कांग्रेस-सपा के बीच सीट बंटवारे से पहले खिंची तलवारें

संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की चुनावी जमीन पर 2027 की फसल अभी तैयार नहीं हुई है, लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच हिस्सेदारी को लेकर काट-छांट शुरू हो गई है। ऊपर से दोनों दल साथ दिखाई देना चाहते हैं, नीचे कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि गठबंधन में किसकी जमीन कितनी और किसकी कीमत कितनी। यही वह सवाल है जिसने सीट बंटवारे को महज चुनावी समझौते के बजाय दोनों दलों की राजनीतिक हैसियत की लड़ाई बना दिया है।सितंबर के आखिरी सप्ताह में जिस तरह इमरान मसूद, इकरा हसन, अजय राय और दूसरे नेताओं के बयान सामने आए, उससे यह साफ है कि असली बेचैनी सीटों की संख्या से पहले नेतृत्व और प्रभाव क्षेत्र को लेकर है। इमरान मसूद लगातार जल्द सीट बंटवारा तय करने की मांग कर रहे हैं और कह रहे हैं कि देरी का नुकसान जमीन पर हो रहा है। इकरा हसन ने जवाब में सपा को उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ बड़ी ताकत बताया और कांग्रेस के अकेले लड़ने की स्थिति पर सवाल उठाए। अजय राय ने इसे इकरा की निजी राय बताया। यानी गठबंधन बना रहने की बात अपनी जगह है, लेकिन गठबंधन के भीतर राजनीतिक वर्चस्व की बहस खुलकर बाहर आ चुकी है।

अखिलेश यादव ने इस बयानबाजी को रणनीति का हिस्सा बताया है। रायबरेली में उनकी पीडीए यात्रा और उसके जवाब में कांग्रेस की ओर से इटावा, कन्नौज और सैफई में कार्यक्रम की बात भी इसी राजनीतिक रस्साकशी का विस्तार है। सहयोगी दल यदि एक-दूसरे के प्रभाव क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन करने लगें तो संदेश केवल मंच तक नहीं रहता, वह सीट बंटवारे की मेज तक पहुंचता है।कांग्रेस की मुश्किल यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव ने उसे उत्तर प्रदेश में अपनी वापसी का आधार दिया है, लेकिन विधानसभा के आंकड़े उसकी स्थिति को अलग कहानी में रखते हैं। 2024 में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं। दोनों की संयुक्त संख्या 43 रही, जबकि भाजपा 33 पर रही। सपा का मत प्रतिशत करीब 33.59 और कांग्रेस का 9.46 प्रतिशत था। पांच साल पहले 2019 में सपा के पास पांच और कांग्रेस के पास केवल एक लोकसभा सीट थी। यानी 2024 ने विपक्षी गठबंधन को नई राजनीतिक जमीन दी। लेकिन इस सफलता को विधानसभा सीटों में सीधे बदलना संभव नहीं है।

क्योंकि विधानसभा का गणित कहीं अधिक स्थानीय है। 2022 में भाजपा ने 255 सीटें जीतीं और उसका मत प्रतिशत 41.29 रहा। सपा 111 सीटों और 32.06 प्रतिशत मत के साथ मुख्य विपक्षी दल बनी। कांग्रेस केवल दो सीटों तक रह गई। यह आंकड़ा कांग्रेस की मौजूदा चुनौती को साफ करता है। लोकसभा में छह सीटें जीतना राजनीतिक पुनरुत्थान का संकेत हो सकता है, लेकिन 403 विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव साबित करने के लिए केवल लोकसभा का आंकड़ा पर्याप्त नहीं होगा।यही कारण है कि यदि कांग्रेस 125 से अधिक सीटों पर अपना दावा रखती है तो सपा के लिए उसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी कम सीटों पर समझौता करना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा। वह उत्तर प्रदेश में लंबे समय बाद संगठन को अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में बहुत कम सीटें उसे फिर उसी स्थिति में धकेल सकती हैं जहां वह बड़े सहयोगी की छाया में दिखाई दे। इसलिए कांग्रेस की लड़ाई केवल सीटों की नहीं, अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान की भी है।

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सपा की स्थिति भी कम पेचीदा नहीं है। 2024 में 37 लोकसभा सीटें जीतने के बाद पार्टी के पास अपने दावे का मजबूत आधार है। अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति के तहत पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश चल रही है। ऐसे में सपा यह क्यों चाहेगी कि जिन सीटों पर उसका संगठन वर्षों से काम कर रहा है, वहां कांग्रेस को केवल लोकसभा के प्रदर्शन के आधार पर प्राथमिकता मिल जाए? यही सवाल सपा के भीतर भी उठना स्वाभाविक है।2017 का इतिहास दोनों दलों को बार-बार आईना दिखाता है। उस चुनाव में सपा 311 सीटों पर लड़ी और 47 जीत सकी। कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा और सात सीटें जीतीं। भाजपा ने 312 सीटें जीतकर सरकार बनाई। उसका मत प्रतिशत 39.67 था, जबकि सपा को 21.82 और कांग्रेस को 6.25 प्रतिशत मत मिले। गठबंधन के बावजूद कई सीटों पर प्रत्याशी चयन और संगठनात्मक तालमेल की समस्या रही। यानी ऊपर समझौता था, लेकिन नीचे चुनावी मशीनरी पूरी तरह एक नहीं हो पाई। यही वह गलती है जिसे 2027 में दोहराने की सबसे बड़ी कीमत दोनों दलों को चुकानी पड़ सकती है।

2024 ने इसका दूसरा मॉडल दिखाया। सीटों का समझौता अपेक्षाकृत स्पष्ट रहा, दोनों दलों ने साझा प्रचार किया और कार्यकर्ताओं को एक-दूसरे के उम्मीदवार के पक्ष में काम करने का संदेश दिया। परिणाम में दोनों दलों की संयुक्त 43 लोकसभा सीटें सामने आईं। मगर विधानसभा चुनाव में यही तालमेल तभी काम करेगा जब उम्मीदवारों और बूथ स्तर के संगठन के बीच भी वैसा ही समन्वय बने। वरना मंच पर साथ और मतदान केंद्र पर अलग-अलग राजनीति का पुराना संकट लौट सकता है।मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस की सक्रियता इस समीकरण को और संवेदनशील बना रही है। सहारनपुर से इमरान मसूद की जीत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार दिया है। दूसरी ओर सपा भी मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपने पारंपरिक प्रभाव को बनाए रखना चाहती है। ऐसे में दोनों दल यदि एक ही सामाजिक आधार पर अपने प्रभाव का विस्तार करने लगेंगे तो सीटों का समझौता और कठिन होगा। गठबंधन का गणित तभी आसान होता है जब सहयोगी दल अपने-अपने आधार जोड़ें; मुश्किल तब बढ़ती है जब दोनों एक ही आधार पर हिस्सेदारी मांगने लगें।

30 सितंबर की दिल्ली बैठक में अखिलेश यादव का शामिल न होना इसी पूरे घटनाक्रम के बीच चर्चा में है, लेकिन इसे गठबंधन टूटने का प्रमाण मानना अभी उचित नहीं होगा। उन्होंने अपनी अनुपस्थिति का कारण बताया है और वरिष्ठ नेता को बैठक में भेजने की बात कही है। इसलिए असली संकेत बैठक से नहीं, सीट बंटवारे की बातचीत से मिलेगा। अब दोनों दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि 403 सीटों को राजनीतिक प्रतिष्ठा का मैदान बनाया जाएगा या चुनावी क्षमता का। किस सीट पर कौन मजबूत है, कहां संगठन सक्रिय है, किस उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ है और किस दल के वोट दूसरी पार्टी के प्रत्याशी को वास्तव में मिल सकते हैं सीटों का बंटवारा इन्हीं सवालों से तय होना चाहिए। केवल पिछले चुनाव की जीती सीटों की गिनती से यह काम नहीं होगा।आखिरकार 2017 ने चेताया कि गठबंधन का नाम वोट नहीं दिलाता, 2022 ने विधानसभा स्तर पर दोनों दलों की असमान ताकत दिखाई और 2024 ने यह साबित किया कि तालमेल हो तो राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है। 2027 की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। सपा और कांग्रेस को तय करना है कि वे एक-दूसरे के खिलाफ अपनी जमीन बचाने में ज्यादा ऊर्जा लगाएंगे या भाजपा के खिलाफ साझा मैदान तैयार करने में। फिलहाल गठबंधन टूटा नहीं है, लेकिन उसकी सबसे कठिन लड़ाई शुरू हो चुकी है सीटों की सूची सामने आने से पहले ही दोनों दल अपने-अपने हिस्से की राजनीतिक कीमत तय करने में जुट गए हैं।

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