सरकार की मंशा पर निर्भर अतिपिछड़ी जातियों का भविष्य

कुछ राज्य सरकारों, कमीशनों और समितियों की सिफारिशें,सरकार की मंशा पर निर्भर करता है अतिपिछड़ी जातियों को एससी दर्जा देना।

प्रथम प्रधानमंत्री स्व.पं.जवाहरलाल नेहरू 4 दिसम्बर 1954 को दिल्ली में आदिवासी कल्याण विभाग के उद्घाटन के अवसर पर अपने विचार इस तरह व्यक्त किये थे- “बहुत सी पिछड़ी जातियां अनुसूचित जातियों की तरह पिछड़ी हुई है। यह भी सच है कि कुछ बहुत पिछड़ी है” ।आन्ध्र प्रवेश के भूतपूर्व डायरेक्टर जीबीएस मनी आईएएस ने फिशरमेन समुदाय के विषय में कहा है कि – “स्थिति इतनी खराब है जितनी इरिजनों गिरिजनों की भी नहीं और इस समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की सिफारिश की जाती है।” (इसकी डायरेक्टर आफ फिशरीज आन्ध्रप्रदेश हैदराबाद से पुष्टि की जा सकती है) पिछड़ा वर्ग आयोग (बैकवर्ड क्लास कमीशन) के अध्यक्ष काका साहब कालेलकर ने भारत देश के भ्रमण के आधार पर अपनी रिपोर्ट में तथ्यों सहित वर्णन किया है कि काफी जातियाँ स्थल अथवा समुद्री मत्स्य उद्योग में लगी हैं। इनमें से कुछ स्थल व समुद्री मछली पालन दोनो करते हैं। इन्ही में से कुछ अछूत समझी जाती है। मछली के साथ-साथ यह लोग नदियों व समुद्र तट क्षेत्र में यात्री नाव तथा मालवाहक नाव चलाने का पेशा भी करते हैं। मछुआ समुदाय गरीब व अशिक्षित हैं।उनकी रहन सहन की स्थिति गरीबी रेखा से काफी नीचे हैं तथा वे लोग बिचौलियों के शोषण के शिकार हैं। उनका जीवन बहुत ही कठिन और जोखिम भरा है। (आयोग रिपोर्ट 87 पैरा 73 अंक 1)। इस कारण से काका साहब कालेलकर आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि ये लोग अमानुषी जीवन बिता रहे हैं, ग्रामीण क्षेत्र में रहते है। खुशहाल व अधिकार सम्पन्न जातियों की ज्यादतियों के शिकार बने रहते हैं।

भारत सरकार द्वारा गठित समिति के अध्यक्ष एनएन लाकूर ने 1 जनवरी 1965 को कहा कि-“साधारणतया अनुसूचित जाति का पता इससे लगाया जाता है कि ये लोग पहाड़ों में समाज से अलग रहते हैं। मैदानों में भी ये लोग एकान्त बास करते हैं और मुख्य आबादी में नहीं गिने जाते हैं। इनकी इसी जिन्दगी के कारण इन्हें अनूसूचित जनजाति में शामिल किया जाता है। लोकुर समिति ने यह भी कहा कि 1950 में बनी अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की सूची, 1931 की जनगणना के आधार पर बनाई गई अछूत जाति की सूची का ही विस्तार है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि मिले जुले मद्रास राज्य (तमिलनाडु एवं आन्धप्रदेश) में फिशरमैन/मछुआरों का शैक्षणिक तथा अन्य सुविधाओं के लिए उन जातियों के साथ अछूत जाति की सूची में रखा गया था। जिन्हें कि बाद में अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया गया।लोकूर समिति का गठन करने के लिये सरकारी प्रस्ताव में कहा गया है कि अनुसूचित जाति / जनजाति की सूचियों का असमान आकार (सांचा) तथा दूसरी असंगतियों को सरकार के ध्यान में आने के कारण इन सूचियों को विवेकता व वैज्ञानिक ढंग से संशोधित करने की आवश्यकता है। सन् 1966 में पेश की गयी लोकूर समिति की रिपोर्ट के आधार पर दिनांक 12 अगस्त 1967 को लोकसभा में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (संशोधन) बिल पेश किया गया। उस समय के पेट्रोलयम, केमिकल एवं कल्याण मंत्री अशोक मेहता ने सलाह दी थी कि बिल ज्वाइन्ट सलेक्ट कमेटी (संयुक्त चुनिंदा समिति) को भेजा जाय। यह संयुक्त चुनिंदा समिति 25 मार्च 1968 को गठित की गयी। इसमें अनिल के. चन्द्रा को अध्यक्ष और 12 अनुसूचित जाति तथा 5 अनुसूचित जनजाति के सदस्य शामिल किए गए।

समित की 17 नवम्बर 1969 को पेश की गयी रिपोर्ट के आधार पर 17 नवम्बर 1970 को अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (संशोधन) बिल में लाया गया संयुक्त चुनिंदा समिति के आधार पर इस बिल को सदन बहुत सी फिसमैन जातियां, (खास तौर पर आन्ध्र प्रदेश की अग्निकुला क्षत्रिय) अनु.जनजाति की सूची में दिखायी गयी है। बिल में उत्तर प्रदेश की मल्लाह, केवट, बिन्द, धीवर, धीमर, कहार व बिहार के मल्लाह, कैवर्त, केवट, बिन्द को सम्मिलित नहीं किया गया। इसी प्रकार राजनीतिक कारणों से काफी बहस के बाद बिल को 25 नवम्बर 1970 को वापिस कर लिया गया।

उपरोक्त विश्लेषण से साफ पता चलता है कि फिशरमैन जातियों को अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जन जाति की सूची में शामिल करने के लिये कोई समान तरीका अथवा मापदण्ड और वैज्ञानिक ढंग नहीं अपनाया हैं ठीक सच्चाई तो यह है कि सारे धीवर/निषाद (मछुआ) समुदाय को चाहे वह स्थलीय हो या समुद्रीय, सभी को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित करने के हक में काफी जोरदार तर्क प्रस्तुत किया है क्योंकि इस समुदाय में वे सभी खूबिया, जैसे समाज की मुख्य धारा से अलग रहना, अशिक्षा, सामाजिक जीवन में आदिवासी रीति रिवाज ,हर स्तरों पर अत्यंत पिछड़ापन आदि पायी जाती हैं। सरकार की मंशा व इच्छाशक्ति पर निर्भर है कि वह इस अति गरीब बंचित, उपेक्षित, आदिवासी निषाद फिशरमैन व अतिपिछड़ी जातियों के साथ सामाजिक न्याय करने के लिए न्यायसंगत कदम उठाती है या नहीं।18 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए संविधान के अनुच्छेद-341 में संशोधन करने के लिए संसद के दोनों सदनों में बिल पास करना होगा,जो मौजूदा सरकार के लिए कोई कठिन नहीं है।मण्डल कमीशन 1980 ने भी मछुवारा समाज की जातियों को अनुसूचित जाति /अनुसूचित जन जाति में शामिल करने की सिफारिश करते हुए कहा है कि देश के कई राज्यों में मछुवारा जातियाँ अस्पृश्यता के कलंक या भेदभाव से ग्रसित हैं। भारत सरकार को चाहिए कि इन्हें अनुसूचित जाति/ जनजाति में शामिल करें और कोस्टल एरिया में मछुवारों के लिए विधान सभा व लोक सभा की सीटें आरक्षित करें।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 2004 में निषाद मछुवा समुदाय की मल्लाह, केवट, बिन्द, धीवर, कहार, गोड़िया, तुराहा, मांझी, रायकवार आदि, बिहार सरकार ने 8 नवम्बर 2004 को ही मल्लाह, केवट, बिन्द, नोनिया, कहार,तुरहा, बेलदार आदि को अनुसूचित जाति एवं मध्य प्रदेश सरकार ने 17 मार्च,2004 में मांझी मझवार की तरह मल्लाह, केवट, निषाद, कहार, धीमर, धीवर, भोई आदि को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा/ संस्तुति केन्द्र सरकार को भेजा परन्तु अभी तक केन्द्र सरकार कोई निर्णय न लेकर मामले को लटकाये हुए है। 8 नवम्बर,2004 को बिहार की राजद सरकार ने मल्लाह,केवट,बिन्द, बेलदार, तुरहा, चंद्रवंशी, नोनिया,राजभर जाति को एससी व बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने 5 सितम्बर,2015 को मल्लाह,नोनिया,बिन्द, बेलदार,केवट आदि को एसटी में शामिल करने के लिए केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा था,जो ठंडे बस्ते में पड़ा है।उत्तर प्रदेश में 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कराने का भाजपा,सपा,कांग्रेस, बसपा आदि दलों ने चुनाव के समय वादा भी किया।अब इंतजार है कि उत्तर प्रदेश सरकार केन्द्र सरकार को अनुसंशा भेजकर शीत कालीन सत्र में बिल पास कराती है या फिर इस मामले को लटका दिया जाएगा,जैसा अब तक होता आ रहा है।यह सच है कि यही मुद्दा 2024 में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

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