सच बोलना बहुत मुश्किल है….

डॉ0 अम्बरीष राय

इस दौरे में सच बोलना बहुत मुश्किल है. उससे मुश्किल है उन लोगों का सच बोल पाना, सच लिख पाना जिनके हिस्से में स्याही अपने ख़ात्मे की तरफ है. लेकिन वो अपने हौसलों की स्याही से इस सियाह सत्ता का बेशर्म चेहरा दिखाने में लगे हुए हैं. सत्ता से उपकृत कलमों ने भांड़गिरी का एक नया ही कोलाज़ बना डाला है. जिसके सारे रंग झूठे हैं, जिससे बेईमानी की बदबू आती है. और ये बदबूदार लोग खुश्बुओं को घेरना चाहते हैं. अपने आका को अपनी सिंडिकेट की ताक़त की नुमाईश करना चाहते हैं. लेकिन अंधेरों की निज़ामत बस उतनी दूर तक है, जितनी दूर तक कोई चराग़ नहीं जला. नेहा सिंह राठौर नाम का एक चराग़ जला, निज़ाम सुलग गया और भांड़, मिरासी अपने काम पर लग गए.

नेहा सिंह राठौर एक लोक गायिका. एक विद्रोही. एक घरेलू लड़की. नारी अस्मिता का एक निर्दोष चेहरा. भोजपुरी टच और टोन की इस लड़की ने दो चार लाईनें लिखकर क्या पढ़ लीं, सिंहासन हिल गया और चरणों में पड़े चरणसेवक और उनके चरण सेवक और उनके चरण सेवक, उस लड़की से लड़ने चल पड़े जो एक आम सी लड़की है, जो ख़ास होने का भरम नहीं रखती लेकिन दरअसल बहुत ख़ास है. इतनी ख़ास कि उसे मेकअप नहीं करना पड़ता, मेकओवर की उसको ज़रूरत नहीं है लेकिन सबका मेकअप उसकी नैसर्गिक प्रतिभा के सामने दम तोड़ जाता है. मेकओवर तो पनाह ही मांग जाता है. नेहा लता मंगेशकर नहीं है. शारदा सिन्हा भी नहीं है. हिन्दी गानों की बात करें तो लता जी लीजेंड हैं तो शारदा सिन्हा जी भोजपुरी का अभिमान. इन दोनों का ज़िक्र उनकी प्रसिद्धि के लिए करना पड़ा, लिहाज़ा कर रहा हूं. लेकिन ये दोनों बड़े चेहरे अपने गानों में किसी के लिए लड़ते नहीं दिखे. किसी सामाजिक, राजनीतिक संघर्ष के चेहरे नहीं रहे. नेहा अपनी रचना में, अपने गीतों में, अपने बोलों में विसंगतियों से लड़ती है. और वो भी हंसते मुस्कुराते. ना कोई बोझ ना कोई तनाव.

मैं उर्दू की बात करूं. मैं शेरो शायरी की बात करूं तो एक से एक नामवर चेहरे एक दूसरे पर भारी दिखते हैं. उर्दू के बड़े चेहरे इश्क़, हुस्न की तंग गलियों से नहीं निकल पाए लेकिन एक मुक़ाम जरूर हासिल किया. लेकिन दुष्यंत कुमार एक अलग ही लाइन खींच गए. ग़ज़ल को आम आदमी के दर्द तक ले जाने में दुष्यंत कुमार ने जो रंग बिखेरे, वैसा फिर दूसरा देखने को नहीं मिलता. भले ही गज़ल कहने वाले उनमें अदब और काफ़िये की तमाम कमियां निकालते रहे. मैं नेहा को दुष्यंत कुमार की परंपरा का ध्वजावाही मानता हूं. लिखना पढ़ना बोलना समाज के काम ना आए तो वो बस व्यक्तिगत होता है.

नेहा सिंह राठौर ने ‘यूपी में का बा’ एक गाना लिखा और गाया. रामराज्य के हाथरस में दलित बिटिया के साथ बलात्कार और हत्या पर नेहा सवालिया हुई तो बेरोज़गारों का सवाल भी नहीं छोड़ा. गंगा में बहती लाशों को कुत्ते बिल्ली से नोंचने का सवाल उठाया तो मंदिर के बरक्स ज़रूरत का सवाल उठाया. केन्द्रीय मंत्री के बेटे के द्वारा किसानों को कुचलने का मुद्दा उठाया, चौकीदार कहते नहीं अघाते साहेब को जिम्मेदारी पर घेरती नेहा के इस गाने ने मानो उत्तर प्रदेश को बिलबिला दिया. सत्ता के सारे सांप अपने बिलों से बाहर आ गए. क्या अच्छे क्या बुरे सारे तुकबंदियों के रथी, महारथी, सस्ते, महंगे ट्रोलर सारे सत्ता की चापलूसी में शब्दों के तीर कमान लेकर आ गए. कवियों, कवियित्रियों में होड़ लग गई सत्ता के सामने अपने आपको ज्यादा बड़ा चरण सेवक साबित करने की. सत्ता उपकृत लेखक कुतर्कों का संजाल रचने लगे तो कुछ पतित अपनी अश्लील टिप्पणियों के साथ अपने पारिवारिक मूल्यों को सार्वजनिक करते सतही दिखते रहे. कुछेक ऐसे कवियों को भी मैंने नेहा के बारे में अपमानजनक तुकबंदी करते देखा, जिनके लिए मेरे मन में आदर था.

ख़ैर जो हो रहा है, वो मुखौटे हटा रहा है. मुझको भी चेहरे पढ़ने में आसानी हो रही है. हिन्दी और भोजपुरी पट्टी के नामवर लोग नेहा सिंह राठौर को टार्गेट करके लिख रहे हैं, यही नेहा की जीत है. अगले घर की लड़की (गर्ल नेक्स्ट डोर) की छवि रखने वाली नेहा आज एक मजबूत क़िरदार बनकर खड़ी हो गई है. और उसके खड़े होने से सत्ता प्रतिष्ठान बैठा जा रहा है. दरअसल नेहा के सवाल मेरे सवाल हैं, जो मैं अरसे से पूछ रहा हूं. नेहा तुम ऐसे ही रहना, ऐसे ही लिखना, ऐसे ही पढ़ना, ऐसे ही गाना. चाटुकारों की लंबी फ़ौज का हासिल, लाज़िम है हम देखेंगे.

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