असहयोग के दिनों में अस्पृश्यता निवारण

डॉo अम्बेडकर से मुलाकात के पूर्व गॉंधी और जाति,असहयोग के दिनों में अस्पृश्यता निवारण।

शिवकुमार शुक्ला

22 अगस्त 1921 को गॉंधी ने बंबई के क्रांति मैदान में स्वदेशी का नारा देते हुए विदेशी कपडों की होली जलाई थी। असहयोग और स्वराज्य के नारे देश में गूंज रहे थे।गॉंधी आत्मविश्वास से लबरेज थे।वे जहॉं जाते स्वराज्य पाने के लिए भारतीयों की एकता की बात करते।वैसे लोगों को फटकारते जिन्हें हिन्दू और मुस्लिमों की एकता में विश्वास नहीं था और जो अछूतों के साथ मानवीय व्यवहार नहीं कर रहे थे।इस क्रम में वे मद्रास पहुंचे।29 सितम्बर 1921 को यंग इंडिया में उन्होंने लिखा -“ अस्पृश्यों के साथ जितना निष्ठुरतापूर्ण व्यवहार इस प्रांत में किया जाता है, उतना कहीं नहीं किया जाता। उनकी छाया मात्र से ब्राह्मण अपवित्र हो जाते हैं। जिन गलियों में ब्राह्मण रहते हैं, उन गलियों से वे गुजर नहीं सकते।ब्राह्मणेतर जातियों के लोगों का सलूक भी पंचमों के साथ इससे कोई अच्छा नहीं होता।इन दो जातियों के बीच पंचम कहलानेवाले लोग पिस रहे हैं।” गॉंधी देख और समझ रहे थे कि अस्पृश्यों के साथ अमानवीय व्यवहार ब्राह्मण तो कर ही रहे थे, ब्राह्मणेतर जातियॉं भी उससे पीछे नहीं थीं। लगभग सौ वर्ष बीत गये हैं।

आज भी दलितों के साथ सिर्फ ब्राह्मण दुर्व्यवहार नहीं करते, पिछडे भी करते हैं।गॉंधी को इसकी पहचान नहीं थी। वे कबीर की तरह ऐसे लोगों को फटकारते हुए लिखते हैं-“ मद्रास भव्य मंदिरों और धार्मिक निष्ठावाला प्रदेश है।लंबा तिलक, लंबे बाल, खुला बदन- इस रूप में यहॉं के लोग ऋषि – जैसे लगते हैं।लेकिन लगता है , उनका सारा धर्म इन्हीं बाहरी विधि- विधानों में सिमट कर रह गया है।जिस धरती ने देश को शंकर और रामानुज जैसी विभूतियॉं दीं, उसी धरती पर सबसे अधिक कर्मठ और उपयोगी नागरिकों के प्रति ऐसा डायरवादी जुल्म किया जाये,यह बात कुछ समझ में नहीं आती।” ( खंड -21, पृ. 222) मद्रास की जनसभाओं में गॉंधी ने जोर देकर कहा कि आज लगभग पूरी दुनिया हमारे साथ सामाजिक कोढियों के जैसा व्यवहार करती है ,उसका कारण यही है कि हमने भी अपनी जाति के पॉंचवें हिस्से के साथ वैसा ही व्यवहार किया है।

अक्टूबर का महीना था।तिथि थी दो अक्टूबर १९२१। उन दिनों देश में विदेशी कपडों की होली जलायी जा रही थी।गॉंधी इस समय कुरता और टोपी पहनते थे। जब वे बारीसाल गये थे तो वहॉं की अकालपीडित खुलना नामक बस्ती में पहुंचे तो अकालपीडितों ने ताना मारते हुए कहा कि यहॉ हम मर रहे हैं और आप विदेशी वस्त्र जलाने में लगे हैं। गॉंधी अपनी वेशभूषा पर विचार करने लगे।यों एकाध बार मदुरा में, मद्रास में यह विचार आया था,लेकिन वे इस पर अमल नहीं कर पाये थे।विदेशी कपडों को बिना हटाये खादी कपडों की स्थापना नहीं हो सकती थी।भारत में करोडों किसान सिर्फ लंगोटी में ही रहते थे।गॉंधी को उनके पास जाना था तो उन्होंने लंगोटी में ही रहने का निश्चय किया और तब कहना शुरू किया-“ अगर आपको खादी न मिले तो लंगोटी पहनकर ही रहिए, किन्तु विदेशी कपडे को तो उतार ही फेंकिए।”

गॉंधी इसतरह के दृढनिश्चयी थे। जो कहते थे, वे करते थे और जो करते थे, वे कहते थे। आंखें खुली हुई थीं और अपने आपको बदलने के लिए तैयार रहे थे। 6 अक्टूबर 1921 को हिन्दू धर्म पर एक लंबा लेख यंग इंडिया में लिखा जिसमें उन्होंने लिखा-“ मैं वर्णाश्रम धर्म के उस रूप में विश्वास करता हूं ,जो मेरे विचार से विशुद्ध वैदिक है, लेकिन उसके आजकल के लोक- प्रचलित और स्थूल रूप में मेरा विश्वास नहीं है।” ( खंड – इक्कीस, पृ. 256. ) गॉंधी वैदिक धर्म वाले वर्णाश्रम को मानते थे और उन्हें यह भी लग रहा था कि समाज में जो वर्णाश्रम का रूप प्रचलित है, वह विकृत हो गया है।गॉंधी अब तक खानपान और विवाह को वर्ण तक ही सीमित रखा था।इस लेख में वे हिलते हुए नजर आते हैं।वे लिखते हैं-“ मैं नहीं मानता कि दूसरी जातिवालों के साथ खाने पीने या विवाह संबंध करने से किसी का जन्मत: प्राप्त दर्जा छिन ही जाता है।चार वर्ण लोगों के व्यवसायों को निर्धारित करते हैं, वे सामाजिक समागम प्रतिबंधित या नियमित नहीं करते।” ( वही, पृ. 257)

गॉंधी अब भी वर्णाश्रम को मानते थे, लेकिन उन्हें इस पर संदेह होने लगा था।इस लेख में दो तीन चीजें ध्यान देने योग्य हैं।एक – उन्होंने माना कि ब्राह्मण शारीरिक श्रम से मुक्त नहीं है और शूद्र को ज्ञान से दूर नहीं रखा जा सकता।दूसरे- हिन्दू धर्म में किसी को बडा और किसी को नीचा मानना अप्राकृतिक है।तीसरे-दूसरे वर्णों के साथ खानपान और वर्णेतर शादी वर्णाश्रम धर्म में रोक नही है।वे लिखते हैं-“ सच्चे हिन्दू की पहचान तिलक नहीं है, मंत्रों का सही उच्चारण नहीं है, तीर्थाटन नहीं है और न जाति- पॉंति के नियमों और बंधनों का सूक्ष्म पालन ही ।”( वही, 260 ) साथ ही यह भी लिखा है कि विभिन्न वर्णों के लोगों के आपस में खान- पान और शादी- विवाह का संबंध रखने से यद्यपि वर्णाश्रम धर्म में कोई बाधा नहीं पहुंचती, तथापि हिन्दू धर्म ऐसे संबंधों का तीव्र विरोध करता है।नवम्बर, 1921 में गुजरात के गोधरा के अन्त्यज आश्रम से गॉंधी जी को एक ह्रदयविदारक पत्र आया जिसमें एक अन्त्यज बालक का जिक्र था, जिसे इसलिए पीटा गया, क्योंकि उसने जूठा अन्न खाने से इंकार कर दिया था ।

6 नवम्बर 1921 के नवजीवन के अंक में उस पत्र का जिक्र करते हुए गॉंधी ने लिखा-“ इस पत्र को पढकर हर हिन्दू का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए।इस बालक को मार पडी , इसके लिए उसके मॉं- बाप उत्तरदायी नहीं हैं, हम हैं।हमने अन्त्यज का तिरस्कार किया, उन्हें अपना जूठा और सडा हुआ अन्न खाने के लिए दिया और यह माना कि हमने पुण्य किया है।हमने उन्हें कम से कम वेतन दिया है और उन्हें भीख माॉंगने पर विवश किया है।हमने उनसे अपना कचरा न सिर्फ उठवाया, उन्हें कचरा खिलाया भी।अपनी उतरन को उनका श्रृंगार बनाया।परिणाम यह हुआ कि अब अन्त्यज वर्ग भीख मॉंगकर खुश होता है, जूठा भोजन पाकर गर्व का अनुभव करता है।सडा हुआ अनाज जब उनके घर में आता है तो उनके बच्चे खुशी से नाचते हैं।” अंत में गॉंधी ने अन्त्यजों से अपील की-“ वे जूठा और सडा हुआ अनाज अथवा मॉंस न लेने और न खाने का निश्चय करें और अपने बच्चों को, उनके लिए जो राष्ट्रीय स्कूल खोले जायें, उनमें भेजें।”

अस्पृश्यता निवारण आसान काम नहीं था।एक तरफ कट्टर हिन्दुवादी थे जिन्होंने अस्पृश्यता को इसतरह पेश करते कि वह हिन्दू धर्म का अंग है, दूसरी ओर अस्पृश्यता के शिकार लोगों को इस बात का अहसास नहीं था कि यह कितनी अमानवीय कुप्रथा है।दिसम्बर, 1921 में एक बंगाली मित्र ने पत्र लिख कर गॉंधी जी से पूछा-“ अस्पृश्यता निवारण को आपने राष्ट्रीय कार्यक्रम में मुख्य स्थान दिया है।परंतु जहॉं तक मुझे ज्ञात है, आपने इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की है कि इससे आपका ठीक- ठीक आशय किया है। अंतर्जातीय विवाह के प्रश्न से अलग, इससे इन तीन संभव अर्थों से कोई भी निकाला जा सकता है।इसका अर्थ या तो मनुष्य के स्पर्श को धार्मिक दृष्टि से अपवित्र न मानना हो सकता है, या उसके हाथ से जल स्वीकार करना हो सकता है, या उसके साथ भोजन करने में – विशेषकर उसके हाथ का पका भात खाने में आपत्ति न होना हो सकता है।”( खंड-२१, पृ . 535) गॉंधी ने अस्पृश्यता निवारण के विचारों को स्पष्ट करते हुए लिखा-“ अस्पृश्यता निवारण का अर्थ पंचम वर्ण की समाप्ति है।

इसलिए इसका अर्थ कम से कम तो यह है कि मनुष्य का स्पर्श मात्र अपवित्र नहीं समझा जायेगा।तथाकथित अस्पृश्यों को वैसी ही स्वतंत्रता होनी चाहिए जैसी कि स्पृश्यों को है।इसलिए अस्पृश्य समझे जानेवालों के हाथ के जल को अपवित्र नहीं समझा जायेगा।विवाह और सहभोज संबंधी प्रतिबंध अवांछनीय हो सकते हैं और उनमें परिवर्तन आवश्यक हो सकता है।परंतु मैं उन्हें हिन्दू धर्म का कलंक नहीं मानता, जैसा कि असपृश्यता को मानता हूं।”( वही, पृ . 535) गॉंधी जी के अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन का असर पड रहा था, लेकिन जो समूह इसके खिलाफ थे, वे भी विष वमन कर रहे थे। जहॉं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अन्त्यजों के लिए पचास हजार की स्वीकृति दी थी तो गुजरात विद्यापीठ में अन्त्यजों के लिए स्कूल के द्वार खोलने पर कई सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था।अनेक लोग ईमानदारी से अस्पृश्यता मिटाने में लगे थे तो ऐसे लोग भी थे जो स्पर्श करने का ढोंग कर रहे थे।गॉंधी जी इस बात पर अडिग थे- “ जब तक छह करोड हमारे द्वार पर पुकार करते रहेंगे और हम लोग उनकी पुकार नहीं सुनेंगे , तब तक हमें स्वराज्य नहीं मिलेगा- कभी नहीं मिलेगा।” ( वही, पृ 582)

प्रोफेसर योगेन्द्र की वाल से ….

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