पर्यटन
पर्यटन एक ऐसी यात्रा है। पर्यटक मनोरंजन या फुरसत के क्षणों का आनंद उठाने के उद्देश्यों से करता है।भारतीय प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मानव के विकास,सुख और शांति की संतुष्टि व ज्ञान के लिए अति आवश्यक माना गया है। क्योंकि मानव धरा मानव द्वारा एवं प्रकृति द्वारा ही निर्मित है। यह मानव के लिए मनोरंजन एवं रोजगार का साधन है।
भारत के ऋषि मुनियों ने भी पर्यटन को प्रथम महत्व दिया है। प्राचीन गुरुओं ने कहा है कि “बिना पर्यटन मानव अन्धकार प्रेमी होकर रह जायेगा। पाश्चात्य विद्वान् संत आगस्टिन ने कहा है कि,”बिना विश्व-दर्शन ज्ञान ही अधुरा है। पर्यटन गैर निवासियों की यात्रा और उनके ठहरने से उत्पन्न सम्बन्ध और प्रक्रियाओं का योग है।
पर्यटक स्थायी रूप से निवासी नहीं होते हैं। पर्यटक इन स्थलों पर किसी कमाई की गतिविधि से नहीं जुड़े होते हैं। कुछ दशकों से पर्यटन में रूझान एक फेशन बन गया है। विशेष रूप से यूरोप में जहाँ छोटी अवधि के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर जाना आम हो गया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से पर्यटन का उद्भव मानव की उदर पूर्ति तथा दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ा रहा। धीरे-धीरे यह मानव के मनोरंजन,मानसिक शांति,रोमांस प्राप्त करने आदि से जुड़ता गया। कालांतर में यह बहुआयामी रूप में प्रचलित हो गया। वर्तमान में पर्यटन केवल घूमने-फिरने तक ही सीमित नहीं है। यह हमारे जीवन के विविध पक्षों से जड़ा हुआ है।
अभिव्यक्ति मनोरंजन,व्यापार,रोजगार,व्यावसायिक गतिविधियों आदि उद्देश्य से एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करता रहता है। इससे न केवल उसे अपने लक्ष्यों की पूर्ति होती है।
बल्कि उसे मानसिक शांति, कुछ समय के लिए अपनी दैनिक चिंताओं से मुक्ति,जीवन में नवीनता आदि का अनुभव प्राप्त होता है। इन सभी विविधताओं से पर्यटन के अनेक प्रकार स्पष्ट होते हैं।
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देश सांस्कृतिक व आध्यात्मिक नवजागरण का साक्षी
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