स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य मरीज को राहत देना है, लेकिन आज कई परिवारों के लिए बीमारी सिर्फ शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक संकट का कारण भी बन रही है। अस्पतालों में इलाज के दौरान दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और जरूरी सामग्री की खरीद को लेकर अक्सर मरीज और परिजन खुद को विकल्पहीन महसूस करते हैं। सरकारी योजनाओं और बीमा सुविधाओं के बावजूद मध्यमवर्ग का बड़ा हिस्सा इलाज के खर्चों का बोझ चुपचाप उठाने को मजबूर है। सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और मरीज की पसंद के अधिकार को पर्याप्त महत्व मिल रहा है, या फिर इलाज की प्रक्रिया ऐसे ढांचे में बदलती जा रही है जहां बीमारी शरीर की होती है, लेकिन सबसे बड़ी चोट जेब पर पड़ती है। यह मुद्दा केवल खर्च का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही, न्याय और मरीज के अधिकारों का भी है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
अस्पताल के दरवाजे तक आदमी बीमारी लेकर पहुंचता है, लेकिन लौटते समय अक्सर भारी बिल का बोझ साथ होता है। हैरानी यह कि इलाज का सबसे महंगा हिस्सा हमेशा दवा या ऑपरेशन नहीं होता; कई बार कुछ रुपये की मामूली प्लास्टिक ट्यूब ही जेब पर सबसे बड़ा वार कर जाती है। महाराष्ट्र एफडीए आयुक्त तुकाराम मुंडे की सर्वे रिपोर्ट ने मेडिकल उपभोग्य सामग्रियों पर भारी मार्कअप की यही चुभती हकीकत सामने रखी है। 11.05 रुपये का आईवी सेट 325 रुपये (2,841 प्रतिशत मार्कअप), 6.75 रुपये की सिरिंज 57.20 रुपये और 29.41 रुपये का कैथेटर 310 रुपये में मरीज तक पहुंच सकता है। यानी बीमारी का इलाज विज्ञान करता है, लेकिन बिल का हिसाब ऐसा है कि मरीज को हर कदम पर अपनी जेब का इलाज करना पड़ता है।
2,841 प्रतिशत का मार्कअप यानी खरीद कीमत का लगभग 29 गुना—मामूली आंकड़ा नहीं। 11.05 रुपये का आईवी सेट 325 रुपये में मरीज के बिल तक पहुंच सकता है, तो सवाल है कि कीमत इतनी क्यों बढ़ी? अस्पताल के अपने खर्च हैं—स्टाफ, मशीनें, बिजली-पानी और दूसरी व्यवस्थाएं। यह उचित है। लेकिन अस्पताल कोई धर्मशाला नहीं, तो मरीज भी बीमारी के नाम पर पैसा उगलने वाला एटीएम नहीं। दस-बीस प्रतिशत के सामान्य व्यापारिक मार्जिन और हजारों प्रतिशत के अंतर को एक तराजू में नहीं तौला जा सकता। 11.05 रुपये की वस्तु 325 रुपये में पहुंचे, तो सवाल सिर्फ मुनाफे का नहीं, पारदर्शिता का है। इलाज में कीमत का सच छिपेगा, तो भरोसा भी धीरे-धीरे भय में बदल जाएगा।
बाजार में ग्राहक के पास मोलभाव और विकल्प होते हैं; अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा मरीज इनसे लगभग वंचित होता है। दुकान पर महंगी चीज छोड़कर दूसरी दुकान जा सकते हैं, लेकिन अस्पताल में बीमारी की तात्कालिकता, डॉक्टर की सलाह और परिवार की चिंता विकल्प सीमित कर देती है। वह चाहकर भी नहीं कह सकता—“सिरिंज महंगी है, दूसरी जगह से ले आता हूं।” उस क्षण वह ग्राहक नहीं, अपनी मजबूरी के हवाले मरीज होता है। इसलिए मेडिकल आइटम की मनमानी कीमत केवल पैसे नहीं, अधिकार का सवाल है। मरीज को पता होना चाहिए कि वस्तु कितने में खरीदी गई, उसकी निर्धारित कीमत क्या है और उससे कितनी रकम ली जा रही है। इलाज में पारदर्शिता सुविधा नहीं, मरीज का अधिकार है।
मरीज के हाथ में पहुंचा बिल कहानी का आखिरी पन्ना है; कीमत का खेल उससे बहुत पहले शुरू होता है। तुकाराम मुंडे की रिपोर्ट इसी परत को खोलती है। निर्माता से वितरक और आपूर्ति श्रृंखला के अलग-अलग पड़ावों तक कीमत बढ़ती है। मुंडे के अनुसार, एमआरपी अक्सर अस्पताल पहुंचने से पहले ही तय हो चुका होता है, जिसका अंतिम बोझ मरीज के बिल पर पड़ता है। दवाओं की कीमतों पर नियमन है, लेकिन अधिकांश मेडिकल उपभोग्य सामग्रियां लंबे समय तक ऐसी कठोर निगरानी से बाहर रहीं। नतीजा यह कि इलाज की जरूरी मामूली वस्तु भी कीमतों की ऐसी भूलभुलैया में पहुंच गई, जिसका रास्ता मरीज को दिखाई नहीं देता। अब उद्योग संगठन भी उचित मूल्य और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। यानी सवाल किसी एक अस्पताल का नहीं, पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है।
बीमारी घर में आती है तो सबसे पहले बजट टूटता है। मध्यमवर्ग सबसे अधिक पिसता है—न पूरी सरकारी मदद मिलती है, न निजी इलाज का भारी खर्च आसानी से उठता है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने इलाज की पहुंच बढ़ाई है, फिर भी निजी अस्पतालों में मेडिकल उपभोग्य सामग्रियों का खर्च बड़ा सवाल है। कई बार दवाओं से ज्यादा बिल उन छोटी चीजों का बनता है, जिन्हें मरीज बाजार में सस्ता समझता है। फिर परिवार सोचता है—कहां से उधार लें, क्या गिरवी रखें, कौन-सा खर्च रोकें। बीमारी मरीज को बिस्तर पर लिटाती है, भारी बिल पूरे परिवार की कमर तोड़ देता है। इसे सिर्फ व्यापार कहना इस पीड़ा को छोटा करना है।
मरीज को इलाज चाहिए, सिफारिशों की फाइल नहीं। सरकार नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी और संबंधित विभाग को सिफारिश भेज चुकी है, लेकिन जरूरत अब कागज से आगे बढ़ने की है। जरूरी मेडिकल उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों की कीमतों पर नियंत्रण हो, व्यापारिक मार्जिन की तार्किक सीमा तय हो और बिल में खरीद मूल्य व मरीज से वसूली गई रकम साफ लिखी जाए। मरीज को अपने इलाज का हिसाब समझने के लिए अर्थशास्त्र पढ़ने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उसे बस पता हो कि वस्तु कितने में आई और उससे कितने लिए गए। स्वास्थ्य सेवा में पारदर्शिता कोई सुविधा नहीं, भरोसे की पहली शर्त है।
यह समस्या महाराष्ट्र की सीमा पर खड़ी कोई अकेली दीवार नहीं है। निजी स्वास्थ्य व्यवस्था में अस्पताल का बिल, इलाज की कीमत और बीमा खर्च एक-दूसरे से जुड़े हैं। आज बढ़ा इलाज खर्च कल बीमा प्रीमियम के रूप में आम आदमी की जेब पर लौट सकता है। सवाल सीधा है—स्वास्थ्य सेवा का मकसद मरीज को स्वस्थ करना है या उसकी मजबूरी से कमाई करना? अस्पतालों को खर्च निकालने और उचित लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन मुनाफे की भी सीमा और मर्यादा होती है। जिस मरीज के पास बीमारी के समय सौदेबाजी का विकल्प नहीं, उसकी मजबूरी कमाई का आधार बन जाए तो स्वास्थ्य सेवा का भरोसा ही कटघरे में खड़ा हो जाता है।
अस्पताल में इलाज के साथ भरोसा भी दांव पर होता है। 11.05 रुपये का आईवी सेट 325 रुपये में बिकना इसी भरोसे पर सवाल है। बीमारी में परिवार डॉक्टर, अस्पताल और व्यवस्था पर विश्वास करता है कि उसकी मजबूरी समझी जाएगी, उसका फायदा नहीं उठाया जाएगा। लेकिन मामूली मेडिकल वस्तु पर हजारों प्रतिशत का अंतर सामने आए तो चोट जेब और विश्वास, दोनों पर पड़ती है। इस मूल्य-अंधेरे को दूर करना सरकार, नियामक संस्थाओं, निर्माताओं, वितरकों और अस्पतालों—सभी की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य सेवा की पहचान महंगी मशीनों से नहीं, पारदर्शिता और ईमानदारी से होनी चाहिए। वरना सवाल रहेगा—बीमारी शरीर की थी, फिर इलाज के साथ मेरी जेब को सजा क्यों मिली?



