जानें भस्मासुर से जुडी शिवखोड़ी का इतिहास एवं कहानी

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राजू यादव

पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में शिवखोड़ी का वर्णन मिलता है इस गुफ़ा को एक  गड़रिये ने खोजा था कहानियो के अनुसार यह गड़रिया अपनी खोई हुई बकरी खोजते हुए इस गुफ़ा तक पहुँच गया था वहा उसको जिज्ञासा हुई की आखिर गुफा के अंदर क्या है तो वह गुफ़ा के अंदर चला गया गुफा के अंदर उसने एक बड़ा सा शिवलिंग देखा धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान शंकर इस गुफ़ा में योग मुद्रा में बैठे हुए हैं गुफ़ा के अन्दर अन्य देवी-देवताओं की आकृतिया भी मौजूद हैं इस गुफा का आकार भी बड़ा विचित्र है गुफ़ा का आकार भगवान शंकर के डमरू जैसा दिखयी देता है जिस तरह से डमरू दोनों तरफ से बड़ा होता है और बीच में से छोटा होता है, उसी प्रकार गुफ़ा भी दोनों तरफ़ से बड़ी है और बीच में छोटी है गुफ़ा का मुहाना 100 मी. चौड़ा है लेकिन अंदर की ओर बढ़ने पर यह छोटा होता जाता है यह गुफ़ा भी अपने अन्दर काफ़ी सारे प्राकृतिक सौंदर्य दृश्यो को समेटे हुए है गुफ़ा के मुहाने पर शेषनाग की आकृति के दर्शन होते तो आपको संकीर्ण रास्ते से होकर ही गुफ़ा के मुख्य भाग तक पहुँचना होता हैं।

जब आप गुफा के मुख्य स्थान पर पहुचते है तो आपको भगवान शिव के 4 फीट ऊँचे शिवलिंग के दर्शन होते है और इसके ठीक ऊपर की ओर गाय के चार थन बने हुए हैं, जिन्हें कामधेनु के थन कहा जाता है और इन थानों में से निरंतर जल गिरता रहता है। यहाँ शिवलिंग के बायीं ओर माता पार्वती की आकृति दिखायी देती है माता पार्वती की आकृति भी ध्यान की मुद्रा में है यहाँ एक गौरी कुण्ड भी है जिसमे हमेशा पवित्र जल से भरा रहता है। शिवलिंग के बायीं ओर ही भगवान कार्तिकेय की आकृति भी साफ़ दिखाई देती है यह सब प्रतिमाये प्राक्रतिक रूप से बनी हुई है । कार्तिकेय की प्रतिमा के ऊपर भगवान गणेश की पंचमुखी आकृति दिखयी देती है।

इस गुफ़ा के संबंध में कई प्रकार से किस्से कथाएं प्रसिद्ध हैं। इन कहानियो में भस्मासुर से जुडी कहानी सबसे अधिक प्रचलित है। भस्मासुर एक भयंकर दैत्य  था एक बार उसने भगवान शंकर की घोर तपस्या की थी और भोलेनाथ शिव भस्मासुर से प्रसन्‍न हुए और प्रसन्न  होकर भगवान शिव ने उसे वरदान दे दिया कि वो जिस भी व्यक्ति के सिर पर हाथ रख देगा  वह तुरंत ही भस्‍म हो जाएगा अब ऐसा वरदान पाकर भस्मासुर  ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करने लगा उसका अत्याचार इतना बढ़ गया था कि देवतागन भी उससे डरने लगे थे और तब देवता उसे मारने का उपाय ढूँढ़ने लगे एक दिन नारद मुनि ने भस्मासुर को देवी पार्वती का अपहरण करने के लिए प्रेरित किया नारद मुनि ने भस्मासुर से कहा, वह तो अति बलवान है और  इसलिए उसके पास तो पार्वती जैसी सुन्दरी होनी ही चाहिए, जो कि अति सुन्दर है। भस्मासुर के मन में पार्वती को पाने की इच्छा प्रबल हो गयी और वह इसी नीयत से भगवान शंकर के पीछे भागने लगा जब भगवन शिव ने देखा की भास्म्सुर उन्हें ही भस्म करने आ रहा तो वह पार्वती और नंदी को साथ में लेकर कैलाश से भागे और फिर यहाँ शिवखोड़ी के पास आकर रूक गए यहाँ भस्मासुर और भगवान शिव के बीच में भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया कहते है यहाँ पर युद्ध होने के कारण ही इस स्थान का नाम रनसू पड़ा ।

शिवखोड़ी भगवान शिव के प्रमुख पूज्यनीय स्थलों में से एक है यह गुफ़ा जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले’ में स्थित है इस गुफा को बेहद पवित्र माना जाता है और  यह पवित्र गुफ़ा लगभग 150 मीटर लंबी है जब आप शिवखोड़ी गुफ़ा में प्रवेश करेंगे तो यहाँ आपको भगवान भोलेनाथ शिव के 4 फीट ऊंचे शिवलिंग के दर्शन होंगे इस स्थान का चमत्कार यह है की  यहाँ इस शिवलिंग के ऊपर एक पवित्र जल की धारा हर समय प्राकृतिक रूप से गिरती रहती है यह जल कहा से आता है कैसे आता है कोई नहीं जानता यह गुफा भी पूरी तरह से प्राकृतिक ही बनी हुई है इस गुफ़ा के अंदर अनेक देवी -देवताओं की मनमोहक आकृतियां भी आपको देखने को मिलेगी और आपको इन आकृतियों को देखने का दिव्य आनन्द प्राप्त होगा मान्यताओ के अनुसार शिवखोड़ी गुफ़ा को हिंदू देवी-देवताओं का घर के रूप में भी जाना जाता है पहाड़ी क्षेत्र में गुफ़ा को ‘खोड़ी’ कहा जाता है और इस प्रकार पहाड़ी भाषा में ‘शिवखोड़ी’ का अर्थ होता है- भगवान शिव की गुफ़ा।

रन का अर्थ होता है ‘युद्ध’ और सू का अर्थ है ‘भूमि’ तो इसी कारण इस स्थान को ‘रनसू’ कहा जाता है।

रनसू शिवखोड़ी यात्रा का बेस कैम्प है अब शिवजी के सामने यह एक बड़ी समस्या हो गयी कि अपने ही दिए हुए वरदान के कारण वह भस्मासुर को मार नहीं सकते थे नहीं तो भस्मासुर को मारना पल भर का काम था तब भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से शिवखोड़ी का निमार्ण किया शंकर भगवान ने माता पार्वती के साथ गुफ़ा में प्रवेश किया और यहाँ योग साधना में बैठ गये और फिर भगवान विष्णु पार्वती का रूप धारण करके वहा आये और भस्मासुर के साथ नृत्य करने लगे भस्मासुर भी वही स्टेप दोहराने लगा तो भगवान विष्णु कर रहे थे अचानक नृत्य के दौरान भगवान विष्णु ने अपने ही सिर पर हाथ रखा ठीक उसी प्रकार भस्मासुर ने भी अपने सिर पर अपना हाथ रख दिया और शिव के अचूक वरदान के कारण वह खुद ही तुरंत भस्म हो गया तब भगवान विष्णु ने कामधेनु की मदद से गुफा में प्रवेश किया फिर सभी देवी-देवताओं ने वही पर भगवान शिव भोले की अराधना की और तब भगवान शंकर ने कहा कि आज से यह स्थान ‘शिवखोड़ी’ के नाम से जाना जायेगा और कलयुग में जो भी मेरे दर्शन करेगा उसकी समस्त मनोकामनाए पूर्ण होगी।

शिव-खोड़ी में पवित्र गुफा के अंदर शिवलिंग हैं जिसपर हमेशा जल की धरा स्वम गिरती रहती है। शिवखोड़ी के पीछे मान्यता है इस गुफा का अमरनाथ गुफा से ही संबंधित होना। कहा गया है कि गुफा का दूसरा छोर बाबा अमरनाथ जी की गुफा में जाकर ही खुलता है। लेकिन यह कितना सच है इसका पता लगाने के लिए इसके भीतर कोई नहीं जाता।

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