
2024 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद समाजवादी पार्टी के सामने अब 2027 के विधानसभा चुनाव की बड़ी चुनौती है। 2024 में मिली राजनीतिक बढ़त को बनाए रखना, संगठन को मजबूत करना और अपने सामाजिक आधार को एकजुट रखना सपा के लिए अहम सवाल बन गया है। ऐसे में नजर इस बात पर है कि पार्टी 2027 की जंग से पहले अपनी रणनीति कैसे तैयार करती है और बदले सियासी समीकरणों के बीच अपनी ताकत को किस तरह कायम रखती है।
लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला था, जहाँ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन (इंडिया ब्लॉक) ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए को जोरदार झटका दिया था। 2014 से चल रहे मोदी के जादू को सपा ने 2024 में प्रदेश में लगभग धराशायी कर दिया था। राज्य की कुल 80 लोकसभा सीटों में से इस विपक्षी गठबंधन ने मिलकर कुल 43 सीटें हासिल कीं। इस शानदार प्रदर्शन ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। हालांकि प्रदेश की राजनीति और योगी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में सपा की स्थिति बेहद मजबूत हो गई। भाजपा करीब ढाई सौ पर सिमट गई।
भाजपा गठबंधन वाले एनडीए को मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए जेडीयू के साथ टीडीपी की बैसाखी का सहारा लेना पड़ गया। यह और बात रही कि मोदी सरकार के तेवरों में कोई कमी नहीं आई। उसने विपक्ष के हो-हल्ले के बावजूद कई अहम फैसले लिए। इसका प्रभाव यूपी में भी दिखाई दिया, लेकिन इसके उलट समाजवादी पार्टी के सांसद अपनी लोकप्रियता खोते गए। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक में समाजवादी पार्टी सत्ता से दूर रही तो इसका खामियाजा उसे जनता की नाराजगी के रूप में भुगतना पड़ा। सपा के सांसदों और विधायकों पर काम नहीं करने का ठप्पा लग गया, जिसका खामियाजा पार्टी को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
दरअसल, चुनाव जीतने के बाद जिस तरह की सक्रियता किसी जनप्रतिनिधि से अपेक्षित होती है, वह सपा के अधिकांश सांसदों में नदारद दिखी। संसद सत्रों में मौजूदगी से लेकर अपने संसदीय क्षेत्र में विकास कार्यों की पैरवी तक, कई मोर्चों पर सपा सांसदों का प्रदर्शन कमजोर रहा। जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती गई कि जीत के बाद ये नेता दिल्ली और लखनऊ की सियासी उठापटक में उलझकर अपने मतदाताओं से दूर हो गए। सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी समस्याओं पर स्थानीय स्तर पर आवाज उठाने में सांसदों की निष्क्रियता ने उस जनादेश को कमजोर करना शुरू कर दिया, जो कभी मोदी लहर के खिलाफ एक मजबूत संदेश माना गया था।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम पहलू यह है कि जिस पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे अखिलेश यादव ने 2024 में भाजपा को झटका दिया था, वह गठजोड़ अब दरकता हुआ नजर आ रहा है। कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर यह शिकायत आम हो चुकी है कि टिकट बंटवारे और संगठन में जिस समावेशी भागीदारी का वादा किया गया था, वह चुनाव जीतने के बाद व्यवहार में उतनी दिखाई नहीं दी। गैर-यादव पिछड़ी जातियों और कुछ दलित समूहों के बीच यह भावना घर करती जा रही है कि सत्ता और संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर अब भी परंपरागत नेतृत्व ही हावी है। यह असंतोष अगर संगठित रूप ले लेता है, तो 2027 में सपा के लिए यह भारी पड़ सकता है, क्योंकि यही सामाजिक समीकरण उसकी जीत का आधार बने थे।
इन सबके बीच सबसे बड़ी परीक्षा खुद अखिलेश यादव की है। 2027 के विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी उनका दीर्घकालिक लक्ष्य रहा है, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि यह राह आसान नहीं होगी। उन्हें न सिर्फ अपने सांसदों और विधायकों की निष्क्रियता पर लगाम लगानी होगी, बल्कि संगठन को जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय करना होगा। जबकि उनके पास समय काफी कम बचा है। अखिलेश को जनता के बीच यह भरोसा फिर से कायम करना होगा कि सपा केवल चुनाव जीतने के लिए वादे नहीं करती, बल्कि सत्ता में आने के बाद भी जनता के साथ खड़ी रहती है। इसके लिए पार्टी को अपने सांसदों की जवाबदेही तय करनी होगी, संगठन में नई ऊर्जा भरनी होगी और पीडीए फॉर्मूले को केवल नारे तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना होगा। यदि पिछले-दलित पर कोई मुसलमान अत्याचार करे, तो उन्हें इसके खिलाफ भी आवाज उठाने से गुरेज नहीं करना चाहिए, जबकि जमीनी स्तर पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है।
हालांकि, अभी विधानसभा चुनाव में छहः माह का समय शेष है, और भारतीय राजनीति में आखिरी के छहः महीनों को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान कई मुद्दे उभरते, कई समीकरण बदल सकते हैं। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएँ और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे अगर विपक्ष प्रभावी ढंग से उठा पाए, तो जनता का रुख फिर बदल सकता है। दूसरी ओर, भाजपा के सामने भी अपनी सरकार के खिलाफ बनी सत्ता विरोधी भावना (एंटी इनकंबेंसी) से निपटने की चुनौती होगी, खासकर उन इलाकों में जहाँ विकास कार्य अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुए हैं। अखिलेश को इसको भुनाने के पूरे प्रयास करने होंगे।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत को यदि सपा 2027 के विधानसभा चुनाव तक बरकरार रखना चाहती है, तो उसे आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर ठोस जमीनी रणनीति पर काम करना होगा। महज गठबंधन के सहारे या पुराने समीकरणों पर भरोसा करके सत्ता तक पहुँचना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। जनता की नाराजगी को समय रहते पहचानना और उसका समाधान निकालना ही अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के लिए आगे की राह तय करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सपा अपनी संगठनात्मक कमजोरियों को दूर कर पाएगी, या फिर योगी सरकार का सुव्यवस्थित प्रशासनिक और सियासी प्रबंधन एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी भाजपा के हाथों में सौंप देगा। आने वाले महीनों में होने वाली राजनीतिक हलचलें, संभावित उपचुनाव और दोनों पक्षों की रणनीतिक चालें ही यह तय करेंगी कि 2024 का जनादेश 2027 में दोहराया जा सकेगा या नहीं।
बहरहाल, यदि 2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन की कुल 43 सीटों के आँकड़े को अलग-अलग दलों के हिसाब से देखा जाए, तो इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी समाजवादी पार्टी की रही। समाजवादी पार्टी ने अपने दम पर शानदार प्रदर्शन करते हुए 37 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की, जो उत्तर प्रदेश में किसी भी एक दल द्वारा सबसे अधिक जीती गई सीटें थीं। इसके अलावा, कांग्रेस पार्टी ने भी बेहतर वापसी करते हुए गठबंधन के तहत चुनाव लड़ते हुए 6 सीटें अपने नाम कीं। इस तरह से 37 और 6 का यह आँकड़ा मिलकर कुल 43 सीटों पर इस गठबंधन की विजय को सुनिश्चित करता है।
लोकसभा सीटों के अंतर्गत आने वाली विधानसभा क्षेत्रों की संख्या का यदि विश्लेषण किया जाए, तो प्रत्येक सामान्य लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत औसतन 5 विधानसभा सीटें आती हैं। इस प्रकार, गठबंधन द्वारा जीती गई कुल 43 लोकसभा सीटों के अंतर्गत उत्तर प्रदेश की कुल 215 विधानसभा सीटें आती हैं। यह संख्या राज्य की कुल 403 विधानसभा सीटों का लगभग आधा हिस्सा है, जो यह दर्शाता है कि लोकसभा चुनाव के दौरान जनता के इस जनादेश का प्रभाव राज्य की विधानसभा वार क्षेत्रों पर किस व्यापक स्तर पर था, लेकिन पिछले दो साल में काफी कुछ बदल चुका। सपा सांसद ठीक से काम नहीं कर पाए तो उनके संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 215 विधानसभा सीटों के वोटर भी गुस्से और नाराजगी में हैं। वोटरों की यही नाराजगी सपा का खेल बिगाड़ सकती है। अगर ऐसा हुआ तो अखिलेश के सत्ता में वापसी के सपनों पर पानी फिर सकता है।
दूसरी तरफ, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने लोकसभा चुनाव के झटके के बाद अपनी रणनीति में स्पष्ट बदलाव किया। कानून-व्यवस्था को लेकर सख्ती, बुनियादी ढाँचे के विकास पर जोर, और सामाजिक कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाकर सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि लोकसभा में मिली हार के बावजूद राज्य में उसकी पकड़ कमजोर नहीं पड़ी है। महाकुंभ जैसे आयोजनों का सफल प्रबंधन, और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के जरिये सामाजिक ध्रुवीकरण को बनाए रखने की कोशिशों ने भी भाजपा के जनाधार को फिर से मजबूत करने में भूमिका निभाई। इसके साथ ही महिलाओं, किसानों और गरीब वर्ग के लिए चलाई जा रही योजनाओं ने भी सरकार विरोधी लहर को थामने में मदद की। इन प्रयासों का सीधा असर विधानसभा उपचुनावों के नतीजों में भी देखने को मिला, जहाँ भाजपा ने कई सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि लोकसभा का जनादेश एक अस्थायी घटना थी, स्थायी बदलाव नहीं।



