जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों को बेहतर कार्यप्रणाली और प्रभावी निर्णयों के लिए नौकरशाही नियंत्रण से अधिक शैक्षणिक नेतृत्व की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए विशेषज्ञता और अकादमिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देने पर जोर दिया जा रहा है।

डॉ.विजय गर्ग 
डॉ.विजय गर्ग 

भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक है। करोड़ों छात्रों का भविष्य उन संस्थाओं पर निर्भर करता है जो पाठ्यक्रम तैयार करती हैं, परीक्षाएं आयोजित करती हैं और शिक्षा की दिशा तय करती हैं। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए), राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) तथा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ऐसी ही प्रमुख संस्थाएं हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रश्न लगातार उठता रहा है कि क्या इन संस्थाओं का नेतृत्व शिक्षा विशेषज्ञों के हाथों में होना चाहिए या फिर नौकरशाही नियंत्रण के अधीन इन्हें चलाया जाना चाहिए?

शिक्षा केवल प्रशासनिक गतिविधि नहीं है। यह राष्ट्र निर्माण, ज्ञान सृजन और मानव संसाधन विकास की आधारशिला है। इसलिए शिक्षा से जुड़ी संस्थाओं का नेतृत्व ऐसे व्यक्तियों के हाथों में होना चाहिए जो शिक्षण, अनुसंधान, मूल्यांकन और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को गहराई से समझते हों। दुर्भाग्य से भारत में कई बार शिक्षा संस्थानों के संचालन में नौकरशाही का प्रभाव इतना अधिक हो जाता है कि शैक्षणिक दृष्टिकोण पीछे छूट जाता है।

एनटीए इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यह संस्था नीट, जेईई, सीयूईटी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं का आयोजन करती है। इन परीक्षाओं से लाखों विद्यार्थियों के सपने जुड़े होते हैं। हाल के वर्षों में परीक्षा प्रबंधन, परिणामों में विसंगतियों, तकनीकी समस्याओं और पेपर लीक जैसे विवादों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या केवल प्रशासनिक दक्षता ही पर्याप्त है? वास्तव में परीक्षा प्रणाली को समझने के लिए शैक्षणिक मूल्यांकन, मनोमिति (Psychometrics), छात्र मनोविज्ञान और निष्पक्ष परीक्षण पद्धतियों का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है। ऐसे में एनटीए को केवल एक प्रशासनिक एजेंसी के रूप में नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक संस्था के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।

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इसी प्रकार एनसीईआरटी देश के स्कूली पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों का निर्माण करती है। यह संस्था आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक सोच को आकार देती है। पाठ्यक्रम में क्या पढ़ाया जाए, किन विषयों को प्राथमिकता दी जाए, शिक्षा को अधिक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और समावेशी कैसे बनाया जाए—ये सभी निर्णय गहन शैक्षणिक विमर्श की मांग करते हैं। यदि ऐसे निर्णयों पर नौकरशाही दृष्टिकोण हावी हो जाए तो शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। पाठ्यक्रम निर्माण में शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, विषय विशेषज्ञों और अनुभवी शिक्षकों की भूमिका केंद्रीय होनी चाहिए।

सीबीएसई भी देश के हजारों विद्यालयों और लाखों विद्यार्थियों को प्रभावित करता है। मूल्यांकन प्रणाली, बोर्ड परीक्षाओं का स्वरूप, कौशल आधारित शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और छात्र कल्याण जैसे मुद्दे केवल फाइलों और आदेशों के माध्यम से नहीं समझे जा सकते। इनके लिए कक्षा-कक्ष की वास्तविकताओं को जानने वाले विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। शिक्षा में सुधार तभी संभव है जब निर्णय लेने वाले लोग स्वयं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े अनुभव रखते हों।

दुनिया के अनेक विकसित देशों में शिक्षा संस्थाओं की अगुवाई प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और शिक्षा नीति विशेषज्ञों द्वारा की जाती है। प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका सहयोग और प्रबंधन तक सीमित रहती है, जबकि शैक्षणिक निर्णय विशेषज्ञों द्वारा लिए जाते हैं। इससे संस्थाओं की विश्वसनीयता बढ़ती है और नीतियों में निरंतरता बनी रहती है।

भारत में भी यही मॉडल अपनाने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि नौकरशाहों की भूमिका समाप्त कर दी जाए। प्रशासनिक दक्षता किसी भी संस्था के लिए महत्वपूर्ण होती है। लेकिन शिक्षा से जुड़े मूल निर्णयों पर अंतिम अधिकार शैक्षणिक नेतृत्व का होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यवस्था चलाना नहीं, बल्कि सीखने की गुणवत्ता को बेहतर बनाना और विद्यार्थियों की क्षमता का विकास करना है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने नवाचार, अनुसंधान, आलोचनात्मक चिंतन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर बल दिया है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि एनटीए, एनसीईआरटी और सीबीएसई जैसी संस्थाओं में योग्य शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और शिक्षा विशेषज्ञों को नेतृत्व की भूमिका दी जाए। केवल प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम से शिक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त नहीं की जा सकती।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा संस्थाओं को अधिक शैक्षणिक स्वायत्तता प्रदान की जाए, नेतृत्व के पदों पर योग्य शिक्षा विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाए और निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी तथा शोध-आधारित बनाया जाए। यदि भारत को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनना है, तो उसकी शिक्षा व्यवस्था का नेतृत्व शिक्षाविदों के हाथों में होना चाहिए, न कि केवल नौकरशाही तंत्र के नियंत्रण में।

एनटीए, एनसीईआरटी और सीबीएसई जैसी संस्थाएं केवल प्रशासनिक निकाय नहीं हैं; वे देश के भविष्य का निर्माण करती हैं। इसलिए उन्हें शैक्षणिक नेतृत्व की आवश्यकता है, नौकरशाही नियंत्रण की नहीं।

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